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पूर्वोत्तर पर क्यों हंसती है दिल्ली

Vinit Narain Updated Wed, 02 May 2012 12:00 PM IST
Delhi why laugh at the Northeast
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इन दिनों पूर्वोत्तर दो घटनाओं की वजह से सुर्खियों में है। पहला मामला मेघालय के गारो हिल्स जिले से दिल्ली में पढ़ने के लिए आई उस युवा लड़की का है, जिसने इसलिए मौत को गले लगा लिया, क्योंकि उस पर परीक्षा के दौरान नकल करने का आरोप लगाया गया था। और दूसरी घटना असम से जुड़ी है, जहां असम गण परिषद् में अध्यक्ष पद के लिए हुए चुनाव के पूर्व मुख्यमंत्री प्रफुल्ल महंत ने बाजी मारी है। यह जीत केंद्रीय राजनीति में उनकी वापसी का संकेत दे रही है।
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अपने छात्र जीवन में प्रफुल्ल महंत और उनके आंदोलनकारी साथियों ने गैरकानूनी अप्रवास (बांग्लादेशी शरणार्थियों) के मुद्दे पर कांग्रेस का तीव्र विरोध किया था, जिस वजह से वह सत्ता तक भी पहुंचे थे। अब इस जीत ने उन्हें यह अधिकार दे दिया है कि वह राज्य में अदम्य रूप से खड़ी कांग्रेस को कड़ी टक्कर दे सकें। महंत महज एक सशक्त राजनीतिक हस्ती के रूप में ही नहीं जाने जाते, बल्कि 1980 के दशक में चले बांग्लादेशियों की अवैध घुसपैठ के खिलाफ मुहिम में अपने नेतृत्व की वजह से भी सुर्खियों में रहे हैं। लेकिन अपने विवाहेतर संबंध के कारण उन्हें पार्टी से बाहर होना पड़ा था। इसके बावजूद अपनी पार्टी को मजबूती दे सकने वाले वह इकलौते सक्षम नेता हैं।

बहरहाल, डाना सिल्वा संगमा का मामला अभी ज्यादा चर्चा में है। वह एमिटी विश्वविद्यालय, गुड़गांव में द्वितीय वर्ष की छात्रा थी और संस्थान के ही मानेसर स्थित कैंपस में रहती थी। यह घटना भी उन नस्लीय या भेदभावपूर्ण रवैये वाले मामलों की तरह दब सकती थी, जो पूर्वोत्तर से आने वाले छात्र दिल्ली या इसके आस-पास के इलाकों में महसूस करते हैं, और जो आम तौर पर मीडिया व राजनेताओं की शुरुआती चिंताजनक टिप्पणियों के बाद भुला दी जाती हैं। पर चूंकि डाना के चाचा मुकुल संगमा मेघालय के मुख्यमंत्री हैं, और मुखर हैं, इसलिए इस पूरे मामले ने तूल पकड़ लिया है। विश्वविद्यालय प्रशासन अपने पक्ष में सफाई दे चुका है कि परीक्षा के दौरान डाना के हाथों में मोबाइल था, और उससे इंटरनेट का इस्तेमाल किया जा रहा था।

इस मामले में कई मत सामने आ रहे हैं, कि क्या उस लड़की को परीक्षा केंद्र पर सार्वजनिक तौर पर अपमानित किया गया था, या उसने पूर्वोत्तर से आने की कीमत चुकाई है। मुकुल संगमा इस लड़ाई को आगे बढ़ाते हुए कह रहे हैं कि पूर्वोत्तर से आए युवा दिल्ली या देश के कई अन्य उत्तरी हिस्सों में न सिर्फ अपमानित होते हैं, बल्कि उन्हें निशाना भी बनाया जाता है। इतना ही नहीं, वे सभी प्रकार के अत्याचार और भेदभाव का शिकार भी बनते हैं। मुकुल संगमा ने इस मसले पर हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा से भी बात की और पत्रकारों को बताया कि ऐसी घटनाओं की जांच अनुसूचित जाति/जनजाति के लोगों के खिलाफ हुई हिंसा या अत्याचार के मामलों के रूप में ही होनी चाहिए, किसी दूसरे रूप में नहीं।

विश्वविद्यालय का पक्ष जानने के लिए मैंने वहां संपर्क साधने की भी कोशिश की। लेकिन रिसेप्शन से मेरा फोन पहले कुलपति कार्यालय में ट्रांसफर किया गया और फिर वहां से कुलसचिव कार्यालय में। कुलसचिव कार्यालय में जिस सज्जन ने मुझसे बात की, वह जल्दबाजी में थे और उन्होंने कहा कि इस मामले पर प्रतिक्रिया देने के वह अधिकारी नहीं हैं, लिहाजा मुझे छात्र-कल्याण के डीन से बात करनी चाहिए। डीन ने जरूर विनम्रता से बात की और उन्होंने बताया कि यह घटना मानेसर में हुई है, जहां डाना रहती थी, पर उन्होंने भी इस हादसे की जानकरी समाचार माध्यमों से ही मिलने की बात कही। दुखद है कि मीडिया से बात करने वाले अधिकारियों की तरफ से कोई जवाब मेरे पास नहीं आया। यह पूरा मामला पूर्वोत्तर के प्रति एक अजीब-सी उदासीनता का भी है।

मेरा अपना मानना है कि इस मामले में जांचकर्ताओं को केवल यह नहीं देखना चाहिए कि डाना ने परीक्षा के दौरान नकल का सहारा लिया था या नहीं, बल्कि इसकी भी जांच होनी चाहिए कि डाना कहीं नस्लीय भेदभाव का शिकार तो नहीं बनी, या उसकी आत्महत्या अपमान, हताशा या कड़वाहट का परिणाम तो नहीं है। जांचकर्ताओं को इन सभी नजरिये से इस मसले को परखने की जरूरत है, जिसमें डाना की शख्सियत और उसके व्यवहार को भी शामिल किया जाना चाहिए। इस मामले में जांचकर्ताओं को प्रशिक्षित परामर्शदाताओं और मनोचिकित्सकों की सहायता लेने की भी जरूरत है।

बहरहाल, इन सबके बीच यह सवाल भी कौंधता है कि आखिर राष्ट्रीय राजधानी में ही यौन उत्पीड़न और नस्लवादी भेदभाव की ऐसी दुखद घटनाएं बार-बार क्यों घटती हैं, जबकि देश के अन्य हिस्सों में इस तरह के गिने-चुने मामले ही सामने आते हैं। नस्ली उत्पीड़न के जिन्न का बोतल से बार-बार बाहर निकल आना अस्वाभाविक नहीं है, और उत्तर भारत सुनियोजित तरीके से इस तरह की घटनाओं को लगातार अंजाम देता है। जाहिर है, इसके पीछे वहां की सामाजिक स्थिति और परंपराओं का भी हाथ है। कोई यह कैसे भूल सकता है कि हरियाणा और पंजाब में लड़कियों का अनुपात देश में सबसे बदतर है!

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