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हरियाणा चुनाव 2019ः कांग्रेस के लिए क्या कुछ कर पाएंगे हुड्डा और शैलजा

Sanjiv Pandeyसंजीव पांडेय Updated Tue, 17 Sep 2019 03:48 PM IST
हरियाणा में कई गुटों में बंटी कांग्रेस ने चुनाव से ठीक पहले नए अध्यक्ष और नए नेता प्रतिपक्ष की घोषणा की।
हरियाणा में कई गुटों में बंटी कांग्रेस ने चुनाव से ठीक पहले नए अध्यक्ष और नए नेता प्रतिपक्ष की घोषणा की। - फोटो : सोशल मीडिया
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हरियाणा में चुनावी बिगुल किसी समय भी बज सकता है। थकी-हारी कांग्रेस भाजपा के नए प्रयोगों का मुकाबला अपने पुराने सेनापतियों के सहारे करने जा रही है। भाजपा से मुकाबले के लिए कांग्रेस ने पुराने जनरलों को मैदान में उतार दिया है। लोकसभा चुनावों में हार के बाद हताश कांग्रेस ने एक बाऱ फिर अपने क्षेत्रीय क्षत्रप भूपेंद्र सिंह हुड्डा के सामने घुटने टेक दिए हैं। 
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हरियाणा में कई गुटों में बंटी कांग्रेस ने चुनाव से ठीक पहले नए अध्यक्ष और नए नेता प्रतिपक्ष की घोषणा की। पार्टी छोड़ने की धमकी दे रहे भूपेंद्र हुड्डा को नेता प्रतिपक्ष बना दिया। अशोक तंवर को अध्यक्ष पद से हटा कुमारी शैलजा को प्रदेश अध्यक्ष बना दिया।

प्रदेश कांग्रेस में दो बदलाव कर कांग्रेस ने साफ संदेश दिया कि कांग्रेस प्रदेश में सत्ता तो चाहती है, पर कांग्रेस के पास सत्ताधारी भाजपा से संघर्ष के लिए कोई नया उर्जावान नेता नहीं है।

कांग्रेस ने इस बदलाव के साथ यही एक ही संदेश दिया कि अगर प्रदेश की जनता भाजपा से नाराज है तो कांग्रेस को चुपचाप सत्ता सौंप दे। ठीक उसी तरह से जैसे मध्य प्रदेश, छतीसगढ़ और राजस्थान के राज्य विधानसभा चुनावों में जनता ने भाजपा से सत्ता छीन कांग्रेस को सत्ता की कुर्सी सौंप दी थी। इन राज्यों में कांग्रेस ने अपनी तरफ से कुछ नहीं किया था।

नाराज जनता ने खुदबखुद कांग्रेस को सत्ता की कुर्सी दे दी थी। जीत के बाद कांग्रेस ने अपने पुरानी परंपरा का पालन करते हुए मध्य प्रदेश और राजस्थान में सेवानिवृति के कगार पर आए दो नेताओं कमलनाथ और अशोक गहलौत को मार्गदर्शक मंडल में भेजने के बजाए मुख्यमंत्री की कुर्सी दे दी। दोनों ने लोकसभा चुनावों में जमकर गुल खिलाया, अपने बेटों को लोकसभा टिकट दिला व्यस्त हो गए, पूरे राज्य में भाजपा जीत गई।  

भूपेंद्र हुड्डा औऱ शैलजा को कमान
पूर्व मुख्यमंत्री भुपेंद्र सिंह हुड्डा को नेता प्रतिपक्ष बनाकर कांग्रेस ने संदेश दिया कि कांग्रेस के पास फिलहाल हरियाणा में हुड्डा का विकल्प नहीं है। हुड्डा के नेतृत्व में ही कांग्रेस हरियाणा में चुनाव लड़ेगी। हुड्डा की मांग थी कि अशोक तंवर को प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाया जाए। लंबे समय तक हाईकमान उन्हें टालता रहा। लेकिन जब हुड्डा ने खुली बगावत की धमकी दी, पार्टी तोड़ने की बात की तो हाईकमान झुकता नजर आया। पिछले कुछ सालों मे लगातार कांग्रेस के क्षेत्रीय नेता पार्टी हाईकमान को दबाव में लेने में कामयाब रहे हैं।

हुड्डा ने भी कामयाबी हासिल कर ली। 2017 में पंजाब में हुए विधानसभा चुनावों से पहले भी अमरिंदर सिंह को हाईकमान ने उनके दबाव में चुनाव से पहले मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया था। उस समय अमरिंदर सिंह ने भी पार्टी छोड़ने के संकेत दे दिए थे। हालांकि पंजाब वाली स्थिति हरियाणा में नहीं है। भाजपा से उस हद की कोई नाराजगी हरियाणा में फिलहाल दिखाई नहीं दे रही जो 2017 के विधानसभा चुनावों से पहले पंजाब में अकाली दल भाजपा गठबंधन से लोगों की थी।

वहीं हरियाणा के सामाजिक तानाबाने में खासी छेड़छाड़ भाजपा ने कर दी है। गैर जाट को मुख्यमंत्री बना भाजपा ने पूरे हरियाणा में गैर जाटों को जाटों के खिलाफ लामबंद कर दिया। हरियाणा में लंबे समय तक जाट मुख्यमंत्री रहने के कारण गैर जाटों में असंतोष काफी लंबे समय से था।

कांग्रेस को यह पता है कि गैर जाटों में  अभी भी हरियाणा में जाटों के खिलाफ लामबंद है। यही कारण है कि कांग्रेस ने हुड्डा को पार्टी छोड़ने से मना तो लिया, लेकिन उन्हें अध्य़क्ष पद नहीं दिया। कांग्रेस अध्यक्ष पद पर एससी जाति से संबंधित अशोक तवंर को हटा एससी शैलजा को बिठाया ताकि गैर जाटों में एक भ्रम बना रहे कि कांग्रेस अगर आएगी तो गैर जाट ही मुख्यमंत्री बनेगा।  
 
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