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आजादी का अमृत महोत्सव 2022: 15 अगस्त पर देश को एक बड़ा तोहफा दे सकता है मध्यप्रदेश..!

Ajay Bokil अजय बोकिल
Updated Mon, 15 Aug 2022 04:50 PM IST
सार

अगर सब कुछ तयशुदा योजना के मुताबिक चला तो मध्यप्रदेश आजादी का अमृत महोत्सव सत्तर साल पहले समूचे भारत से विलुप्त हो चुके चीतों के पुनर्वास के रूप में मनाएगा। इंतजार है केवल दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति द्वारा चीतों के निर्यात को हरी झंडी देने का। 

नामीबिया से आठ चीतों की पहली खेप 15 अगस्त तक पहुंचने की उम्मीद है। इसके लिए श्योपुर जिले के कूनो पालपुर अभयारण्य को तैयार कर लिया गया है।
नामीबिया से आठ चीतों की पहली खेप 15 अगस्त तक पहुंचने की उम्मीद है। इसके लिए श्योपुर जिले के कूनो पालपुर अभयारण्य को तैयार कर लिया गया है। - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार

अगर सब कुछ तयशुदा योजना के मुताबिक चला तो मध्यप्रदेश आजादी का अमृत महोत्सव 70 साल पहले समूचे भारत से विलुप्त हो चुके चीतों के पुनर्वास के रूप में मनाएगा। इंतजार है केवल दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति द्वारा चीतोंं के निर्यात को हरी झंडी देने का।



दरअसल, इस बीच नामीबिया से आठ चीतों की पहली खेप 15 अगस्त तक पहुंचने की उम्मीद है। इसके लिए श्योपुर जिले के कूनो पालपुर अभयारण्य को तैयार कर लिया गया है। इस अभयारण्य में बसे गांव खाली करा लिए गए हैं।


अभयारण्य में चीतों के स्वागत की तैयारियां जोरों पर हैं। हिरणों के रूप में चीतों को भरपूर खाने की व्यवस्था की गई है। जरूरत पड़ी तो चीतल भी अभयारण्य में छोड़े जा सकते हैं। उम्मीद है नामीबियाई चीते भारतीय पर्यावरण में न सिर्फ जीवित रहेंगे बल्कि अपनी आबादी को बढ़ाने में कामयाब होंगे।
 

अगर यह परियोजना सफल रही तो भारत फिर एक बार चीतों के घर के रूप में जाना जाएगा। जो चीते अब कहानियों में जिंदा हैं, उन्हें बच्चे और पर्यावरण प्रेमी अपनी आंखों से सजीव देख सकेंगे, उन चीतों की बेमिसाल फुर्ती को महसूस कर सकेंगे। यकीनन भावी पीढ़ियों के लिए यह एक बेहतरीन वन्य जीव उपहार होगा।


ये चीते लाए तो नामीबिया से जा रहे हैं, लेकिन वहां से पहले इन्हें दक्षिण अफ्रीका की राजधानी जोहांसबर्ग लाया जाएगा। जोहांसबर्ग से विमान द्वारा ये दिल्ली, दिल्ली से ग्वालियर और ग्वालियर से सड़क मार्ग से कूनो तक लाए जाएंगे। इन 8 नामीबियाई चीतों में आठ नर और आठ मादा हैं।


क्या कहते हैं अधिकारी? 

राज्य के वन अधिकारियों का कहना है-

 

अगले 6 सालों में कूनो में 50 से 60 चीते दौड़ते नजर आ सकते हैं। बताया जाता है कि भारत और दक्षिण अफ्रीकी राष्ट्रपति सिरिल रामफोसा के बीच एमओयू के अगले ही दिन वे चीतों को लेकर भारत आ जाएंगे।


ये चीते दक्षिण अफ्रीका के प्रिटोरिया विश्वविद्यालय में प्रो. एड्रियन ट्रोडिफ की देखरेख में भारत लाए जाएंगे। प्रो. ट्रोडिफ दक्षिण अफ्रीका में करीब दो दशकों से चीतों पर अध्ययन कर रहे हैं। वे खुद भी दक्षिण अफ्रीकी चीतों के बैच के साथ भारत आकर इस प्रोजेक्ट के लिए काम करेंगे। उम्मीद है कि 14 अगस्त तक कूनो की फिजाएं चीतों की रफ्तार से गुलजार हो सकती हैं। 

जानकारों के मुताबिक पहले इन चीतों को 30 दिन तक क्वारेंटाइन में रखा जाएगा। फिर धीरे-धीरे इन्हें बाड़ों में शिफ्ट किया जाएगा। वहां भी इनकी कड़ी निगरानी की जाएगी।

खास बात यह है कि चीते इस देश में सिंह और शेर की तरह एक अनुपम विरासत हैं, जिन्हें हमने सत्तर साल पहले खो दिया। सिंह अगर राजसी भाव, शेर अगर दिल कंपाने देने वाली दहाड़ का प्रतीक है तो चीता असाधारण तेज रफ्तार और फुर्ती का परिचायक है। 
 

मप्र में चीतों की पुनर्बसाहट को लेकर पिछले माह भारत यात्रा पर आई नामीबिया की उप-राष्ट्रपति नानगली म्बुम्बा और केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्री भूपेंद्र सिंह यादव ने इस बाबत एक समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। जिसके मुताबिक भारतीय वन कर्मियों को प्रशिक्षण दिया जाएगा। साथ ही भारत वन्य जीव संरक्षण के दूसरे क्षेत्रों में नामीबिया को सहयोग करेगा।

चीतों की जो उपप्रजाति भारत से विलुप्त हुई थी, उसका वैज्ञानिक नाम एसीनोनिंक्स जुबेटस वेनाटिकस था
चीतों की जो उपप्रजाति भारत से विलुप्त हुई थी, उसका वैज्ञानिक नाम एसीनोनिंक्स जुबेटस वेनाटिकस था - फोटो : पेक्सेल्स

चीतों के पुनर्वास की पहल

देश में विलुप्त होते चीतों के पुनर्वास की पहल यूपीए 2 के कार्यकाल में तत्कालीन केन्द्रीय पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने की थी। बाद में यह मामला अदालत तक गया। 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने नेशनल टाइगर कंजर्वेशन अथॉरिटी को इस परियोजना के लिए मंजूरी दी थी। साथ ही, कोर्ट ने राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण को चीतों के लिए उपयुक्त जगह खोजने का आदेश दिया था। कई राष्ट्रीय उद्यानों पर विचार के बाद एक्सपर्ट्स ने मध्यप्रदेश के श्योपुर में कूनो पालपुर राष्ट्रीय उद्यान को चुना।

हालांकि, इस दौड़ में मप्र के 1200 किमी क्षेत्र में फैले नौरादेही अभयारण्य का नाम भी था, लेकिन 748.61 वर्ग किमी में फैले कूनो पालपुर अभयारण्य को ज्यादा उपयुक्त माना गया। यहां 36 चीतों को बसाया जाएगा। वैसे कूनो में गुजरात के गिर से शेर लाने की भी योजना है, लेकिन मामला अटका हुआ है। 
 
वैसे भी दुनिया में कुल 7 हजार चीते ही बचे हैं। इनमें भी ज्यादातर अफ्रीका के जंगलों में ही हैं। कुछ चीते ईरान में भी बताए जाते हैं। भारत में चीते कहानियों और परिकथाओं में ही बचे थे। वो कहानियां अब फिर जिंदा हो सकती हैं। हालांकि चीतों को भारत लाना काफी खर्चीला काम है। नामीबिया से लेकर कूनो तक के सफर पर करीब 75 करोड़ रू. खर्च होंगे। इनमें से 50.22 करोड़ रू. इंडियन ऑइल कंपनी दे रही है। 

यह सवाल मौजूं है कि आखिर अफ्रीका से ही चीते लाकर मप्र के कूनो में क्यों बसाए जा रहे हैं? इसका जवाब विशेषज्ञों के मुताबिक यह है कि चीतों की जो उपप्रजाति भारत से विलुप्त हुई थी, उसका वैज्ञानिक नाम एसीनोनिंक्स जुबेटस वेनाटिकस था और अफ्रीका से जो चीते भारत लाए जा रहे हैं, उनका वैज्ञानिक नाम एसीनोनिंक्स जुबेटस जुबेटस है। इन दोनो प्रजातियों के जीन्स लगभग समान हैं, इसीलिए उन्हें भारत लाया जा रहा है।

हालांकि चीतों का यह महाद्वीपीय स्थलांतरण इतना आसान भी नहीं है। यह परियोजना भी अपने आप में एक प्रयोग ही है। क्योंकि अफ्रीकी चीते हिंदुस्तानी पर्यावरण में खुद को कितना ढाल पाएंगे।

अपनी तासीर को यहां के हिसाब से कितना बदल पाएंगे यह अभी देखना होगा। संक्षेप में कहें तो अफ्रीकी चीतों को अब एशियाई चीता बनना होगा। चीते इस कसौटी पर कितना खरा उतरते हैं, यह देखने की बात है।  

यह भी विडंबना है कि एक तरफ देश ने विदेशी सत्ता से आजादी पाई तो दूसरी तरफ हमने रफ्तार और फुर्ती के प्रतीक चीतों को इस देश से विदा कर दिया। भारत में चीतों की आखिरी खेप के रूप में तीन चीते सरगुजा (अब छत्तीसगढ़ में) में वहां के राजा रामानुज प्रताप सिंह ने अपनी बहादुरी दिखाते हुए शिकार के रूप में खत्म कर दिए।

मध्यकाल में चीते चतुर शिकारी के रूप में बादशाहों, राजाओं की पहली पसंद थे। कई राजाओं ने इन्हें शौक से पाला भी था। क्योंकि चीता जिस रफ्तार से भागता और अपने शिकार पर  झपटता है, उसके आगे शेर का शाही मिजाज भी फीका पड़ता है।

एक जमाने में देश भर में फैले चीते आजादी के चार साल बाद ढूंढे नहीं मिल रहे थे। नतीजतन भारत सरकार ने 1952 में चीतों को विलुप्त जाति घोषित कर दिया। जबकि एशियाई चीते (अंग्रेजी में इन्हें हंटिंग पैंथर भी कहा जाता है) भारत की शान हुआ करते थे। चीतों का महत्व इसी से समझा जा सकता है कि मध्यकाल के कवि भूषण ने महानायक शिवाजी की तुलना चीते से की थी।

उन्होंने लिखा था ‘दावा द्रुमदंड पर चीता मृगझुंड पर भूषण वितुंड पर जैसे मृगराज है। यानी शिवाजी की आक्रामकता चीते के समान है। चीते की खूबी यह है कि वह अंधेरे में भी अपने शिकार को साफ देख सकता है और उस पर झपट सकता है। इसीलिए शायर अल्लामा इकबाल लिखा ‘ मिलेगा मंजिले मकसूद का उसी को सुराग, अंधेरी शब में है चीते की आंख जिसका चिराग।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें [email protected] पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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