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गुलज़ार : लेखनी से जिनकी उम्र का पता ही नहीं चलता

Viplove Gupteविप्लव गुप्ते Updated Mon, 19 Aug 2019 04:54 PM IST
18 अगस्त को गुलज़ार का जन्मदिन होता है।
18 अगस्त को गुलज़ार का जन्मदिन होता है। - फोटो : अमर उजाला
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18 अगस्त को गुलज़ार का जन्मदिन होता है। सफ़ेद कौवा। हमेशा झक सफ़ेद, कलफबंद कुर्ता पजामा। आंखों पर एक चश्मा- दूर का या पढ़ने का पता नहीं। शायद बाई-फ़ोकल हो। ये दूर की देखते हैं और पढ़ने वाली बातें लिखते हैं। एक बार शादी कर चुके हैं, कंजी आंखों वाली एक बेहद ख़ूबसूरत ऐक्ट्रेस राखी से। एक बिटिया भी है, मेघना उर्फ़ बोस्की। इसी के नाम पर इन्होंने पाली हिल में अपने घर का नाम भी रखा है- बोस्कियाना। 
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लिक्खाड़ हैं। लिखते रहते हैं। इनकी लेखनी से इनकी उम्र का पता ही नहीं चलता। दोस्त इनके जो भी रहे हैं, कोई पूरा पागल जैसे पंचम, तो कोई आधा-अधूरा सा जैसे मीना कुमारी या दीप्ति नवल, या फिर डैशिंग संन्यासी विनोद खन्ना।

दरअसल, इनकी फ़ैन फ़ॉलोइंग ज़बरदस्त है। फेसबुक और ट्विटर पर गुलज़ार से ज़्यादा, नॉट बी गुलज़ार का हैशटैग ट्रेंड करता है क्योंकि हर कोई ट्रक के पीछे लिखे शेर उठा के "बाय गुलज़ार" चस्पां कर के पेश कर देता है। व्हाट्स ऍप पर तो तकरीबन रोज़ दो-चार फॉरवर्ड-वीर इनको भेंट करने के बहाने अपनी शायरी चिपका देते हैं।

वैसे  गुलज़ार,  हिंदी, उर्दू, फ़ारसी, बंगाली, पंजाबी, खड़ी अवधी और कई भाषाओं के ज्ञाता हैं और मज़े की बात ये है कि स्वयं सरदार हैं। सम्पूरण सिंह कालरा।

काम की बात करें तो फ़िल्म के गीत हैं, कुछ कविताएं, कुछ नज़्में और कुछ हाइकू की सौतेली बहन होम मेड त्रिवेणियां हैं। चांद पर इन्होंने कॉपीराइट करवा रखा है। पहले तो फिर भी आशिक और रक़ीब वाले रिश्ते से तमीज से पेश आते थे और अब बड़े ताऊजी की तरह इस चांद पर हुकूम चलाते रहते हैं। और जैसे दादाजी, खटिया पर लेटकर तारे गिनते हुए पोते पोतियों को कहानी सुनाते हैं और किरदारों के नए नए नाम बनाते हैं ना, ठीक वैसे ही इनके गानों की समझ, घूंघर वाले छेनू वाली झुन्नू का बाबा बना के छोड़ती है।

गुलज़ार ने प्लूटो गृह पर भी कविताओं की एक किताब लिख रखी है। पाजी नज़्में, रात पश्मीने की, ग्रीन पोयम्स, पुखराज जैसी कई किताबें इनकी कलम से निकल चुकी हैं। फिर कहानियां, उपन्यास, फिल्म की स्क्रिप्ट्स/ स्क्रीनप्ले/ डायलॉग और भी बहुत कुछ ऐसा है जो न कहानी है न कविता, बस गुलज़ार का है। 
 
आज के पाकिस्तान में पैदा हुए थे। शुक्र है कोई उन्हें वहां जाने के लिए नहीं कहता। वैसे ये पागल आदमी हैं, चले भी जाएं मूड बने तो। तक़रीबन टीनेज तक का समय तो वहीं काटा है। उसके बाद एक और पागल राइटर, मन्टो की कहानी "टोबा टेकसिंह" में एक प्रमुख पात्र बिशन सिंह की तरह दिल ने भी कहा “ओ पड़ दी गुड़ गुड़ दी अनेक्सी दी बेध्याना दी मूंग दी दाल ऑफ़ दी पाकिस्तान एंड हिंदुस्तान ऑफ़ दी दुर्र फिट्टे मुंह, गुड मैन दी लालटेन” और फिर बुद्धिमान लोगों ने हिंदी को हिंदुस्तान के नाम कर दिया और उर्दू को वहीं पाकिस्तान में पनाह दे दी। दुखी बेचारा गुलज़ार क्या करता।इन्होंने भी संदूक निकाला, थोड़े कपडे और दो ढाई किलो यादें भरी, और चल दिए। 
 
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