किसान आंदोलन : हठ से उम्मीदों को झटका, सवालों ने जिद्दी चेहरों से उतारा नकाब

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Hari Verma हरि वर्मा
Updated Fri, 22 Jan 2021 11:46 PM IST
किसान आंदोलन
किसान आंदोलन - फोटो : अमर उजाला

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किसान आंदोलन में सरकार से 11 वें दौर की वार्ता न केवल बेनतीजा रही बल्कि अब यह एक बार फिर डेडलॉक की ओर पहुंच गया है। डॉयलॉग की नई तारीख भी तय नहीं है। हठ से उम्मीदों को झटका लगा। जिद से कई सवाल उपजे। क्या यह आंदोलन सिर्फ किसान हित का है। कई चेहरों से नकाब उतर रहे हैं। लोकतंत्र और अदालत पर भरोसे के बीच यह विरोधाभास कैसा।
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अदालत पर यह कैसा भरोसा
नए कृषि कानून में कांट्रेक्ट फार्मिंग से जुड़े विवाद निपटारे का अधिकार एसडीएम के पास है। आंदोलनकारी किसानों को इस पर एतराज है, वे चाहते हैं कि ऐसे किसी मामले की सुनवाई अदालत की चौखट तक पहुंचे। सरकार तैयार भी है। एक तरफ तो किसानों का अदालत पर इतना अटूट भरोसा है, वहीं दूसरी तरफ यही आंदोलनकारी किसान सर्वोच्च अदालत की दहलीज पर विवाद के निपटारे के हर प्रयास और फैसले को ठुकराते भी रहे हैं। संयुक्त किसान मोर्चा ने कभी अदालत जाना मुनासिब नहीं समझा। पंजाब से लेकर दिल्ली के आंदोलन तक जो किसान संगठन अदालत में गए, उनसे मोर्चा ने नाता तोड़ लिया। उन्हें दरकिनार किया। आंदोलनकारियों के अदालत पर अटूट भरोसे और विरोधाभास के पीछे का सच क्या है? वे कौन हैं जो मसले के हल के लिए सर्वोच्च अदालत या उसकी बनाई समिति से दूरी बना रहे हैं?


लोकतांत्रिक आंदोलन का चेहरा
किसान आंदोलनकारियों का दावा है कि सभी फैसले लोकतांत्रिक तरीके से लिए जाते हैं, लेकिन 10वें दौर की वार्ता के बाद सरकार से मिले प्रस्तावों पर जब पंजाब के किसान संगठनों की आपसी मंत्रणा हुई, तो 32 में से 15 संगठन सरकार के प्रस्ताव को ठुकराने के पक्ष में दिखे। जबकि 17 संगठन सरकार के प्रस्ताव पर विचार कर कुछ और मिल जाने की चाह रख रहे थे। बहुमत सरकार के प्रस्ताव पर विचार करने को लेकर था, लेकिन इसे नजरअंदाज कर दिया गया। 

संयुक्त किसान मोर्चा भले सियासी रिश्ते और चेहरे से दूरी की बात करता है, लेकिन सियासी रवैया सामने है। गणतंत्र दिवस पर ट्रैक्टर रैली की जिद भी जगजाहिर है। आंदोलनकारियों को किसान हित की चिंता होती तो कानून की आपत्तियों पर सरकार से, सुप्रीम कोर्ट की कमेटी से या सरकार की ओर से प्रस्तावित नई कमेटी में चर्चा करते। चर्चा के बगैर तीनों कृषि कानूनों की वापसी की जिद को कितना लोकतांत्रिक माना जा सकता है। आंदोलनकारियों का न न्यायपालिका में भरोसा दिख रहा है, न कार्यपालिका में, न विधायिका में। फिर टकराव जैसे अंदेशे के बीच गणतंत्र दिवस पर लोकतांत्रिक अधिकार की दुहाई।

संयुक्त या टुकड़ा-टुकड़ा
संयुक्त किसान मोर्चा की ओर से करीब 500 किसान संगठनों के इस आंदोलन में शामिल होने का दावा किया जाता है। आंदोलन के दौरान हर मामले में पहले पंजाब और फिर संयुक्त किसान मोर्चा की बैठक में बारी-बारी से फैसले क्यों लिए जाते हैं? पंजाब के संगठन अलग क्यों? उनके फैसलों पर ही मुहर क्यों? कृषि कानूनों के पक्ष में भी करीब 300 किसान संगठन खड़े हैं। क्या सभी सरकार प्रायोजित ही हैं? कहीं आंदोलनकारी किसानों और सरकार प्रायोजित किसान संगठनों के बीच असली किसान ठगा तो नहीं जा रहा? 

आम किसानों को क्या चाहिए, अच्छी उपज की अच्छी कीमत। खेत की सुरक्षा। सिंचाई के लिए पानी-बिजली। न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी, नए बिजली बिल-पराली पर रोक। और तो और तीनों कृषि कानूनों पर ही साल-डेढ़ साल तक रोक। वार्ता की राह। यदि ऐसा ही है तो फिर वार्ता के जरिये इन मुद्दों पर कानूनों की खामियों को दूर कर सुधार (संशोधन) की लड़ाई के बजाय यह आंदोलन किस तरफ जाता दिख रहा है।

छह महीने की लड़ाई की तैयारी से आने वालों का अचानक 2024 तक का शंखनाद क्यों? बंगाल समेत अन्य राज्यों के चुनाव में मतदाताओं को मिले अधिकार से भी इन कृषि कानूनों की परख लोकतांत्रिक तरीके से हो सकती है। किसान संगठनों के बीच आखिर किस स्वार्थ से आपसी टकराव का नया सुर सुनाई पड़ने लगा है। कई किसान संगठन अब अपना अलग राग क्यों अलापने लगे हैं।

जिद की टाइमिंग पर सवाल
यह समय चुनौतियों का है। आर्थिक मोर्चे पर संकट है। अलग-अलग रिपोर्ट आ चुकी है कि किसान आंदोलन से चपत लगी है। कोरोना और कड़ाके की सर्दी में सड़कों पर यह जमावड़ा चिंताजनक है। मोबाइल टावर को नुकसान से नेटवर्किंग प्रभावित होने लगी है। टीकाकरण के दौरान नेटवर्किंग की अहमियत है। एक निजी कंपनी के पेट्रोल पंप पंजाब-हरियाणा में बंद कराए गए हैं, लेकिन आंदोलन में दिल्ली पहुंचने वालों के वाहनों के टैंक मुफ्त फुल कराने वाले या ईंधन देने वाले आखिर कौन हैं? पंजाब में किसानों-आढ़तियों के बीच 36 के संबंध जाहिर हैं। यही किसान संगठन पूर्व में उनके खिलाफ मोर्चा लगाते रहे हैं। परंतु इस आंदोलन के दौरान अचानक ये रिश्ते पलटकर 63 के यानि दोस्ताना कैसे हो गए। इस हठ से उपजे सवालों ने आंदोलन के पीछे छिपे चेहरों पर से धीरे-धीरे नकाब उतार दिया है।

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