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असफल रही प्लानिंग नहीं तो 1915 में आजाद होता भारत, गांधी नहीं यह शख्स बनते राष्ट्रपिता

vishnu Sharmaविष्णु शर्मा Updated Fri, 12 Apr 2019 05:06 PM IST
एक बार तो एक रेलवे स्टेशन पर यतीन्द्रनाथ ने अकेले ही आठ आठ अंग्रेजों को पीट दिया था।
एक बार तो एक रेलवे स्टेशन पर यतीन्द्रनाथ ने अकेले ही आठ आठ अंग्रेजों को पीट दिया था। - फोटो : Wikipedia
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आजादी की लड़ाई का इतिहास लिखे जाने के वक्त नाइंसाफी का शिकार होने वालों में एक ऐसा क्रांतिकारी भी था, जिसका प्लान अगर कामयाब हुआ होता, साथी ने गद्दारी नहीं की होती तो देश को ना गांधी की जरूरत पड़ती और ना बोस की। देश भी 32 साल पहले ही यानी 1915 में आजाद हो गया होता। उस दौर का हीरो था वो, जब खौफ में लोग घरों में भी सहम कर रहते थे, वो अकेला जहां अंग्रेजों को देखता, उन्हें पीट देता था, यतीन्द्रनाथ मुखर्जी के बारे में यही मशहूर था।
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एक बार तो एक रेलवे स्टेशन पर यतीन्द्रनाथ ने अकेले ही आठ आठ अंग्रेजों को पीट दिया था। बलिष्ठ देह के स्वामी यतीन्द्रनाथ मुखर्जी साथियों के बीच बाघा जतिन के नाम से मशहूर थे। बंगला के नादिया में पैदा हुए थे, जतिन जो अब बांग्लादेश में है। पिता की मौत के बाद मां शरतशशि ने ही अपने मायके में उनकी परवरिश की, शुरू से ही उनकी रुचि फिजिकल गेम्स में रही, स्विमिंग और हॉर्सराइडिंग के चलते वो बलिष्ठ शरीर के स्वामी बन गए।

हर कोई था बाघा का दीवाना 
11 साल की उम्र में ही उन्होंने शहर की गलियों में लोगों को घायल करने वाले बिगड़ैल घोड़े को काबू किया, तो लोगों ने काफी तारीफ की। उनकी मां कवि स्वभाव की थीं, और वकील मामा के क्लाइंट रवीन्द्रनाथ टैगोर के साथ उनके परिवार का अक्सर मिलना होता था। जतिन पर इस सबका बहुत प्रभाव पड़ा। उनके बलिष्ठ शरीर और चैरिटेबल कामों की चर्चा होने लगी। एक वृद्ध मुस्लिम महिला का घास का गट्ठर रोज उसके घर पहुंचाना, उसके साथ खाना खाना और उसको हर महीने मदद के लिए कुछ पैसा भेजना, लोगों के बीच चर्चा का विषय बन गया। दूसरी तरफ वो ध्रुव, प्रहलाद, हनुमान और राजा हरिश्चंद्र जैसे रोल नाटकों में करने लगे। इसी दौरान उन्होंने एक भारतीय का अपमान करने पर एक साथ चार अंग्रेजों को पीट दिया। अंग्रेज उनसे उलझने से बचने लगे।

विवेकानंद से मिले बाघा और बाघ को मारा 
कलकत्ता सेंट्रल कॉलेज में पढ़ने के दौरान वो स्वामी विवेकानंद के पास जाने लगे, जिनसे उन्हें भरोसा मिला कि स्वस्थ फौलादी शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क निवास करता है। स्वामी विवेकानंद ने उन्हें अम्बू गुहा के देसी जिम में भेजा, ताकि वो कुश्ती के दाव पेच सीख सकें। विवेकानंद के सम्पर्क में आकर उनके अंदर ब्रहम्चारी रहकर देश के लिए कुछ करने की इच्छा तेज हुई। फिर वो 1899 में मुजफ्फरपुर में बैरिस्टर पिंगले के सेक्रेटरी बनकर पहुंचे, जो बैरिस्टर होने के साथ-साथ एक इतिहासकार भी था, जिसके साथ रहकर जतिन ने महसूस किया कि भारत की एक अपनी नेशनल आर्मी होनी चाहिए। शायद यह भारत की नेशनल आर्मी बनाने का पहला विचार था। जो बाद में मोहन सिंह, रास बिहारी बोस और सुभाष चंद्र बोस के चलते अस्तित्व में आई। हालांकि इसी बैरिस्टर पिंगले के काफिले पर बम फेंकने के चलते 1908 में खुदीराम बोस को फांसी हुई थी, ये अलग बात है निशाने पर एक दूसरा मजिस्ट्रेट किंग्सफोर्ड था। दिलचस्प बात है कि जिस कॉलेज में जतिन पढ़े, आज उसी कलकत्ता सेंट्रल कॉलेज का नाम खुदीराम बोस कॉलेज है।
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