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जन्मदिन विशेषः नेताजी को उत्तराखण्ड से प्रेरणा ही नहीं शक्ति भी मिली, बेहद खास था उनके लिए गढ़वाल

Jay singh Rawatजयसिंह रावत Updated Thu, 23 Jan 2020 01:31 PM IST
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नेता जी सुभाष चन्द्र बोस और उनकी आजाद हिन्द फौज (आइएनए) का उत्तराखण्ड से गहरा नाता रहा है।
नेता जी सुभाष चन्द्र बोस और उनकी आजाद हिन्द फौज (आइएनए) का उत्तराखण्ड से गहरा नाता रहा है। - फोटो : अमर उजाला
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नेता जी सुभाष चन्द्र बोस और उनकी आजाद हिन्द फौज (आइएनए) का उत्तराखण्ड से गहरा नाता रहा है। हालांकि दावा तो यहां तक किया गया था कि नेताजी ने साधु वेश में 1977 तक अपना शेष जीवन देहरादून में ही बिताया था। उनके प्रवास की सच्चाई जो भी हो मगर यह बात निर्विवाद सत्य है कि आजाद हिन्द फौज बनाने की प्रेरणा उन्हें देहरादून के राजा महेन्द्र प्रताप सिंह से और पेशावर काण्ड के हीरो चन्द्र सिंह गढ़वाली से मिली और उनकी फौज को शक्ति गढ़वालियों की दो बटालियनों ने भी दी।
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इंडियन नेशनल आर्मी (आइएनए) का गठन रास बिहारी बोस ने जापान में 1942 में कर लिया था और रास बिहारी भी देहरादून के फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट में हेड क्लर्क थे। रास बिहारी 12 दिसम्बर 1911 को दिल्ली में वायसराय लाॅर्ड हार्डिंग पर बम फेंकने के मामले में वांछित होने पर देहरादून से भाग कर जापान चले गए थे।

महेन्द्र प्रताप से भी मिली प्रेरणा नेताजी को
एक के बाद एक जांच समितियों और आयोगों के गठन के बाद भी भले ही नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की मृत्यु की असलियत सामने नहीं आ पाई हो, मगर उनके जीवन की अंतिम लड़ाई में उत्तराखण्ड के कनेक्शन से इंकार नहीं किया जा सकता। यद्यपि नेताजी ने निर्वासित ‘आजाद हिन्द सरकार’ का गठन 21 अक्टूबर 1943 को सिंगापुर में किया था। उस सरकार की राजधानी को 7 जनवरी 1944 को सिंगापुर से रंगून स्थानान्तरित किया गया। लेकिन इससे पहले आजाद भारत की निर्वासित सरकार का गठन राजा महेन्द्र प्रताप ने काबुल में 1915 में कर दिया था। उनके प्रधान मंत्री बरकतुल्ला थे।

क्रांतिकारी राजा महेन्द्र प्रताप तत्कालीन संयुक्त प्रान्त में मुसान के राजा थे, लेकिन क्रांतिकारी गतिविधियां चलाने के लिए वह देहरादून आ गए थे। उनकी रियासत को भी अंग्रेजों ने नीलाम कर दिया था। उन्होंने 1914 में देहरादून से ‘‘निर्बल सेवक’’ नाम का अखबार निकाला जो कि आजादी समर्थक था इसलिए महेन्द्र प्रताप को भारत से भागना पड़ा और तब जाकर उन्होंने अफगानिस्तान में आजाद भारत की निर्वासित सरकार बनाई थी। वह 1946 में भारत लौटे और शेष जीवन देहरादून के राजपुर रोड पर रहने लगे।
 
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