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मिशन एडमिशनः अनुमतियों के मकड़जाल में उलझी शिक्षा व्यवस्था, जिम्मेदार कौन?

Avinash chandraअविनाश चंद्र Updated Mon, 30 Dec 2019 11:31 AM IST
एक बार फिर स्कूल में दाखिले के लिए भागदौड़ शुरू हो गई है।
एक बार फिर स्कूल में दाखिले के लिए भागदौड़ शुरू हो गई है। - फोटो : अमर उजाला
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दिल्ली एक बार फिर से मिशन मोड में है। यह मिशन है ‘मिशन नर्सरी एडमिशन’। नवंबर के अंतिम सप्ताह में नर्सरी दाखिलों के लिए गाइडलाइंस जारी होने के साथ ही अभिभावकों की दौड़ शुरू हो गई है। दौड़ अपने बच्चों को एक अदद ‘बढ़िया’ स्कूल में दाखिला दिलाने की है। यह सिर्फ घर से ‘पसंद’ के स्कूल तक की ही दौड़ नहीं है, यह दौड़ है उन सभी संभावित विकल्पों को आजमाने की जो उन्हें मनपसंद स्कूल में दाखिला सुनिश्चित करा सके। 
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इस दौरान अभिभावकों को जिस आर्थिक, शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना से गुजरना पड़ता है ये सिर्फ वही जानते हैं। हालांकि गाइडलाइंस जारी करते समय प्रत्येक वर्ष शिक्षा विभाग द्वारा अभिभावकों को आश्वस्त किया जाता है कि इस बार उन्हें किसी प्रकार की समस्या का सामना नहीं करना पड़ेगा। यह बात और है कि प्रत्येक वर्ष उनके आश्वासन, गाइडलाइंस जारी होने के कुछ ही दिनों के भीतर हवा हवाई नजर आते हैं। ऐसा क्यों है? आइए इसकी पड़ताल करते हैः

डिस्ट्रिक इंफॉर्मेशन सेंटर फॉर एजुकेशन(डाइस) के आधिकारिक आंकड़ों (2015-16) के मुताबिक दिल्ली में कुल स्कूलों की संख्या 5,751 है। इनमें से सरकारी स्कूलों की संख्या 2,826 जबकि मान्यता प्राप्त निजी स्कूलों की संख्या 2,925 है। दिल्ली के शिक्षा निदेशालय द्वारा जारी आंकड़ों (वर्ष 2018) के मुताबिक 1345 निजी स्कूल ऐसे हैं जो मान्यता प्राप्त तो हैं लेकिन अनएडेड हैं। यानी कि उन्हें सरकार की तरफ से किसी प्रकार की सहायता प्राप्त नहीं है। 

इनमें से भी सीनियर सेकेंडरी अर्थात 12वीं तक के स्कूलों की संख्या लगभग 400 ही है। सबसे महत्वपूर्ण बात ये कि इन 400 में से कथित ‘बढ़िया’ (अभिभावकों की वरीयता के अनुसार) स्कूलों की संख्या 200 से भी कम है। इसके अतिरिक्त 3 हजार के करीब वे स्कूल भी हैं जो न तो मान्यता प्राप्त हैं और न ही उन्हें सरकारी सहायता प्राप्त है।

एक अनुमान के मुताबिक प्रत्येक वर्ष दिल्ली में प्रवेश स्तर पर दाखिले के लिए लगभग 5 लाख छात्र आवेदक होते हैं। इन पांच लाख छात्रों के अभिभावकों की पहली पसंद ये मुट्ठीभर 200 स्कूल ही होते हैं और यही कारण है कि यहां भारी मारामारी मचती है। इसका फायदा स्कूल भी अपने मनमानी कर उठाते हैं और फिर दौर शुरू होता है सरकार और स्कूलों के बीच नूरा कुश्ती का जो अदालतों तक पहुंच जाता है। और इन सबके बीच फजीहत झेलनी पड़ती है अभिभावकों और उनके बच्चों को।
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