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स्वतंत्रता संग्रामी: लाहौर जेल में नौ माह रहे मोहकम सिंह, सहा अत्याचार, पानी तक मुश्किल से देते थे

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, पटियाला (पंजाब) Published by: ajay kumar Updated Mon, 15 Aug 2022 07:31 AM IST
सार

98 वर्षीय मोहकम सिंह बताते हैं कि उनका जन्म 1924 में पाकिस्तान के पंजाब में हुआ था। पिता जत्थेदार वरियाम सिंह ने उन्हें देश की आजादी के आंदोलन में हिस्सा लेने को प्रेरित किया। पिता कहते थे जिस देश ने उन्हें सब कुछ दिया, अगर उसके लिए जान भी कुर्बान कर दी तो खुशी की बात होगी। 

मोहकम सिंह।
मोहकम सिंह। - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
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विस्तार

स्वतंत्रता सेनानी मोहकम सिंह को देश सेवा का जज्बा परिवार से विरासत में मिला। पिता जत्थेदार वरियाम सिंह साल 1919 में गुरु का बाग दा मोर्चा में भाग लेते हुए गिरफ्तार हुए थे। चाचा प्रीतम सिंह जैतों दा मोर्चा में शामिल हुए थे। पिता व चाचा को देखकर मोहकम सिंह में भी बचपन से ही देश को अंग्रेजों से आजाद कराने की ललक पैदा हो गई थी। 16 साल की छोटी उम्र में जब बच्चे खेल व पढ़ाई में मस्त रहते हैं, तब वह आजादी के दीवानों के जलसों में शामिल होने लग पड़े थे।



इसी दौरान अगस्त 1942 में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने जब भारत छोड़ो आंदोलन शुरू किया तो मोहकम सिंह भी इसमें शामिल हो गए। उस समय उनकी आयु 19 साल की थी। 9 अगस्त 1942 को मोहकम सिंह को अंग्रेजों ने गिरफ्तार करके नौ महीने के लिए लाहौर की सेंट्रल जेल में डाल दिया था। मोहकम सिंह ने बताया कि इस दौरान स्वतंत्रता सेनानियों के हौसले तोड़ने के लिए अंग्रेजों ने उन पर हर तरह का अत्याचार किया। उन्हें खाने को रोटी तक नहीं दी जाती थी। केवल भुने चने मिलते थे और पीने के लिए पानी भी मुश्किल से देते थे। 


पाकिस्तान के पंजाब में हुआ था मोहकम सिंह का जन्म
98 वर्षीय मोहकम सिंह बताते हैं कि उनका जन्म 1924 में पाकिस्तान के पंजाब में हुआ था। पिता जत्थेदार वरियाम सिंह ने उन्हें देश की आजादी के आंदोलन में हिस्सा लेने को प्रेरित किया। पिता कहते थे जिस देश ने उन्हें सब कुछ दिया, अगर उसके लिए जान भी कुर्बान कर दी तो खुशी की बात होगी। 

लाहौर जेल से बाहर आने के बाद भी वह डरे नहीं और आजादी आंदोलन में डटे रहे। 15 अगस्त 1947 को देश आजाद हो गया लेकिन बंटवारे के बाद वह भारत के पंजाब में पटियाला के अराई माजरा में आकर बस गए। आजादी के बाद भी देश के लिए सेवा का जज्बा खत्म नहीं हुआ। जब भारत सरकार ने कहा कि देश में भुखमरी है और जनता को अनाज की जरूरत है, तो जी-जान से खेतीबाड़ी में जुट गए।

महंगाई के हिसाब से पेंशन कम, अस्पतालों में भी सुविधाएं नहीं
मोहकम सिंह का कहना है कि उन्हें उन्हें सरकारों से कुछ शिकायतें भी हैं। महंगाई के इस जमाने में केवल साढ़े सात हजार रुपये महीने की पेंशन मिलती है। इसमें गुजारा नहीं हो पाता है। सरकारी अस्पतालों में इलाज के लिए चले जाओ, तो वहां न तो उचित चिकित्सा सुविधाएं हैं और न ही दवाएं। ऐसे में महंगाई के इस दौर में निजी अस्पतालों में इस कम पेंशन में इलाज कराना मुश्किल होता है। उन्होंने मांग की है कि उनके परिवार के कम से कम एक सदस्य को सरकारी नौकरी दी जाए।

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