सुस्त प्रशासन, जान पर आफत

Chandigarh Updated Tue, 24 Jul 2012 12:00 PM IST
चंडीगढ़। जिस शहर को मेडिकल हब बनाने की बात की जा रही है, वहां के सरकारी अस्पतालों में दुर्घटना में घायल गंभीर मरीजों की प्लास्टिक और न्यूरो सर्जरी तक की सुविधा नहीं है। मजबूरी में मरीजों को पीजीआई में भेजना पड़ता है, लेकिन वहां भी ओटी स्टाफ के न होने की वजह से उन्हें सर्जरी के लिए लंबा इंतजार करना पड़ता है। यदि यूटी प्रशासन अपने अस्पतालों में ही यह सुविधा उपलब्ध करवाए तो मरीजों को बेहतर इलाज मिल सकता है और पीजीआई का बोझ भी कम होगा।

यह कैसा सुपर मल्टीस्पेशियलटी हास्पिटल
पूर्व प्रशासक एसएफ रोड्रिग्स ने 2007 में सेक्टर-16 के जनरल अस्पताल का नाम बदलकर सुपर स्पेशियलटी हास्पिटल कर दिया था, लेकिन पांच साल बाद भी इस अस्पताल में सुपर स्पेशियलिटी के नाम पर कुछ नहीं हुआ। एक न्यूरोसर्जन ने ज्वाइन भी किया था, वह अब जीएमसीएच-32 में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। सुपर स्पेशियलिटी हास्पिटल के नाम पर 20 करोड़ रुपये से ऊपर की ओपीडी बिल्डिंग बनवाई जा रही है, जो अब तक तैयार ही नहीं हुई।

इतने हैं शहर में विशेषज्ञ डॉक्टर
-जीएमसीएच-32 में एक भी प्लास्टिक सर्जन नहीं, जबकि केवल एक न्यूरोसर्जन हैं।
-जनरल अस्पताल-16 में प्लास्टिक और न्यूरोसर्जन नहीं हैं।
-इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के आंकड़ों के मुताबिक पूरे शहर में सिर्फ तीन प्लास्टिक सर्जन और चार न्यूरोसर्जन हैं।
(पीजीआई की संख्या : पीजीआई में 11 न्यूरोसर्जन और पांच प्लास्टिक सर्जन)

इतने आते हैं मरीज
जीएमसीएच-32 में रोजाना औसतन 28 से 30 एक्सीडेंटल केस आते हैं, जबकि जनरल अस्पताल-16 में भी इतने ही मरीज आते हैं। दोनों अस्पतालाें से चार से पांच गंभीर मरीजों को पीजीआई रेफर किया जाता है। ये वह मरीज होते हैं जिनको आर्थो के साथ-साथ न्यूरो, प्लास्टिक और जनरल सर्जरी की जरूरत होती है। शहर के सभी प्राइवेट अस्पतालों में औसतन 15 मरीज दुर्घटना में घायल होकर इलाज कराने पहुंचते हैं।

कोई आवेदक चिकित्सक ही नहीं आया
कई बार प्लास्टिक सर्जरी और न्यूरोसर्जरी विभाग में चिकित्सकों के पदों को भरने के लिए विज्ञापन दिया गया, लेकिन किसी डॉक्टर ने आवेदन ही नहीं किया। अब जल्द ही फिर से आवेदन के लिए विज्ञापन निकाला जाएगा। उसके बाद मेडिकल कॉलेज में ही ट्रामा के मरीजों को बेहतर इलाज मिलेगा।
- प्रो. राज बहादुर, डायरेक्टर प्रिंसिपल, जीएमसीएच।

वर्जन
यह अस्पताल तो सामान्य अस्पताल है। यहां पर विशेषज्ञ चिकित्सक नहीं होते। बावजूद मेरी कोशिश है कि यहां पर कुछ विशेषज्ञता वाले चिकित्सक आ जाएं। विशेषज्ञता वाले विभागों में एडहॉक के आधार पर आवदेन निकाले जाएंगे।
- डॉ. चंद्र मोहन, स्वास्थ्य निदेशक

वर्जन
ट्रामा सेंटर के लिए समय-समय पर फंड मिल रहा है। इस सेंटर का काम जल्द ही शुरू करा दिया जाएगा। रही बात शहर में सुपर स्पेशियलिटी डॉक्टरों की, तो मेडिकल कॉलेज में आवेदन आमंत्रित करने के बाद भी कोई नहीं पहुंचा। अब जल्द ही फिर से आवेदन के लिए आमंत्रित किया जाएगा।
- अनिल कुमार, स्वास्थ्य सचिव


प्लास्टिक और न्यूरोसर्जरी में महज छह सीटें
पीजीआई में एमएस करने के बाद एक सत्र में तीन प्लास्टिक सर्जरी और तीन न्यूरोसर्जरी की सुपरस्पेशियलिटी में एमसीएच डिग्री के लिए प्रवेश मिलता है। एमसीएच करने में तीन साल का वक्त लगता हैं। - नरेश विर्दी, रजिस्ट्रार, पीजीआई

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