भारत की आर्थिक ताकत हिंदी को बनाएगी विश्वभाषा

Chandigarh Updated Mon, 24 Sep 2012 12:00 PM IST
जोहान्सबर्ग। क्या भारत की आर्थिक ताकत हिंदी को विश्वभाषा का दर्जा दिलाने में मददगार साबित हो सकती है। यहां विश्व सम्मेलन के दूसरे दिन हिंदी को संयुक्तराष्ट्र की आधिकारिक भाषा बनाने के मसले पर विचार विमर्श में दिग्गजों का तो यही मानना था। हां यह राय जरूर सभी की थी कि भाषा का प्रचार प्रसार अपनी जगह है लेकिन इसे किसी पर थोपा नहीं जाना चाहिए।
गांधीग्राम में चल रही इस कवायद के दूसरे दिन दिग्गज आलोचक प्रो. नामवर सिंह ने कहा कि हिंदी को प्रोत्साहन तो दिया जाए लेकिन इस क्रम में अन्य भाषाओं का भी सम्मान किया जाना चाहिए। नामवर का कहना था कि इस आयोजन का उद्देश्य हिंदी को अंतरराष्ट्रीय मंच पर परिचित कराना है। चूंकि भारत एक उभरती ताकत है इसलिए हिंदी का निश्चित ही स्वागत किया जाएगा। देश का आर्थिक दबदबा भाषा के प्रचार में काम आना चाहिए। राज्यसभा सांसद कर्ण सिंह का कहना था कि हिंदी सिर्फ उसके मूल बोलने वालों तक सीमित नहीं बल्कि इसका कहीं ज्यादा व्यापक असर है। हालांकि उन्होंने कहा कि कोई भी भाषा थोपी जानी नहीं चाहिए।
सम्मेलन के दौरान भाषा की पहचान और हिंदी का भूमंडलीकरण नामक सत्र में हिंदी के कई दिग्गजों ने प्रचार प्रसार के लिए कई सुझाव पेश किए। अंग्रेजी के खिलाफ भारतीयों के जाग्रत करते हुए स्कूल-कालेजों में माध्यम के रूप में हिंदी को बढ़ावा देने में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के योगदान को भी आयोजन में याद किया गया। गांधीजी ने अंग्रेजी के प्रति मोह की गुलामी मानसिकता को राष्ट्रीय आपदा बताया था।
कैसे तकनीकी भाषा बने
दूसरे दिन हुए सत्रों में सूचना प्रौद्योगिकी विशेषज्ञों ने उच्च तकनीकी क्षेत्र में हिंदी के उपयोग को बढ़ावा देने के लिए नई तकनीके और रणनीति तैयार करने पर जोर दिया। विद्वानों ने दुख व्यक्त किया कि सरकारी दफ्तरों में उपयोग की जाने वाली हिंदी बोली जाने सामान्य हिंदी से बिल्कुल अलग है और इससे कई लोग हिंदी से दूर जा रहे हैं।

वेदालंकार की मौजूदगी का अहसास
जोहान्सबर्ग के जिस सैडटन कन्वेंशन सेंटर (नेल्सन मंडेला सभागार) में नौवां विश्व हिंदी सम्मेलन हो रहा है, वहां लगाई गई पंडित नरदेव नरोत्तम वेदालंकार की प्रतिभा पूरी दुनिया के हिंदी प्रेमियों का ध्यान खींच रही है। दरअसल, दक्षिण अफ्रीका के जिस हिंदी शिक्षा संघ के सहयोग से इस बार सम्मेलन का आयोजन हो रहा है, उसकी नींव वेदांलकार ने ही रखी थी। वैसे तो वह अफ्रीका गए थे गुजराती सीखने, लेकिन हिंदी से इतना प्रेम हो गया कि उन्होंने अपनी अंतिम सांस तक वहां लोगों को हिंदी सिखाई और लोगों को प्रेरित किया। दक्षिण अफ्रीका के विद्वान प्रो. रामभजन सीताराम उन्हीं के शिष्य हैं जो आयोजन में हर स्तर पर जुड़े हैं। दरअसल उनकी सक्रियता वेदालंकार जी की मौजूदगी का अहसास सा करा रही है। सोमवार को प्रो. सीताराम का सम्मेलन में सम्मान किया जाएगा।

अरे! सामने तो ये शेर बैठा है
विश्व हिंदी सम्मेलन में भाग लेने भारतीय प्रतिनिधिमंडल के सदस्यों ने सोमवार सुबह जोहान्सबर्ग के प्रसिद्ध लॉयन पार्क का भ्रमण किया। यहां मौजूद करीब 65 शेरों में कई सफेद भी हैं। जब हम लोग पार्क में शेरों के बारे में आपस में चर्चा ही कर रहे थे कि एकदम पास में श्वेत सिंह भी नजर आ गया। इतना खूबसूरत सिंह इतने पास। हम सबने उसे अपने कैमरे में कैद कर लिया।

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