सिविल सेवा का लोकतांत्रिक चेहरा

Vinit Narain Updated Mon, 07 May 2012 12:00 PM IST
Democratic face of civil service
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संघ लोक सेवा आयोग की नौकरियां (आईएएस, आईपीएस, आईएफएस और आईआरएस) देश में अभिजनवाद के स्थापित गढ़ हैं। न केवल ये ब्रिटिश महाप्रभुओं की देन हैं, बल्कि आजादी के बाद भी व्यापक समाज के साथ इनके रिश्ते पर सवालिया निशान लगते रहे हैं। इनमें लोकतंत्रीकरण की प्रक्रिया चल जरूर रही है, पर उनकी गति धीमी है।
ताजा नतीजों से हमें पहला आसानी से समझ में आने वाला संदेश यह मिलता है कि शायद अब भारतीय अधिकारी-तंत्र के बीच जेंडर संबंधी या स्त्री-पुरुष संतुलन बेहतर होने की शुरुआत का क्षण आ गया है। 910 सफल परीक्षार्थियों में 195 स्त्रियों का होना बताता है कि अब यह परिवर्तन केवल प्रतीकात्मक नहीं रह गया है।

पिछले साल जब केरल की एक परीक्षार्थी ने इस इम्तहान में सबसे ज्यादा अंक प्राप्त किए थे, तो इससे जुड़े मतलब उतने साफ नहीं लग रहे थे। लेकिन इस बार हरियाणा और पंजाब की दो परीक्षार्थियों ने यह कारनामा दोहरा कर बताया है कि स्त्री-पुरुष असंतुलन के लिए बदनाम इन दो प्रांतों की लड़कियां भी इस तबदीली के सिलसिले की अगुआई कर सकती हैं। लैंगिक-संतुलन में सुधार सिविल सेवाओं के लोकतंत्रीकरण की प्रक्रिया का नया आयाम है।

अखबारों में छपे विवरणों पर निगाह डालने से तीन बातें सामने आती हैं। पहली, इन लड़कियों की पृष्ठभूमि अभिजनपरक न होकर भारतीय भाषाओं की है। दूसरी, ऐसा लगता है कि अभिजनपरक पृष्ठभूमि की न होने के बावजूद इन लड़कियों ने अंगरेजी माध्यम की शिक्षा पर महारत हासिल करके सिविल सेवा में ऊंचा स्थान प्राप्त किया है। इससे एक नतीजा यह भी निकलता है कि शायद लैंगिक संतुलन में आया सुधार सिविल सेवा परीक्षाओं में भारतीय भाषाओं को मिले महत्व का व्यापक अंग नहीं है।

तीसरी बात, महिला परीक्षार्थियों को मिली कामयाबी के आधार पर बनी सुर्खियों ने एक बात और छिपा ली है कि कामयाबी कुल 1,001 परीक्षार्थियों को मिलनी चाहिए थी, लेकिन इसमें 91 की कमी रह गई। कार्मिक मंत्रालय के वक्तव्य के अनुसार, ये 91 लोग आरक्षित समुदायों से भरे जाने हैं।

इसमें दिलचस्पी की बात यह है कि कायमाब घोषित हुए 910 परीक्षार्थियों में शैक्षिक रूप से कमजोर समझे जाने वाले समुदायों के 91 सदस्य मौजूद हैं। लेकिन उन्होंने अपनी कामयाबी आरक्षण के तहत मिलने वाली विशेष सुविधा का लाभ उठा कर नहीं, बल्कि सामान्य मानकों के आधार पर प्राप्त की है।

सिविल सेवाओं में लोकतंत्रीकरण के स्तर का पता इस बात से चल ही सकता है कि सफल उम्मीदवारों में कितनी स्त्रियां हैं और कितने पुरुष या उनमें कितने ऊंची जाति के हैं और कितने कमजोर जातियों के। इसका सबसे ज्यादा पता परीक्षार्थियों द्वारा इम्तहान में अपनाए जाने वाले भाषायी माध्यम से चल सकता है। दरअसल, भाषायी माध्यम जाति, समुदाय और जेंडर से परे जाकर इस लोकतंत्रीकरण का सबसे ज्यादा सेक्युलर सूचक है।

वर्ष 1979 में कोठारी कमीशन की सिफारिशों के अनुसार संघ लोक सेवा आयोग के परीक्षा-पैटर्न में परिवर्तन किया गया था, जिससे भारतीय भाषाओं के प्रतियोगियों के लिए अंगरेजी के इस दुर्ग पर धावा बोलने का रास्ता खुल गया। इससे भारतीय भाषाओं में इम्तहान देने वाले परीक्षार्थियों की संख्या तेजी से बढ़ी। हर साल इस तरह की कहानियां आती हैं कि मजदूरों, रिक्शेवालों, रेहड़ीवालों, ग्रामीण और अर्द्धशहरी इलाकों में जिंदगी गुजारने वाले हिंदी के माध्यम से प्रशासनिक सेवाओं में कदम रख रहे हैं। उनकी संख्या जैसे-जैसे बढ़ेगी, नौकरशाह अभिजन की संरचना में फर्क पड़ने की उम्मीद की जा सकती है।

लेकिन ऐसा तब होगा, जब यह सिलसिला इसी तरह अबाध गति से चलता रहे। इस उम्मीद को उस समय धक्का लगा, जब पिछले साल अचानक बिना किसी समीक्षा के सिविल सेवा की प्रवेश परीक्षा के पहले चरण में ही एक एप्टीट्यूड टेस्ट शामिल कर दिया गया, जिसमें तीस नंबर अंगरेजी ज्ञान के लिए हैं, लेकिन भारतीय भाषाओं के ज्ञान को उससे बाहर रखा गया है। अगर संघीय लोकसेवाओं में भाषा का प्रश्न नहीं सुलझा, तो जेंडर संतुलन ठीक होते चले जाने के बावजूद इनके लोकतंत्रीकरण की प्रक्रिया को ग्रहण लग जाएगा।

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