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खाकी और काले कोट की लड़ाई में कानून का कचूमर

Jay singh Rawatजयसिंह रावत Updated Thu, 14 Nov 2019 07:41 AM IST
देश की राजधानी में वकीलों और दिल्ली पुलिस की लड़ाई में पलड़ा चाहे जिसका भी भारी रहे मगर इस अशोभनीय और अराजक घटनाक्रम में कानून और मयादाओं का कचूमर अवश्य बन गया।
देश की राजधानी में वकीलों और दिल्ली पुलिस की लड़ाई में पलड़ा चाहे जिसका भी भारी रहे मगर इस अशोभनीय और अराजक घटनाक्रम में कानून और मयादाओं का कचूमर अवश्य बन गया। - फोटो : amar ujala
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देश की राजधानी में वकीलों और दिल्ली पुलिस की लड़ाई में पलड़ा चाहे जिसका भी भारी रहे मगर इस अशोभनीय और अराजक घटनाक्रम में कानून और मयादाओं का कचूमर अवश्य बन गया। अपने तर्कों और ज्ञान से अदालतों में जनता को न्याय दिलाने वाले काले कोट धारी कुछ वकीलों ने जिस तरह अदालत के बजाय स्वयं ही सड़क पर न्याय कर डाला, उससे कानून और न्याय व्यवस्था की धज्जियां तो उड़ी ही हैं लेकिन किसी भी शासन की शक्ति की प्रतीक पुलिस पर हमला कर एक तरह से सत्ता की सार्वभौमिकता का ही राजधानी की सड़कों पर रौंद दिया गया। लेकिन दूसरी ओर अपने को असुरक्षित महसूस कर रहे कानून के रक्षक तीस हजारी कोर्ट की घटना के विरोध में 5 नवम्बर को अपने ही मुख्यालय के समक्ष जिस तरह बेकाबू हुए उसने 1988 के दिल्ली पुलिस के असन्तोष को भी बहुत पीछे छोड़ कर 1973 के उत्तर प्रदेश के पीएसी विद्रोह की याद ताजा कर दी है। देश की बेहतरीन समझी जाने वाली दिल्ली पुलिस का आवेश में अनुशासन की लक्ष्मण रेखा को इस तरह लांघना भविष्य के लिए शुभ संकेत नहीं हैं।
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संविधान के महीने संविधान की धज्जियां
वकीलों और पुलिस के बीच झड़पें होना कोई नई बात नहीं है। कचहरियों में आम आदमी के पिटने की घटनाऐं भी नई नहीं हैं। लेकिन काले कोट वालों द्वारा खाकी वर्दीधारियों को देश की राजधानी की सड़कों पर इस तरह बेरहमी से पिटते कभी नहीं देखा गया था। जिस खाकी को देख कर आम आदमी खौफ खाता है, वहीं खाकी दिल्ली की सड़कों पर पुलिसकर्मियों के लिए पिटने का सबब बन गई थी। देखा जाय तो देश के संविधान के अनुसार समाज में कानून का राज कायम रखने के लिये नियुक्त कानून के रखवालों पर इस तरह संगठित हमला देश के कानून और संविधान पर ही हमला था और यह हमला उस नवम्बर के महीने हुआ है जिस महीने की 26 तारीख को बेहतरीन संविधान देश को मिला था।

पुलिसकर्मियों ने भी पार की लक्ष्मण रेखा
दिल्ली में 2 नवंबर और उसके बाद जो कुछ हुआ वह सारी दुनिया ने देख लिया। इस घटना के बाद पहली बार पुलिस के प्रति जो देशभर में जो सहानुभूति देखी गई वह स्वाभाविक ही थी। उसी से प्रेरित हो कर देश के विभिन्न कोनों से वरिष्ठ आइपीएस एवं आइएएस अफसरों ने भी निजी तौर पर दिल्ली पुलिस के साथ अपनी एकजुटता प्रकट की। हालांकि, दिल्ली पुलिस के जवान अपने आला अफसरों को धिक्कारते हुए किरन वेदी को याद कर रहे थे। लेकिन दूसरी ओर विवशता से ही सही मगर पुलिस का इस तरह लक्ष्मण रेखा को पार करना कानून व्यवस्था और अनुशासन को लेकर भविष्य के गर्भ में दबी आशंकाओं को भी कुलबुला गया है। सामान्यतः इस तरह की सीमाएं जब एक बार टूटती हैं तो फिर अक्सर टूटती जाती हैं।


 
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