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स्टीलवेल रोड

Vinit Narain Updated Thu, 07 Jun 2012 12:00 PM IST
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देश के पूर्वोत्तर राज्य असम के लीडो नामक एक गुमनाम से खदान कसबे से शुरू होने वाली स्टीलवेल नामक एक ऐसी ऐतिहासिक सड़क है,जो भारत, म्यांमार और चीन को जोड़ती है। लगभग छह दशकों से बंद पड़ी इस सड़क के एक बार फिर से खुलने की चर्चा इन दिनों जोरों पर है। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान बनी 1,726 किलोमीटर लंबी इस सड़क का विस्तार अपने देश में अरुणाचल प्रदेश तक (61 किलोमीटर) ही है, जबकि आगे इस सड़क का 1,033 किलोमीटर लंबा हिस्सा म्यांमार में है और बाकी 632 किलोमीटर चीन में।
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म्यांमार और चीन को द्वितीय विश्वयुद्ध में जापान के चंगुल से बचाने वाली स्टीलवेल रोड के निर्माण की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है। उस वक्त पश्चिमी देशों के गठजोड़ के अभियान का निशाना जापान था, जिसे म्यांमार और चीन से बाहर करना था। अमेरिका के जनरल जोसेफ वारेन स्टीलवेल को जब दक्षिण एशिया के अमेरिकी अभियान के तहत चीन-म्यांमार-भारतीय मोरचे के कमांडर के तौर पर नियुक्त किया गया, तभी वर्ष 1942 में एक दिसंबर को इस सड़क को बनाने का फैसला लिया गया।
15 हजार अमेरिकी सैनिकों के अलावा 35 हजार स्थानीय श्रमिकों ने दिन-रात काम करके 15 करोड़ अमेरिकी डॉलर की लागत वाली इस सड़क को तैयार किया था। इसके निर्माण के दौरान करीब 1,100 अमेरिकी सैनिकों की मौत हो गई थी, हालांकि मरने वाले लोगों के बारे में कोई पुख्ता सुबूत नहीं हैं। इस सड़क के खुलने से तीनों देशों के बीच व्यापार तो बढ़ेगा ही, आपसी रिश्तों में भी मजबूती आएगी। स्थानीय लोग एक लंबे अरसे से इस सड़क को खोलने की मांग कर रहे हैं।
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