लावारिस कुत्तों पर मोहाली-पंचकूला गंभीर, यूटी बेपरवाह

Chandigarh Updated Tue, 02 Oct 2012 12:00 PM IST
चंडीगढ़। लावारिस कुत्तों के आतंक के मामले में यूटी प्रशासन की लापरवाही फिर उजागर हुई है। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के निर्देशों के बावजूद चंडीगढ़ नगर निगम ने इन कुत्तों से निपटने के इंतजाम के संबंध में कोई भी जवाब कोर्ट में नहीं दिया है। चीफ जस्टिस एके सीकरी एवं जस्टिस राकेश कुमार जैन पर आधारित खंडपीठ ने सोमवार को यूटी नगर निगम को फटकार लगाते हुए बुधवार तक रिपोर्ट दाखिल करने के निर्देश जारी किए हैं। उधर, मोहाली और पंचकूला नगर निगम ने एफिडेविट दाखिल कर इन कुत्ताें से निपटने के इंतजामाें का पूरा ब्योरा हाईकोर्ट में रख दिया है।
पंचकूला नगर निगम की ओर से अर्बन लोकल बॉडीज डिपार्टमेंट के डिप्टी सेक्रेटरी जगतार सिंह द्वारा एफिडेविट हाईकोर्ट में पेश किया गया। इसमें कहा गया कि पंचकूला एमसी 2010 से ही इस समस्या को लेकर गंभीर है। अक्तूबर 2010 से नवंबर 2011 में 1347 कुत्तों स्टरलाइज किया गया। उन्होंने कहा कि एनिमल बर्थ कंट्रोल रूल्स के तहत इस बार भी टेंडर आमंत्रित किए थे और 24 जुलाई 2012 को एक निजी ठेकेदार को लावारिस कुत्ते पकड़ने का काम सौंप दिया है। उन्होंने कहा कि ठेकेदार को अगले दो सालों के लिए यह काम अलॉट किया है, जबकि इनकी स्टरलाइजेशन के लिए भी तत्काल निर्देश जारी कर दिए जाएंगे। उन्हाेंने आश्वासन दिया कि आगामी दिनाें में पंचकूला में इनकी दहशत नहीं रहेगी। उधर, नगर निगम मोहाली द्वारा हाईकोर्ट में पेश किए गए हलफनामे में कहा है कि लावारिस कुत्ताें को पकड़ने के लिए निगम ने सात कर्मचारियाें को काम पर लगाया है, जबकि इन्हें एक गाड़ी भी मुहैया करवाई गई है। एफिडेविट में कहा है कि सेनिटेरी इंस्टपेक्टर के देखरेख में ऐसे कुत्ताें के स्टरलाइजेशन का काम तेज है। इस काम मेंपशुपालन विभाग के दो चिकित्सकाें को भी जिम्मेवारी सौंपी गई है। एनिमल बर्थ कंट्रोल एक्ट के तहत 2005 से लेकर अभी तक 930 कुत्ताें के आपरेशन किए गए हैं। हाईकोर्ट ने दोनों के एफिडेविट को रिकार्ड में ले लिया। मामले की सुनवाई आगामी बुधवार के लिए निर्धारित की गई है।
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यह है मामला
चंडीगढ़, मोहाली में बढ़ते लावारिस कुत्ताें के आतंक के चलते स्थानीय निवासी कुलदीप सिंह नागरा ने हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की है। याचिका में हाईकोर्ट से आग्रह किया गया है कि इन लावारिस कुत्ताें से बढ़ती घटनाआें को रोकने के लिए यूटी, पंजाब और हरियाणा सरकार को निर्देश जारी किए जाएं। याचिका में कई घटनाआें का हवाला दिया गया था।
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पलसोरा के 294 परिवाराें को राहत की उम्मीद
चंडीगढ़। करीब दस साल बाद यूटी के पलसोरा गांव में उन 294 परिवाराें को राहत की उम्मीद बंधी है, जिनके झुग्गी, झोपड़ी नुमा आवासाें को चंडीगढ़ प्रशासन ने 2003 में एक डिमोलिशन ड्राइव के तहत गिरा दिया था। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने सोमवार को सभी 294 परिवारों को राहत देते हुए यूटी एस्टेट आफिस को निर्देश दिए कि इन परिवाराें की पुनर्वास पर गंभीरता से विचार किया जाए। हाईकोर्ट के जस्टिस जसबीर सिंह एवं जस्टिस रामेश्वर सिंह मलिक पर आधारित खंडपीठ ने यह निर्देश जारी किए हैं। खंडपीठ ने 1979 की अलॉटमेंट स्कीम के तहत योग्य पाए जाने वालाें के लिए तीन महीने में आल्टरनेट व्यवस्था करने के निर्देश दिए। हाईकोर्ट ने कहा कि अगर साइट्स, फ्लैट्स उपलब्ध नहीं हैं, तो उन्हें प्रमुखता से वेटिंग लिस्ट में रखा जाए।
इस मामले में आठ याचिकाआएं हाईकोर्ट में दायर की हैं। याचिका में लाइसेंसिंग ऑफ टीनमेंट्स एंड साइट्स एंड सर्विसेस इन चंडीगढ़ स्कीम, 1979 का हवाला देते हुए कहा गया है डिमोलिशन अभियान के बाद प्रशासन को उन्हें वैकल्पिक व्यवस्था मुहैया करवानी चाहिए थी। याचिका में आगे कहा गया है कि 25 और 26 जून 2003 को डिमोलिशन अभियान के तहत चंडीगढ़ प्रशासन ने 18 अगस्त 2003 को एक अधिसूचना जारी कीह थी कि 1979 स्कीम के तहत डिमोलिशन के दायरे में आए महज उन्हीं लोगों को कंसीडर किया जाएगा, आठ दिसंबर 1996 के बाद से इलेक्ट्रॉल रोल में हैं। इसकी साथ ही प्रशासन ने 6 नवंबर 2006 को 18 गैरकानूनी कालोनियाें के निवासियों के लिए स्कीम नोटिफाई कर दी। इसमें कहा गया कि 2006 की वोटर लिस्ट में जिनका नाम है, चंडीगढ़ स्मॉल फ्लेट स्कीम, 2006 के तहत कंसीडर किए जाएंगे। दायर याचिका में आगे कहा गया कि पलसोरा में जिन लोगाें की झुग्गी झोपड़ियां गिराई गई हैं, उन्हाेंने किसी भी साइट पर गैर कानूनी कब्जा नहीं किया था। याचिका में चंडीगढ़ प्रशासन पर भेदभाव पूर्ण रवैया अपनाने की दलील देते हुए कहा गया कि जिनकी कालोनियां अवैध थी, उन्हें स्मॉल फ्लैट स्कीम 2006 के अंतगर्त रखा गया और जो वैध रूप से रहे थे, उन्हें 1997 की स्कीम के तहत कंसीडर किया गया। इस मामले में प्रशासन ने हाईकोर्ट को बताया कि याचिकार्ताओं ने वैकल्पिक आवासाें की कभी मांग ही नहीं उठाई। इस पर हाईकोर्ट ने पाया कि जिन लोगाें ने किसी भी सरकारी भूमि पर कब्जा नहीं किया था, उन्हें स्माल फ्लेट स्कीम का लाभ नहीं दिया गया, जबकि गैरकानूनी रूप से रह रहे कालोनियां बनाने वालाें को इसके लिए कंसीडर कर लिया। इसके साथ ही पलसोरा कालोनी वालों के पास आवासीय प्रमाण पत्र देखने के बाद हाईकोर्ट ने एस्टेट आफिस को निर्देश जारी कर दिए।

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