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ईरान के मसले पर भारत से अमेरिकी जिद बेतुकी

राजेश बादल Updated Thu, 06 Sep 2018 04:38 PM IST
modi in iran
modi in iran - फोटो : PTI
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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ईरान पर प्रतिबंध लागू करने को लेकर दादागीरी पर उत्तर आए हैं। अब वे 26 सितंबर को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की बैठक बुलाना चाहते हैं। इसमें ईरान से तेल निर्यात तथा अन्य पाबंदियों पर चर्चा पर उनका जोर होगा। इस सिलसिले में अमेरिकी विदेश सचिव और रक्षा सचिव की भारत यात्रा के दौरान किसी नतीजे के आसार नजर नहीं आते। हालांकि खुद अमेरिका में ही उनके फैसले की कड़ी आलोचना हो रही है। बराक ओबामा ने इसे बेतुका बताया है तो मित्र देश कनाडा और संधि पर दस्तखत करने वाले ब्रिटेन, जर्मनी फ्रांस और चीन पहले ही इस फैसले से अपने को अलग कर लिया था। संधि में शामिल एक और देश रूस के अमेरिका के साथ रिश्ते तनावपूर्ण हैं। यानी अमेरिका अलग थलग नजर आ रहा है। अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी भी ट्रंप के इस निर्णय से हैरत में है। उसका कहना है कि ईरान पूरी ईमानदारी से समझौते की शर्तों का पालन कर रहा है। ऐसे में अमेरिका का इकतरफा फैसला और नए प्रतिबंध ईरान को दोबारा परमाणु कार्यक्रम प्रारंभ करने के लिए उकसाने वाले लगते हैं। 
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असल दुविधा तो भारत की है। भारत और ईरान के रिश्तों में इस साल एक ऐतिहासिक शुरुआत हुई और चाबहार बंदरगाह ने सांस लेना शुरू कर दिया। यह बंदरगाह भारत और ईरान की दोस्ती का प्रतीक है। भारत ईरान से दुनिया में चीन के बाद दूसरे नंबर का तेल आयातक देश है। ईरान के अलावा वह इराक और सऊदी अरब से भी कच्चा तेल लेता है। बीते एक साल में भारत ने 5.65 लाख करोड़ रूपए का 2.10 करोड़ टन तेल ईरान से लिया, जो उसके कुल तेल आयात का अस्सी फीसदी है।

संधि से पहले प्रतिबंधों के चलते भारत ने आयात में काफी कमी की थी। परमाणु अप्रसार संधि के बाद आयात तीन गुना बढ़ाया गया। इस कारोबार का ही परिणाम दोनों देशों के बीच चाबहार बंदरगाह के रूप में सामने आया। अगले साल भारत में आम चुनाव होंगे। आपको याद होगा कि अमेरिकी प्रतिबंध फिर लगने के चौबीस घंटे में ही अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की कीमतें तीन प्रतिशत बढ़ गईं थीं। इसी स्थिति के चलते ही भारत में डीजल-पेट्रोल की कीमतों में आग लगी हुई है। 

सरकार के लिए यह विकट स्थिति है। ईरान-भारत के बीच भरोसे का जो स्तर है, वह सऊदी अरब और इराक के साथ नहीं है। यदि अमेरिका को खुश करने के लिए वह तेल आयात में कटौती करता है तो भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि को झटका लग सकता है। माना जाएगा कि अमेरिकी इशारे पर वह अपने राष्ट्रीय हितों को भी दरकिनार करता है। 

भारत और ईरान के बीच गहराते मधुर संबंधों का परिणाम ईरान में चाबहार बंदरगाह है, जो बड़ी मुश्किलों के बाद अंजाम तक पहुंचा है। उन्नीस सौ इकहत्तर में पाकिस्तान से जंग के बाद भारत के लिए अफगानिस्तान और मध्यपूर्व तथा यूरोप तक सड़क के रास्ते कारोबार करने में अड़चने बढ़ गई थीं। पाकिस्तान अड़ंगे लगाने लगा था। दूसरा रास्ता स्वेज नहर वाला था, जो सड़क मार्ग से चार गुना लंबा था। इससे लागत, समय और संसाधन तीनों की चुनौती बढ़ जाती थी।

इसलिए भविष्य की कठिनाइयों का अनुमान लगाते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 1973 में चाबहार का प्रस्ताव रखा था। लेकिन आगे बढ़ने से पहले ईरान में तख्ता पलट हो गया और प्रस्ताव लटक गया। चर्चाएं चलतीं रहीं। जब 2015 में परमाणु अप्रसार संधि ईरान के साथ हो गई तो 2016 में चाबहार समझौता ईरान से हो गया। लगातार बंदिशों से ईरान भी परेशान था। आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए भारत से समझौते में उसने भलाई समझी।

चाबहार में भारतीय कंपनियों ने एक लाख करोड़ का निवेश किया है। अब अफगानिस्तान से लेकर पुराने सोवियत देशों, मध्यपूर्व तक भारत को अपना सामान भेजने का खर्च आधा रह गया है। तेल टैंकरों को लाना आसान हो गया है। गुजरात के कांडला बंदरगाह से 11 लाख टन गेहूं भेजने के साथ ही इस बंदरगाह की बाकायदा शुरुआत हो गई। ईरान ने भी अपने इस अंतरराष्ट्रीय बंदरगाह से कारोबार बढ़ा दिया है। भारत ने अफगानिस्तान में 600 करोड़ रूपए की लागत से ईरान सीमा तक सड़क बनाई है और चाबहार से अफगानिस्तान सीमा तक ईरान ने सड़क बनाकर माल लाने ले जाने की मुश्किल आसान कर दी।

सड़क निर्माण में तालिबान और पाकिस्तान समर्थित आतंकवादी समूहों ने बड़ी बाधा पहुंचाई और करीब 130 भारतीय मजदूरों की हत्या कर दी। पाकिस्तान नहीं चाहता कि अफगानिस्तान के बाद ईरान में भी भारत का प्रभाव बढ़े। इसके अलावा भारत ईरान में अंदरूनी रेल नेटवर्क बिछाने का काम भी कर रहा है। इसका लाभ भारत-ईरान दोनों को लंबे समय तक मिलने वाला है। इसलिए अब भारत और ईरान के सामने मधुर रिश्तों के अलावा कोई विकल्प नहीं है। मौजूदा तनाव की स्थिति में अमेरिका को भारत के हित भी समझने होंगे। 

एक मसला पाकिस्तान का भी है। पाकिस्तान के बलूचिस्तान और अफगानिस्तान से चाबहार बहुत पास है और पाकिस्तान ने चीन को 43 साल के लिए ग्वादर बंदरगाह लीज पर दे दिया है। यह भारत को रणनीतिक नजरिए से बहुत चिंता में डालता था। चाबहार ने ग्वादर की परेशानी को संतुलित कर दिया है। मुंबई से चाबहार की दूरी सिर्फ 850 नॉटिकल मील है और चाबहार से ग्वादर केवल 72 किलोमीटर है। यानी चीन और पाकिस्तान अब ग्वादर पर गर्व नहीं कर सकते। भारत भी चाबहार के जरिए ग्वादर की निगरानी कर सकता है।

जानना दिलचस्प होगा कि ग्वादर पर दो सौ साल से ओमान का कब्जा था। कई साल तक सौदेबाजी के बाद 1958 में पाकिस्तान ने तीन मिलियन डॉलर में ओमान से खरीदा था। लब्बोलुआब यह कि भारत और ईरान को एक दूसरे का साथ हर हाल में चाहिए। बंटवारे से पहले ईरान हमारा अच्छा पड़ोसी रहा है। ऐतिहासिक और सामाजिक संबंधों के अलावा मजबूत कारोबारी इतिहास है। अमेरिका की भूमिका एक चतुर बनिए की है। एक सीमा के बाद उसे भारत के हितों से कोई लेना देना नहीं है। यह बात हिंदुस्तान को अच्छी तरह समझ लेनी चाहिए। 

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