गैस पीड़ितों की जानलेवा अनदेखी

Vinit Narain Updated Tue, 01 May 2012 12:00 PM IST
Ignoring the lethal gas victims
अब तक की सबसे बड़ी औद्योगिक दुर्घटना कही जाने वाली भोपाल गैस त्रासदी, जो कॉरपोरेट अपराधों पर परदा डालने की राजनीतिक कोशिशों के मामले में नजीर बन चुकी है, इन दिनों फिर से सुर्खियों में है। भोपाल ग्रुप फॉर इनफोरमेशन ऐंड एक्शन की ओर से सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई जानकारी के जरिये पता चला है कि केंद्र सरकार के मंत्रालयों ने विशेष बैठक कर भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) पर यह पाबंदी लगाई थी कि वह मरीजों और उनके करीबियों पर चल रहे शोध के निष्कर्षों को सार्वजनिक न करे। यह पाबंदी 1995 में उठाई गई, लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी।
इस पाबंदी के चलते गैस पीड़ितों के हितों पर जबरदस्त कुठाराघात हुआ और उसी यूनियन कार्बाइड कंपनी का फायदा हुआ, जो इस त्रासदी के लिए जिम्मेदार थी। इस पाबंदी की वजह से ही गैस पीड़ितों पर आईसीएमआर की पहली रिपोर्ट 2004 में प्रकाशित हो सकी। जानकार बताते हैं कि अगर यह पाबंदी नहीं लगती और अनुसंधान जारी रहता, तो गैस पीड़ितों के िलए अधिक मुआवजे के अलावा एक विशिष्ट ट्रीटमेंट प्रोटोकोल भी तय किया जा सकता था।

दिसंबर, 1984 की उस भयावह रात को भोपाल स्थित यूनियन कार्बाइड प्लांट ने 40 टन मेथिल आइसोसाइनेट जैसा जहर हवा में घोल दिया था, जिसकी चपेट में आने से चंद दिनों में ही 15 हजार से अधिक लोग मारे गए थे। इस हादसे में लाखों लोग प्रभावित हुए थे, जिनकी बाद की पीढ़ियों तक इसका असर दिख रहा है। स्थिति यह है कि आज भी यहां बच्चे विकलांग अथवा विकृत पैदा हो रहे हैं।

विडंबना ही कही जाएगी कि इस विभीषिका के इतने साल बाद बंद हो चुकी फैक्टरी के आसपास रहनेवाले 25 हजार से अधिक लोगों को वहां जमा हजारों टन जहरीले कचरे से रिसकर पहुंचने वाला विषाक्त पानी पीना पड़ रहा है। ‘संभावना ट्रस्ट’ द्वारा जारी आधिकारिक रिपोर्ट के मुताबिक, यह जहरीला कचरा आज भी वहां पड़े रहने से स्थानीय भूजल, सब्जियां यहां तक कि मां के दूध में भी निकल, क्रोमियम, पारा, शीशा और अन्य ज्वलनशील ऑर्गेनिक पदार्थ पाए जाते हैं। स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं ने इस तथ्य की ओर ध्यान आकर्षित किया है कि इस आबादी में कैंसर का अनुपात भी बढ़ा है और गैस पीड़ित माता-पिता ऐसी संतानों को जन्म दे रहे हैं, जो जन्म से ही आंशिक विकलांग हैं।

अमेरिकी बहुदेशीय कंपनी डाउ केमिकल्स ने वर्ष 2001 में ‘हत्यारी’ यूनियन कार्बाइड कंपनी को खरीदा और अब वह गैस पीड़ितों के प्रति किए अपने वायदों से मुकर रही है। डाउ का दावा है कि उसने सिर्फ कार्बाइड कंपनी की संपत्ति खरीदी है, देनदारियां नहीं। मई, 2005 में रसायन मंत्रालय ने बंद हो चुकी यूनियन कार्बाइड कंपनी के परिसर में पड़े जहरीले कचरे को हटाने के लिए उच्च न्यायालय में जब याचिका दायर की और इस सफाई के लिए डाउ से 100 करोड़ रुपये की मांग की, तबसे डाउ केमिकल्स ने यूनियन कार्बाइड की इन देनदारियों से पल्ला झाड़ने के लिए कानूनी सुरक्षा हासिल करने की कवायद शुरू की।

सूचना के अधिकार के तहत हासिल प्रधानमंत्री कार्यालय के एक आंतरिक दस्तावेज के मुताबिक ‘डाउ केमिकल्स ने भले ही यूनियन कार्बाइड को किसी तरीके से हासिल किया हो, लेकिन अगर कोई कानूनी देनदारी/जवाबदेही है, तो डाउ केमिकल्स को उसका पालन करना पड़ेगा।’ प्रस्तुत दस्तावेज डाउ द्वारा शेयरधारकों के सामने रखी बात के विपरीत है और भारत में डाउ केमिकल्स के निवेश के रास्ते में खड़ी बाधाओं को उजागर करता है।

यह तथ्य कम विचलित करने वाला नहीं है कि भोपाल गैस पीड़ितों के सही स्वास्थ्य के प्रति अधिकार को सांविधानिक अधिकार घोषित करने के सुप्रीम कोर्ट के आदेश की सरकारों ने अब तक अवहेलना ही की है। न उसने क्रिमिनल कोर्ट के इस आदेश पर अमल किया है कि वह भगोड़ी यूनियन कार्बाइड को हाजिर कराए और न ही उसने सुप्रीम कोर्ट के इस निर्देश का पालन किया है कि गैस पीड़ित माता-पिताओं के एक लाख बच्चों का बीमा करवाए। ऐसे में भोपाल गैस पीड़ितों का दर्द कम किया जाए, तो कैसे?

Spotlight

Most Read

Opinion

University of Bergen: क्लीनिंग स्प्रे धूम्रपान की तरह ही हानिकारक

नार्वे की यूनिवर्सिटी ऑफ बर्गेन के शोधकर्ताओं ने यूरोपीय समुदाय श्वसन स्वास्थ्य सर्वेक्षण के दौरान 6235 भागीदारों के आंकड़ों का विश्लेषण किया है।

19 फरवरी 2018

Related Videos

देखें, इन बॉलीवुड हस्तियों ने कराया है शरीर की खास चीजों का बीमा

अमूमन लोग जीवन बीमा या वस्तुओं का बीमा कराते हैं, लेकिन बॉलीवुड में कई हस्तियां ऐसी भी हैं, जिन्होंने अपने शरीर के अंगों का बीमा करा रखा है...

23 फरवरी 2018

आज का मुद्दा
View more polls

अमर उजाला ऐप चुनें

सबसे तेज अनुभव के लिए

क्लिक करें Add to Home Screen