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अदालतों में रेप के पेंडिग मुकदमों से भी फैल रहा असंतोष, आखिर और कितनी देर होगी न्याय मिलने में?

Satish Aliaसतीश एलिया Updated Mon, 09 Dec 2019 06:10 PM IST
देश की अदालतों में साढ़े तीन करोड़ से ज्यादा मामले पेंडिंग हैं
देश की अदालतों में साढ़े तीन करोड़ से ज्यादा मामले पेंडिंग हैं - फोटो : AMAR UJALA
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बीते एक पखवाड़े में देश ने महिलाओं के प्रति अपराध का जो वीभत्स चेहरा देखा, उसे लेकर जो आक्रोश देखा और एक मामले में वारदात के एक हफ्ते बाद ही आरोपियों के कस्टडी एनकाउंटर से जो खुशी की अभिव्यक्ति सामने आई और अब एनकाउंटर और खुश होने पर सवाल भी सामने हैं।
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यह पूरा घटनाक्रम गंभीरता से सोचने पर विवश करता है। न केवल आपराधिक प्रवृत्तियों के लगातार बढ़ते जाने से बल्कि हमारे सामाजिक बदलाव पर भी चिंतन की जरूरत है। प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत के साथ क्या हमारे कानूनी प्रावधान खरे उतरे हैं? यह सवाल भी विचारणीय है। 

देश की अदालतों में साढ़े तीन करोड़ से ज्यादा मामले पेंडिंग हैं। हैदराबाद में रेप और हत्या के चार आरोपियों का एनकाउंटर असली था या पूर्व नियोजित यह तो जांच का विषय है ही लेकिन जिस तरह आम आदमी के अलावा प्रबुद्ध माने जाने वाले वर्ग ने त्वरित प्रतिक्रिया में खुशी जाहिर की, वह क्या बतलाता है?

दरअसल, सबके अवचेतन में यह बात गहरे पैठ गई है कि पीड़ित को न्याय मिलने के हमारे सिस्टम में जो प्रक्रियागत् देरी है, वह न्याय पर भरोसा कायम रखने में विफल होती दीख रही है। अब भारत के नवागत् मुख्य न्यायधीश शरद अरविंद बोबेड़े की टिप्पणी कि इंसाफ अगर बदले में तब्दील हुआ तो अपना चरित्र खो देगा, निश्चित ही त्वरित बदले की जनभावना और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत को बनाए रखने की चुनौती हमारे सामने हैं। 

अलबत्ता यह तकनीकी रूप से एनकाउंटर में आरोपियों के मारे जाने का मामला है, जिस एनकाउंटर पर सवाल हैं और जांच होना शेष है, फिर भी इसे न्याय या बदला माना जा रहा है तो यह भी चिंतनीय है।

दूसरी तरफ यह भी सच है कि कार्यपालिका और व्यवस्थापिका पर जनता का भरोसा अत्यंत कम है और वह आज भी सर्वाधिक उम्मीद न्यायपालिका पर ही लगाए रहती है।

पीड़ित व्यक्ति जब थक हार जाता है तो वह यही कहता है कि मैं तुम्हें अदालत में देख लूंगा। यह उम्मीद ही तो कि कोई नहीं तो अदालत से न्याय मिल पाएगा। 
यानी न्याय पर भरोसा भारतीय जनमानस में अभी कायम है, अपवाद हो सकते हैं। लेकिन यह भरोसा बार-बार डगमगाता रहता है क्योंकि हमारी अदालतों के काम करने का तरीका अत्यंत धीमा है। फार्स्ट ट्रैक कोर्ट और तेजी से सुनवाई के तमाम प्रयासों के बावजूद लंबित मामलों की फेहरिस्त इतनी लंबी है कि न्याय की आस मंद पड़ना अस्वाभिक नहीं हैं।  

देश की अदालतों में साढ़े तीन करोड़ से ज्यादा मामले पेंडिंग हैं। इनमें से 40 हजार से ज्यादा तो ऐसे हैं जो तीन दशक यानी 30 साल से ज्यादा वक्त से फैसले के इंतजार में हैं। देश के उच्चतम न्यायालय में ही करीब 60 हजार मामले पेंडिंग हैं।  
 
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