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इस देश में भूलकर भी बिना मांगे ना करना महिलाओं की मदद, वरना पड़ जाएंगे मुश्किल में 

Priyamvada Sahayप्रियंवदा सहाय Updated Wed, 17 Jul 2019 02:50 PM IST
महिलाओं को प्राथमिकता देते हुए बसों या मेट्रो में उठ खड़ा होना भारतीय शिष्टाचार का हिस्सा है। लेकिन स्वीडन में ऐसा नहीं है।
महिलाओं को प्राथमिकता देते हुए बसों या मेट्रो में उठ खड़ा होना भारतीय शिष्टाचार का हिस्सा है। लेकिन स्वीडन में ऐसा नहीं है। - फोटो : Pixabay.com
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महिलाओं को प्राथमिकता देते हुए बसों या मेट्रो में उठ खड़ा होना भारतीय शिष्टाचार का हिस्सा है। इससे महिलाओं को सम्मान और तवज्जो देने से जोड़कर देखा जा सकता है। लेकिन स्वीडन में ऐसा नहीं है। संभव है कि आपके ऐसा करने से यहां किसी महिला को बुरा लग जाए। यहां के लिए यह इंप्रेसिव तरीक़ा नहीं माना जाएगा, क्योंकि समानता के अधिकार ने ऐसी चीज़ों के यहां के समाज से बाहर कर दिया है।
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हालात ये हैं कि गर्भवती महिला हो या बुज़ुर्ग महिला अगर उनके कहे बग़ैर आपने सफ़र में अपनी जगह देने की कोशिश की तो यह उन्हें नागवार गुजरेगा। इसके पीछे उनके अपने तर्क भी हैं। यहां की महिलाएं मानती हैं कि अगर सहायता की ज़रूरत है तो उसे मांगने में कोई बुराई नहीं है। लेकिन बेवजह किसी की मदद करना उनकी क्षमता पर शक करना माना जा सकता है।  यही वजह है कि भारत समेत कई दूसरे विकासशील देशों से आई महिलाओं को ऐसी चीज़ें असहज कर देती हैं।  

भारत और स्वीडन के समाज में है ये अंतर 
दरअसल, हमारे यहां कोई महिलाओं की सीट पर नहीं बैठता और अगर बैठता है तो महिला के आते खड़े हो जाते हैं। लेकिन स्वीडन में प्रायरिटी सीट होती है, जिसमें विकलांग, बुज़ुर्ग, गर्भवती महिलाओं और दूसरे ज़रूरतमंदों को माना जाता है, इसलिए अगर महिला ने किसी से बैठने के लिए जगह नहीं मांगी तो उनके लिए खुद खड़े हो जाने की ज़रूरत नहीं है। 

 
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