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अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार दिवस 2019ः मानव अधिकारों का सिकुड़ता दायरा और समाज

Javed Anisजावेद अनीस Updated Tue, 10 Dec 2019 05:03 PM IST
बीते कुछ सालों में मानवाधिकारों की अवहेलना बढ़ी है।
बीते कुछ सालों में मानवाधिकारों की अवहेलना बढ़ी है। - फोटो : अमर उजाला
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वर्तमान समय में देश में जिस तरह का माहौल है उसे देखते हुए मानवाधिकार की चर्चा बहुत जरूरी हो जाती है। वर्तमान में भारत एक ऐसे दौर से गुजर रहा है जब यहां “जन” और “तंत्र” दोनों के द्वारा ही मानव अधिकारों की उपेक्षा और अवहेलना बढ़ी है।

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आज मानव अधिकारवादियों का मजाक उड़ाना और उन्हें ही देश के लिए खतरे के रूप में देखने का चलन तेजी से बढ़ा है। महिलाओं के साथ क्रूरतम हिंसा, आश्रय ग्रहों में बच्चियों के साथ वीभत्सता, अत्याचार, मॉब लिंचिंग के दौर से हम पहले गुजर ही रहे थे। लेकिन इस बार मानवाधिकार दिवस मनाने की रस्म अदायगी हम ऐसे समय करने जा रहे हैं जब समाज पुलिस एनकाउंटर को इंसाफ मानते हुए इसका जश्न मना रहा है और राज्य नागरिकता (संशोधन) विधेयक के नाम पर ऐसा कानून लाने जा रहा है जो सीधे भारतीय संविधान की आत्मा पर चोट साबित हो सकता है। 

सैद्धांतिक तौर पर मानव अधिकार इस धरती के सभी इंसानों के लिए बराबर हैं फिर वे चाहे किसी भी नस्ल, धर्म, लिंग या राष्ट्र के हों। वैश्विक तौर पर मानवाधिकार की अवधारणा को अपनाने की जरूरत दूसरे विश्व युद्ध की तबाही के बाद महसूस की गई। जिसका मकसद था विभिन्न देशों,समाजों और इंसानों के बीच शांति और सह अस्तित्व के सम्बन्ध को कायम किया जा सके।
 

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