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इस्तांबुल: अपनी ही तलाश में भटकता एक शहर

Jaideep Karnikजयदीप कर्णिक Updated Wed, 21 Aug 2019 12:49 PM IST
इस्तांबुलः संस्कृतियों के मिलन-बिंदु पर खड़ा इतिहास का जीवंत दस्तावेज़
इस्तांबुलः संस्कृतियों के मिलन-बिंदु पर खड़ा इतिहास का जीवंत दस्तावेज़ - फोटो : पार्थो कुणार:अमर उजाला
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कंधे से कंधा सटाकर खड़ी इमारतें। पहाड़ के उतार-चढ़ाव का साथ देते लाल कवेलू की छत वाले मकान। समंदर के सीने पर तने हुए लंबे झूलते पुल। ऊंची नोकदार मीनारों के बीच बड़े गोल गुम्बद वाली मस्ज़िदें। किसी भी योरपीय देश की तरह चौड़ी खुली सड़कें और उन पर फर्राटा भरती बड़ी-बड़ी गाड़ियां। गोरी चमड़ी और तगड़ी कद-काठी के पुरुष। बुर्के या हिजाब या स्कार्फ़ वाली महिलाएं, साथ ही कुछ स्कर्ट-टॉप वाली लड़कियां भीं।
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इन दृश्यों को देखकर तो इस्तांबुल एक सामान्य सा शहर ही मालूम पड़ता है, जो बस शायद थोड़ा अलग है। एक सामान्य पर्यटक के लिए सामान्य। थोड़ा अलग देख पाने वाले के लिए थोड़ा अलग। इन दृश्यों और शब्द चित्रों में छिपे विरोधाभासों को पढ़ सकने वाले किसी यात्री के लिए बेहद रहस्यमयी और रोमांचित करने वाला शहर और किसी इतिहास के शोधार्थी के लिए सभ्यताओं और संस्कृतियों के मिलन-बिंदु पर खड़ा इतिहास का जीवंत दस्तावेज़!

जी, हां, बायज़ेंटियम (बाज़न्तीन), या नया रोम या कुस्तुंतुनिया या इस्तांबुल। साम्राज्य और गणराज्य की परतों के  भीतर से झांकता एक शहर, जो कभी एशिया की खिड़की से पूरब को ताकता है तो कभी योरप के दरवाज़े से होकर पश्चिम को निकल पड़ता है। उसकी परेशानी भी यही है– पूरब से उगे या पश्चिम में ढले या फिर उन सांचों में जिनमें उसे ढालने की कोशिश समय-समय पर होती रही है। अपने अस्तित्व के कौन से हिस्से पर नाज़ करे और किसे बिसरा दे?

क्या वो सरायबर्नु में बायज़ेंटियम के रूप में अपने सबसे पहले स्वरूप को याद करे या फिर उस महान रोमन साम्राज्य का हिस्सा होने पर गर्व करे जिसे कोन्सटेंटिन प्रथम जैसे महान शासक ने आकार दिया था। इस शहर से कोंस्टेंटिन के लगाव और प्रभाव के कारण ही इसका नाम कुस्तुंतुनिया (कोंस्टेंटिनोपोल) पड़ा। जबकि कोंस्टेंटिन ख़ुद इसे नए रोम के नाम से पुकारता और देखता था। या फिर ये शहर उस महान उस्मानी (ऑटोमन) साम्राज्य की विरासत पर फख्र करे जिसका परिचय देने वाली इमारतें अब भी यहां मौजूद हैं। या फिर वो बस उस गणराज्य का जश्न मनाता चले जिसे वहां के राष्ट्रपिता मुस्तफा कमाल पाशा- अतातुर्क ने स्थापित किया। तुर्की की पेशानी पर पहचान के संकट की ये शिकन बा-आसानी देखी-पढ़ी जा सकती है।   

ओरहान पामुक को बचपन में हमेशा ये लगता रहा कि उनका कोई हमशक्ल इस्तांबुल में ही कहीं रहता है।  हूबहू उनके जैसा। जब भी वो इस्तांबुल की गलियों में घूमने निकलते, अपने उस हमशक्ल को ढूंढ़ने लगते। वो बहुत उत्सुकता और कौतुहल के साथ खिड़कियों में झांकने लगते। देखते कि कहीं वो ‘दूसरा’ओरहान दिखाई तो  नहीं दे रहा। 

इस्तांबुल की उन गलियों की सी गलियों में पामुक की ये तलाश महज संयोग या निजी कौतूहल नहीं लगती। मुझे लगता है कि पामुक की आंखों से खुद इस्तांबुल अपने आप को तलाश रहा है, इसीलिए इस्तांबुल ने पामुक को चुनकर उनसे ऐसा लेखन भी करवाया होगा, जो उसका शब्द-चित्र खींचता है। भीतर झांकता है। प्रतिबिम्ब तैयार करता है। खुद को तलाशता है। तो कई विरोधाभासों को एक साथ जीते और ख़ुद को तलाशते इस शहर इस्तांबुल की यात्रा दिलचस्प रही। शहर का मुख्य चौराहा-तकसीम, जिसे यहां के लोगों ने उच्चारण में भी टैक्ज़िम कर दिया है और कई जगह लिखते भी Taxim ही हैं। ये चौराहा और इसके इर्द-गिर्द की गलियां इस्तांबुल शहर का सबसे हलचल वाला हिस्सा हैं।

ये यहां का ह्रदयस्थल यानि डाउन-टाउन है। ये गलियां सारी रात जागती हैं। यहां के छोटे-बड़े पब और रेस्त्रां रात भर आबाद रहते हैं। इस चौक के बीचों-बीच तुर्की का चर्चित गणराज्य स्मारक बना हुआ है। इसे 1923 में तुर्की के गणराज्य बनने की याद में बनाया गया, जिसका अनावरण 1928 में हुआ। इसमें मुस्तफा कमाल पाशा के अलावा इश्मत इनोनु और फेवज़ी कक्माक की प्रतिमाएं हैं। तकसीम का अर्थ होता है बंटवारा। इस चौक का नाम तकसीम इसलिए पड़ा क्योंकि पुराने इस्तांबुल में पानी की मुख्य लाइन यहीं आती थी और उसका आगे बंटवारा होता था।
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