विज्ञापन

पाबंदी की भाषा बोलती राजसत्ता

Vinit Narain Updated Tue, 22 May 2012 12:00 PM IST
Punctuality speaks language of royalty
ख़बर सुनें
अस्मिताओं की राजनीति अब उन्हीं को खाने लगी है, जिन्होंने उसे पाल-पोसकर बड़ा किया। जिस लोकतंत्र ने उसे पुष्पित-पल्लवित होकर खिलने का मौका दिया, उसने उसी के मूल्यों को निगलना शुरू कर दिया है। जिस तरह एक पाठ्यपुस्तक के कार्टून का मामला सभी पाठ्यपुस्तकों तक जा पहुंचा है और उस पर एक-दो सांसद नहीं, बल्कि पूरी संसद एकजुट है, वह महज बुद्धिजीवियों और पाठ्यक्रम लेखकों से टकरा कर नहीं रुकने वाला। वह देर-सबेर अभिव्यक्ति की व्यापक आजादी तक जाएगा और न्यायपालिका से लेकर उन दूसरी संस्थाओं के गिरेबान पकड़ेगा, जो पिछले कुछ वर्षों से तीखी रपटें, कड़े सवाल, कठोर टिप्पणियां और गाज गिराने वाले फैसले कर रही हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन
सवाल उठता है कि यह स्थिति आई क्यों और इससे आगे निकलने का रास्ता क्या है। क्या यह मार्क्सवादी शब्दावली में नवजनवादी क्रांति है या समाजवादी शब्दावली में जाति तोड़ो आंदोलन का नया रूप ? वरना क्या वजह है कि आपस में अकसर टकराने वाली सामाजिक अस्मिताएं स्वाभिमान के नाम पर संसद में जबर्दस्त एकजुटता का प्रदर्शन कर रही हैं।

इस दौरान समाज की खड़ी असमानता अगर टूटी है, तो उसकी जगह पर पड़ी असमानता बढ़ गई है। वह असमानता उन जातियों के भीतर पैदा हुई है, जिनके कुछ लोगों ने राजनीतिक सत्ता हासिल कर अपनी आर्थिक और सामाजिक हैसियत बढ़ा ली है, लेकिन उन्हीं की बिरादरी के बाकी लोग आज भी उपेक्षित हैं। ऐसी कामयाबी पाने वाले लोग अपनी बिरादरी के विपन्न हिस्से को जोड़े रखने के लिए समता की कोई और योजना नहीं रखते। उनके सामने एक ही विकल्प बचता है, वह यह कि वे स्वाभिमान का कोई प्रतीक ढूंढें और उसे अवतार का रूप दें। वे पुराने नायकों का सहारा लेकर खुद को नायक और अवतार बनाने में लगे हैं और उसके लिए अस्मिता की राजनीति को स्वाभिमान से जोड़ना बेहद जरूरी है।

अब प्रश्न यह है कि अस्मिताओं की इस राजनीति से आगे जाया कैसे जाए। एक रास्ता पूंजीवाद, यानी बाजार का है। मार्क्स और एंगेल्स, दोनों ने बाजार की कड़ी आलोचना के बीच लिखा है कि पूंजीवादी बाजार उन तमाम पुरानी पहचानों को मिटा देगा, जो मनुष्य को संकीर्ण बनाते हैं। जैसे जाति, धर्म, भाषा और इलाका। यानी बाजार मनुष्य को उपभोक्ता तो बनाता है, लेकिन उसमें इतनी ताकत जरूर होती है कि संकीर्ण पहचानों को मिटा देता है। पर भारत में उदारीकरण के बीस वर्षों के प्रचंड अनुभव के बाद वैसा होता नहीं दिखता। दूसरी उम्मीद उस लोकतांत्रिक प्रक्रिया से थी, जिसमें समाजवादी, साम्यवादी और सुधारवादी धाराएं शामिल थीं और वे भी समाज को एक उच्चतर और स्वतंत्र मानवीय पहचान देना चाहती थीं। वह प्रक्रिया भी उस तरह से कारगर नहीं हुई, जैसी उम्मीद थी।
आखिर ऐसा क्यों हुआ? इसके क्या कारण रहे हैं? इसकी एक वजह यह भी बताई जाती है कि वे धाराएं भारतीय कम और पश्चिमी ज्यादा थीं, इसलिए भारतीय समाज ने उसे अपनी तरह से तोड़-मरोड़ डाला। यही कारण है कि भारतीय समाज को अपने मनमाफिक न बदल पाने के कारण तमाम क्रांतिकारी सिर धुनते हैं। इस दौरान उन धाराओं ने पश्चिमी शैली पर ही सही, लेकिन कुछ ऐसी संस्थाएं जरूर खड़ी कर दीं, जो संकीर्णताओं और स्वार्थों से लड़ती रहती हैं। लेकिन वे जहां तक शक्तिशाली आर्थिक और राजनीतिक प्रक्रिया को समर्थन देती हैं, वहां तक उन्हें साथ लिया जाता है, नहीं तो उन पर प्रहार होता है।

ऐसे में यह सवाल उठता है कि पहचानों की संकीर्णताओं के दलदल में फंसे अपने लोकतंत्र को कैसे बाहर निकाला जाए। यह निर्विवाद है कि कई बार जब आगे का रास्ता नहीं दिखता है, तो अतीत से सबक लिया जाता है। पंडित नेहरू ने इंडिया की डिस्कवरी की थी और बाबा साहब अंबेडकर ने बुद्ध ऐंड हिज धम्मा की। क्या आज हमें उस पुराने भारतीय समाज को फिर से देखने की जरूरत है, जो विविधताओं के बावजूद एक-दूसरे को सहता था और जिसकी राजसत्ता पाबंदी की भाषा नहीं बोलती थी? तो क्या भारत के आगे बढ़ने का रास्ता फिर उसके अतीत से निकलेगा?

Recommended

कुंभ मेले में अतुल धन, वैभव, समृधि प्राप्ति हेतु विशेष पूजा करवायें और प्रसाद की होम डिलीवरी पायें
त्रिवेणी संगम पूजा

कुंभ मेले में अतुल धन, वैभव, समृधि प्राप्ति हेतु विशेष पूजा करवायें और प्रसाद की होम डिलीवरी पायें

विज्ञापन
विज्ञापन
अमर उजाला की खबरों को फेसबुक पर पाने के लिए लाइक करें
विज्ञापन

Spotlight

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Most Read

Opinion

सरकारी स्कूलों से मोहभंग क्यों

निजी क्षेत्र की तुलना में कहीं ज्यादा प्रशिक्षित अध्यापक और व्यवस्था होने के बावजूद अगर सरकारी स्कूलों की तरफ विद्यार्थियों की आवाजाही नहीं बढ़ रही है, तो इस तरफ राजनीतिक दलों को देखना होगा। तभी सबको शिक्षा का सपना पूरा हो सकेगा।

22 जनवरी 2019

विज्ञापन

सलमान खान को लोकसभा चुनाव में इस सीट से उतार सकती है कांग्रेस

एक्ट्रेस kareena kapoor के मध्य प्रदेश से चुनाव लड़ने की खबरों के बाद अब सुनने में आ रहा है कि बॉलीवुड के दबंग salman khan भी राजनीति में अपना हाथ आजमा सकते हैं।

23 जनवरी 2019

आज का मुद्दा
View more polls

Disclaimer

अपनी वेबसाइट पर हम डाटा संग्रह टूल्स, जैसे की कुकीज के माध्यम से आपकी जानकारी एकत्र करते हैं ताकि आपको बेहतर अनुभव प्रदान कर सकें, वेबसाइट के ट्रैफिक का विश्लेषण कर सकें, कॉन्टेंट व्यक्तिगत तरीके से पेश कर सकें और हमारे पार्टनर्स, जैसे की Google, और सोशल मीडिया साइट्स, जैसे की Facebook, के साथ लक्षित विज्ञापन पेश करने के लिए उपयोग कर सकें। साथ ही, अगर आप साइन-अप करते हैं, तो हम आपका ईमेल पता, फोन नंबर और अन्य विवरण पूरी तरह सुरक्षित तरीके से स्टोर करते हैं। आप कुकीज नीति पृष्ठ से अपनी कुकीज हटा सकते है और रजिस्टर्ड यूजर अपने प्रोफाइल पेज से अपना व्यक्तिगत डाटा हटा या एक्सपोर्ट कर सकते हैं। हमारी Cookies Policy, Privacy Policy और Terms & Conditions के बारे में पढ़ें और अपनी सहमति देने के लिए Agree पर क्लिक करें।

Agree