...ताकि दुनिया में लहराए हिंदी का परचम

Chandigarh Updated Mon, 24 Sep 2012 12:00 PM IST
जोहान्सबर्ग से उदयकुमार
कोई हिंदी के मर्म को समझने के लिए सात समंदर पार से काशी गया तो किसी ने चेक भाषा से हिंदी में अनुवाद के लिए शब्दकोश तैयार किया। कोई इटली में हिंदी सीखने के बाद दिल्ली सिर्फ भारतीय भाषा में महारत हासिल करने के लिए गया। किसी ने तुलसीदास रचित रामचरित मानस का थाई भाषा में अनुवाद किया तो किसी ने युद्धग्रस्त अफगानिस्तान में ‘आओ पश्तो में हिंदी सीखें’ जैसी किताब लिखकर युवाआें को भारत से जोड़ा। ये वे लोग हैं जिन्होंने अंग्रेजी, रूसी और जापानी-जर्मन भाषा वाले देश में जन्म लेकर भी हिंदी की न सिर्फ पढ़ाई की बल्कि भारतीय राजभाषा के प्रचार-प्रसार में अपना जीवन लगा दिया। ऐसे 21 हिंदीसेवकों का स्थानीय गांधीग्राम में चल रहे नौवें विश्व हिंदी सम्मेलन में सोमवार को सम्मानित किया जाएगा।
विदेशी जमीन पर हिंदी की पताका फहराने वाली इन हस्तियों में एक हैं आस्ट्रेलिया के डा. पीटर पी. फ्रीडलैंडर। फ्रीलैंडर ने लंदन जाकर हिंदी में पीएचडी की। इसके बाद वह मेलबर्न स्थित लैट्रोब यूनिवर्सिटी में वरिष्ठ प्राध्यापक बन गए। उन्होंने आस्ट्रेलियाई विश्वविद्यालय के दूर-शिक्षा पाठ्यक्रम में हिंदी को एक विषय के रूप में शामिल कराया। मास्को यूनिवर्सिटी के इंस्टीट्यूट ऑफ ओरियंटल लैंग्वेजेज से हिंदी में स्नातक सर्गे दमित्रियेविच सेरेब्रियानी ने हिंदी के मर्म को समझने के लिए वाराणसी और दिल्ली में रहकर उच्च शिक्षा ली। उन्होंने विद्यापति की कहानियों का रूसी भाषा में अनुवाद किया और रूस में हिंदी के प्रसार में जुटे हैं।
चेक गणराज्य में हिंदी के प्रसार में डा. डागमार मार्कोवा के योगदान को भला कौन भुला सकता है। इतालवी मार्को त्सोली ने हिंदी में पीएचडी के बाद दिल्ली विश्वविद्यालय में अध्यापन किया। आजकल वह वेनिस विवि में हिंदी पढ़ा रहे हैं। थाईलैंड के बमरूंग याम-एक ने तो हिंदी के साथ भारतीय संस्कृति को अपने देश में स्थापित करने का बीड़ा उठा रखा है। उन्होंने तुलसी की रामायण का थाई में अनुवाद किया और इसकी प्रतियां लोगों को खुद दे रहे हैं।
विदेशी हिंदी अध्येताओं का सिलसिला यहीं नहीं थमता। श्रीलंका के उपुल रंजीत हेवातानागामेज तो हिंदी-सिंहली शब्दकोश तैयार करने में रात-दिन एक किए हैं। उधर, बुल्गारिया की वान्या जार्जिया गनचेवा सोफिया ने ऑनलाइन हिंदी-बुल्गारियाई शब्दकोश तैयार किया है।
तालिबान से जूझकर हिंदी को बढ़ाया
तालिबानी कहर से जूझते अफगानिस्तान के जबुल्लाह ‘फीकरी’ ने प्रतिकूल परिस्थितियों में न सिर्फ खुद हिंदी सीखी बल्कि अपने देश के युवाओं को हिंदी सिखा रहे हैं। यूक्रेन की कैटरीना बैलेरिवा दाबन्या ने मीराबाई के गीतों का यूक्रेनी भाषा में अनुवाद किया है। इसके अलावा प्रो. इंदुप्रकाश पांडेय का भी सम्मान किया जा रहा है जिन्होंने छह दशक से सिर्फ विदेशों में हिंदी के सम्मान और प्रसार का काम अपने कंधों पर ले रखा है। जापान के प्रो. तिकेदी इशीदा अपने देश में तैमासिक पत्र ‘हिंदी साहित्य’ का नियमित प्रकाशन कर रहे हैं।


हिंदी को प्रोत्साहन दें, थोपें नहीं
विश्व हिंदी सम्मेलन में भाषायी गौरव का मुद्दा उठा तो विद्वानों ने माना कि हिंदी को प्रोत्साहन तो मिले लेकिन थोपा नहीं जाए। सम्मेलन में हिन्दी की मौजूदा स्थिति और आधिकारिक भाषा के तौर पर इसका स्तर ऊंचा करने की संभावनाओं पर चरचा के लिए जुटे भाषा के दिग्गजों ने माना कि हिन्दी की दुर्दशा के लिए लेखन का गिरता स्तर भी जिम्मेदार है। राज्यसभा सांसद कर्ण सिंह ने कहा कि एक हिंदी सिर्फ उसके मूल बोलने तक सीमित नहीं बल्कि इसका कहीं ज्यादा व्यापक असर है। हालांकि उन्होंने कहा कि कोई भी भाषा थोपी जानी नहीं चाहिए। भाषा की पहचान और हिन्दी का ग्लोबलाइजेशन विषय पर कई विद्वानों ने अपने विचार रखे। प्रख्यात आलोचक नामवर सिंह ने कहा कि हिंदी को प्रोत्साहन तो दिया जाए लेकिन इस क्रम में अन्य भाषाओं का भी सम्मान किया जाना चाहिए। सिंह का कहना था कि भारत एक उभरती ताकत है और इसका आर्थिक दबदबा ही भाषा के विश्वव्यापी प्रसार के लिए पर्याप्त है।

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