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अयोध्या के कितने आयाम

Vinit Narain Updated Mon, 14 May 2012 12:00 PM IST
How many dimensions of Ayodhya
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सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति पलोक बसु ने बातचीत के जरिये अयोध्या मसले का समाधान तलाशने का प्रयास शुरू किया है। वह निरंतर दोनों समुदायों के लोगों से बात कर रहे हैं। अयोध्या विवाद के समाधान क्या हो सकते हैं, यह प्रयास कोई नया नहीं है। अब न्यायिक विवेचना होनी है कि विभिन्न पक्षों द्वारा दायर मामले और प्रस्तुत साक्ष्य पर आधारित निर्णय क्या हों। पहली बार जब यह विवाद 1885 में न्यायालय के समक्ष गया था, तो नीचे से लेकर चीफ कोर्ट तक ने मुख्य ढांचे के बगल में स्थित राम चबूतरा पर छत डालने की अनुमति नहीं दी। इस मामले में बगल में खड़ी बाबरी मसजिद के अस्तित्व को स्वीकार किया गया था।
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जहां तक समझौते का प्रश्न है, विवादों का समाधान इससे बेहतर कुछ हो ही नहीं सकता, लेकिन समझौता आग्रह मुक्त होकर नैसर्गिक न्याय एवं युग संदर्भों के अनुकूल हो, तभी लागू हो सकता है। संबंधित विवाद, जो न्यायालय में चल रहा था, वह प्रतिनिधिक चरित्र वाला है, यानी अदालत के निर्णय दोनों समुदायों पर समान रूप से लागू होंगे। इसीलिए नागरिक प्रक्रिया संहिता में ऐसे मामलों में समझौता तभी लागू माना जाएगा, जब वह केवल पक्षकारों तक नहीं, बल्कि दोनों समुदायों को भी स्वीकार हो।

संबद्ध मामले में पांच पक्षकार हैं। चार हिंदू समुदाय के संगठन या व्यक्ति तथा पांचवें संगठन के रूप में सेंट्रल सुन्नी वक्फ बोर्ड, जो इस विवादित स्थल को मसजिद और स्वयं को उसका स्वामी बताता है। आरंभ में जिन पांच लोगों को हिंदुओं द्वारा दायर मुकदमे में पक्षकार बनाया गया था, उनमें से कोई जीवित नहीं है, उनके स्थान पर नए उत्तराधिकारियों की नियुक्ति की गई है, उनमें से किसी के अधिकार कम या ज्यादा नहीं हैं।

समाधान ढूंढने के तो लंबे समय से कई प्रयास हुए हैं, पर वह समाधान, जो 1986 में अस्वीकार हो चुका है, उसके बाद से स्थितियों में काफी परिवर्तन आया है। 1990 का आंदोलन और 1992 में भीड़ द्वारा किया गया विध्वंस वे नए तत्व हैं, जिनके कारण यथास्थिति में परिवर्तन हो चुका है।

अदालत के आदेश से 1949 से अब तक जो भोग-राग-आरती और पूजा होती थी, वह किसी व्यक्ति की नहीं, बल्कि न्यायालय के निर्देश पर ही आधारित मानी जाएगी। सर्वोच्च न्यायालय ने 1994 के अपने आदेश में विभिन्न अदालतों के निर्णयों को रद्द कर दिया, पर केंद्र सरकार के अधिग्रहण को उचित ठहराया, जो मंदिर, मसजिद, पुस्तकालय, वाचनालय, संग्रहालय और जनसुविधाओं के निर्माण के लिए हुआ था। चूंकि इस अधिग्रहण में पुराने मुकदमे के संबंध में कोई वैकल्पिक उपचार विद्यमान नहीं था, इसलिए निर्देश दिया गया कि अदालत विचाराधीन मामले पर अपना निर्णय दे, जिसके अनुसार तीन जजों का अलग मतों वाला एक निर्णय 2010 में अस्तित्व में आया और वह भी सर्वोच्च न्यायालय द्वारा स्थगित होकर विचार के लिए लंबित है।

मसजिद वहां नहीं किसी अन्य स्थल पर बने और उसके लिए भी सहमति की खोज हो, यह दोषपूर्ण इसलिए है, क्योंकि अयोध्या में मसजिद बनाने पर कोई रोक नहीं है। सरकारी कागजों के अनुसार, अयोध्या में 29 मसजिदें विद्यमान हैं, जिनमें से आठ में नियमित नमाज होती है, और बाकी जो 21 मसजिदें ढूह, खंडहर या अन्य किसी प्रकार के अवशेष या ऐसी स्थिति में हैं, जो मसजिद के रूप में प्रयुक्त नहीं हो सकतीं, उनका स्वामित्व आज भी पूर्ववत ही है।

एक प्रश्न यह भी उठता है कि यदि मुसलिमों को अयोध्या में किसी अतिरिक्त स्थल पर मसजिद की आवश्यकता अनुभव होती हो, तो इसके लिए किसकी अनुमति और निर्माण के लिए प्रारूप स्वीकार करने का अधिकार किसे होगा। संविधान में दिए गए न्याय के समक्ष समता के मूल अधिकारों के अनुसार, इसके लिए किसी अन्य व्यक्ति या समुदाय द्वारा स्वीकृति की आवश्यकता नहीं है।

लखनऊ न्यायालय के निर्णय के बाद मुसलमानों के कुछ नेताओं द्वारा यह घोषणा की जा चुकी है कि वे बाबरी मसजिद स्थल पर कोई नई मसजिद बनाने नहीं जा रहे हैं, लेकिन साथ ही इस भूमि को किसी अन्य को देने के लिए भी तैयार नहीं हैं। मसजिद न बनाने की घोषणा को दूसरा पक्ष किस रूप में लेगा, वह इसे कमजोरी मानेगा या उदारता? और इसी प्रकार ‘हम मंदिर यहीं बनाएंगे’ का आग्रह भी न्यायिक और प्रशासनिक स्वीकृति के बिना संभव नहीं है। इस प्रकार बिना इन पेचों को समझे हुए अदालत के बाहर किया गया कोई समझौता कारगर नहीं हो सकता।

इस विवाद को सुलझाने के लिए तो विभिन्न मान्यताओं के धर्माचार्यों और धर्म संभावी लोगों ने कई बार प्रयास किए, लेकिन आग्रहशीलता या राजनीतिक लाभ ही इसमें सदैव बाधक बना है। इससे यही लगता है कि समाधान तभी संभव होगा, जब राम को सर्वव्यापक माना जाए। यह माना जाए कि बिना किसी पूजा स्थल के भी उसका अस्तित्व यथावत रहेगा।

वृहत्तर हिंदू समुदाय के विवेक व आग्रह को ही निर्णायक मानने की बात हो, तो हिंदू की जो परिभाषा विश्व हिंदू परिषद् बताती है, उसमें बौद्ध, जैन, सिख, दलित व आदिवासी भी शामिल हैं। लेकिन मंदिरवादियों द्वारा किसी आंदोलन या चुनाव में कभी भी सकल हिंदू समुदाय के 25-30 प्रतिशत से अधिक के प्रतिनिधित्व वाली स्थिति आई ही नहीं। राष्ट्र की व्याख्या के कौन-से मानक स्वीकार करके इस प्रश्न को उसकी अस्मिता से जोड़ा जाएगा?

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