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नई शिक्षा नीति और भारतीय भाषाओं की एकात्मता समझने की जरूरत

Arun Pandeyडॉ.अरुण के.पाण्डेय Updated Sat, 17 Aug 2019 02:28 PM IST
नई शिक्षा नीति में हिंदी भाषा की राष्ट्रीय स्तर पर अनिवार्यता की संस्तुति का विरोध हुआ है।
नई शिक्षा नीति में हिंदी भाषा की राष्ट्रीय स्तर पर अनिवार्यता की संस्तुति का विरोध हुआ है। - फोटो : अमर उजाला
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नई शिक्षा नीति में हिंदी भाषा की राष्ट्रीय स्तर पर अनिवार्यता की संस्तुति का जिस तरह से विरोध हुआ है यह बहुत पुरानी परम्परा नहीं है और सूर्य के प्रकाश में आंख मूंदकर अंधेरे का आभास करने जैसा है। दक्षिण में हिंदी विरोध आजादी के बाद गढ़ा गया राजनीतिक मुद्दा है जिसकी प्रस्तावना पादरी रोबर्ट कोल्डवेल ने लिखी थी।
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पादरी रोबर्ट कोल्डवेल की परम्परा को आगे बढ़ाते हुए आधुनिक भाषा-ज्ञान के प्रवर्तकों ने शोधादि का स्वांग रचकर यह साबित कर दिया गया कि उत्तर भारत की भाषाओं का यूनानी, ईरानी, जर्मन और लातीनी भाषाओं से सम्बन्ध तो है लेकिन विध्यांचल के दक्षिण में प्रचलित “उन भाषाओं” से इनका कोई संबंध नहीं, जिसकी व्याकरणिक व्यवस्था में उत्तर से जाकर ऋषि अगस्त्य ने योगदान दिया था। 

अपनी पुस्तक “द्रविड़ भाषाओं का तुलनात्मक अध्ययन”के जरिये कोल्डवेल ने तमिल लोगों में उस भावना बीज बोया कि उनकी भाषाओं की उत्तर भाषाओं से कोई मेल नहीं हो सकता है। वहीं जब उत्तरापथ और दक्षिणापथ की परम्पराएं, शास्त्र, सामाजिक व्यवस्था व आराध्य देव एक ही हैं फिर उनकी भाषा में कोई अंतर्भाषिक सम्बन्ध न हो?

यह हजम होने वाली बात नहीं है। लेकिन तत्कालीन शासकों व मिशनरियों को यही अभीष्ट था कि भाषावर्ग के नाम पर दोनों प्रान्त अलग ही रहें और भाषा व सांस्कृतिक समानता पर इनकी दृष्टि कभी न पड़े। शायद इसीलिए आजादी के बाद देश में प्रान्तों या राज्यों का बंटवारा भाषाई आधार पर हुआ और वर्तमान में भारत के प्रत्येक प्रान्त के पास अपनी एक अभ्यासी भाषा है। 
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