कोरोना संकट और प्रकृति: कौन देस से आए ये पंछी, क्या-क्या सुख लाए ये पंछी

Nilesh Kumar Published by: निलेश कुमार
Updated Sat, 07 Nov 2020 12:17 PM IST
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NCF - फोटो : Amar Ujala

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कौन देस से आए ये पंछी
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कौन देस को जाएंगे
क्या-क्या सुख लाए ये पंछी

क्या-क्या दुख दे जाएंगे
पंछी की उड़ान औ’ पानी

की धारा को कोई सहज समझ नहीं पाता
पंछी कैसे आते हैं

पानी कैसे बहता है
अगर कोई समझता है भी

मुझको नहीं बतलाता है।

: कुमार विकल

पंजाबी मूल के हिंदी भाषा के जाने-माने कवि कुमार विकल (1935-1997) की यह कविता प्रकृति, मुनष्य और पंछियों की दुनिया के बीच घट रही कोमल किंतु जिज्ञासा से भरी भावनात्मक अभिव्यक्ति है। यह अभिव्यक्ति उन असंख्य मनोभावों की छवि बनाती है जो आकाश में उडते सुंदर पंछियों को देखकर हर व्यक्ति के भीतर आकार लेती है। यह अभिव्यक्ति प्रकृति से प्रेम की रंग-बिरंगी अनुभूति भी है, जिसके कई रंग हैं और कई रूप भी। 

बहरहाल, इस समय कोरोना काल चल रहा है और कुछ ही माह बीते हैं जब सारी दुनिया एक लंबे लॉकडाउन के बाद अब धीरे-धीरे बाहर आ रही है। महामारी के इस काल में हर व्यक्ति घरों में रहने को मजबूर था। कामधंधे ठप्प थे, रोजमर्रा के क्रिया कलाप बंद थे और एक अजीब सी शांति हमारे आसपास तैर रही थी, लेकिन इस उदासी और खामोशी के बीच यदि कहीं कुछ सुखद और मन को शांत करने वाली चीज थी तो वही थी अनंत आकाश को नाप रहे पंछियों की स्वच्छंद उडान, उनका अपार स्नेह और लगातार अपने आसपास के जीवन से जुड्ने की लालसा, जिसने महामारी के इस दौर में भी मनुष्य को अकेला नहीं होने दिया। 


पंछियों की सुबह की चहचहाट, मध्याहन की गुटर गू और सांझ का कलरव गान मनुष्य को यह अहसास करा गया कि जीवन में हमारे आसपास भी एक दुनिया बसती है जिसे ना केवल देखने, समझने की जरूरत है बल्कि प्रेम, स्नेह और उससे संवाद की भी जरूरत है। महामारी संकट की इस घड़ी में आसमान की ऊंचाई से दूर, उसके विस्तार से पार वे हमारे और करीब आए। घरों की खिडकियों, दरवाजों, बागीचों और शांत व खामोश पेड़ों की डालों पर बैठे पक्षियों ने हमसे तरह-तरह से हमसे संवाद किया, हमें पुकारा, हमसे बात करने की कोशिश की और एक संबंध स्थापित करने का भी प्रयास किया। यह संबंध और संवाद पंछियों को प्यार करने वाले लोगों में कहीं प्रेम स्थापित कर गया तो कहीं एक रिश्ता बना गया। 

पक्षियों से संवाद की इस डोर को अमर उजाला ने पक्षी प्रेमियों से थाम लिया और अपने पाठकों तक एक शृंखला के माध्यम से पहुंचाया। 'नेचर कन्ज़र्वेशन फाउंडेशन (NCF)' द्वारा चालित 'नेचर कम्युनिकेशन्स' कार्यक्रम की इस पहल के तहत जल संरक्षण व स्वच्छता पर काम करनेवाली संस्था अर्घ्यम की अध्यक्ष समाजेसवी और लेखिका रोहिणी निलेकणी ने रोचक तथ्यों के माध्यम से पक्षियों और मनुष्यों के आपसी संबंधों को शब्दों में विस्तार दिया। 

उन्होंने अपने किए गए शोध अध्ययनों के आधार पर प्रवासी पक्षियों के बिना रास्ता भटके हजारों मील लंबा सफर करने, परिंदों के संगीत, उनकी विशेष ध्वनि, प्रजनन के मौसम में गाए जाने वाले गीतों के बारे में बताया। मुंबई में पली-बढ़ीं और पक्षियों से प्रेरणा लेने वालीं रोहिणी ने बगुले, कौवें, कबूतर, गौरैया और तोतों की बारीकियों और चालाकियों की ओर ध्यान दिलाया। उन्होंने खुद को पक्षियों की ऋणी मानते हुए  संरक्षण के प्रयास शुरू किए और अपने बगीचे में पक्षियों की 60 से अधिक प्रजातियों की उपस्थिति दर्ज की। ऐसे प्रयासों की अपेक्षा वे लोगों से भी करती हैं।

वह तमाम ऐसे प्रयासों का समर्थन करती हैं जिनका उद्देश्य आम लोगों को पक्षियों के प्रति जागरूक कराना और चिड़ियों के संरक्षण को बढ़ावा देना है। पक्षियों की विविधता को पर्यावरण के स्वास्थ्य का सूचक बताते हुए उन्होंने पक्षियों को हमारी संपन्नता का प्रतीक बताया। 
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