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पीजीआई के विशेषज्ञों का कमाल: कालाजार के परजीवी से ही बना दिया ‘रक्षा कवच’, चूहे पर शोध में मिली सफलता

वीणा तिवारी, अमर उजाला, चंडीगढ़ Published by: निवेदिता वर्मा Updated Thu, 24 Nov 2022 09:43 AM IST
सार

शोध के प्रमुख अनुसंधानकर्ता व पीजीआई इम्यूनोपैथालॉजी विभाग के प्रो. सुनील अरोड़ा ने बताया कि कालाजार जैसे संक्रमण में अगर अनदेखी की गई तो मरीज की जान बचानी मुश्किल हो सकती है इसलिए बचाव के लिए वैक्सीन बनाने पर व्यापक स्तर पर काम हो रहा है।

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विस्तार

चंडीगढ़ पीजीआई के विशेषज्ञों ने कालाजार रोग फैलाने वाले परजीवी से ही ऐसा वैक्सीन तैयार किया है जो मर्ज बढ़ाने के बजाय रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करेगा यानी संक्रमण फैलाने वाले से ही रक्षा कवच बनाने का काम किया गया है। इस वैक्सीन की मदद से संक्रमित मरीज की जान बचाने में मदद मिलेगी। विशेषज्ञों ने अपने शोध को हैमस्टर्ड (भूरे रंग का चूहा) पर सफलता पूर्वक पूरा कर लिया है। इसमें शत प्रतिशत परिणाम प्राप्त हुआ है। विश्व स्तर पर सराहा जा रहा यह शोध वैक्सीन्स जनरल में प्रकाशित हुआ है। 



शोध के प्रमुख अनुसंधानकर्ता व पीजीआई इम्यूनोपैथालॉजी विभाग के प्रो. सुनील अरोड़ा ने बताया कि कालाजार जैसे संक्रमण में अगर अनदेखी की गई तो मरीज की जान बचानी मुश्किल हो सकती है इसलिए बचाव के लिए वैक्सीन बनाने पर व्यापक स्तर पर काम हो रहा है। पीजीआई द्वारा किया गया शोध अपने परिणाम के कारण बेहद खास है। इस शोध में पहली बार शत प्रतिशत परिणाम हासिल हुआ है। इसमें जितने चूहों को शामिल किया गया था उनमें से एक में भी संक्रमण का स्तर नहीं बढ़ा। सभी चूहे सुरक्षित पाए गए। उनके लिवर और प्लीहा पर भी कोई प्रभाव नहीं पड़ा। 


विशेषज्ञों ने दो चरण में पाई सफलता 
डॉ. सुनील ने बताया कि शोध के पहले चरण में कालाजार के परजीवी से जीन प्रोटीन चिह्नित किए गए। उसे हैमस्टर्ड चूहों को वैक्सीन फॉर्म में दिया गया। कुछ दिनों की निगरानी के बाद पाया गया कि उनमें से 70 प्रतिशत चूहे तो सुरक्षित हैं लेकिन 30 प्रतिशत की स्थिति गंभीर हो गई। इसके बाद अगले चरण का कार्य शुरू किया गया। इसमें परजीवी से निकाले गए जीन की जांच की गई। उस जीन में कुछ सेल मिले जो प्रतिरोधक क्षमता को कमजोर करते हैं बाकि मजबूत करने वाले थे। इसके बाद जीन में से नकारात्मक सेल को अलग कर सकारात्मक वाले को एकत्र किया गया। फिर सकारात्मक सेल को मल्टी-एपिटोप वैक्सीन के रूप में चूहों को दिया गया। इससे उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता तेजी से बढ़ी और उन पर कालाजार का प्रभाव न के बराबर हो गया। 

क्या है कालाजार रोग  
कालाजार धीरे-धीरे पनपने वाला रोग है। यह रोग लीश्मैनिया जीनस के प्रोटोजोआ परजीवी के कारण होता है। भारत में केवल लीश्मैनिया डोनोवानी परजीवी इस रोग का कारण है। यह परजीवी मुख्य रूप से रैटिकुलोऐंडोथैलियल प्रणाली को संक्रमित करता है तथा यह अधिकता में अस्थि मज्जा, प्लीहा तथा यकृत में पाया जाता है। यह रोग मादा फ्लेबोटोमिन सैंडफ्लाइज (बालू मक्खी) के काटने के कारण होता है, जो लीश्मैनिया डोनोवानी परजीवी का वैक्टर है। इसका आकार मच्छर का एक चौथाई होता है। इस मक्खी के शरीर की लंबाई 1.5 से 3.5 मिमी होती है। कालाजार या काला बुखार की बीमारी बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल के लिए स्थानिक है, जिसमें अनुमानित 16 करोड़ 54 लाख लोग इसके जोखिम में हैं। 

कालाजार के लक्षण  
- रुक-रुक कर बुखार आना या अक्सर दोहरा जाने वाला बुखार
- भूख का कम हो जाना और लगातार वजन गिरना
- मरीज को एनीमिया हो जाता है 
- मक्खी के काटे हुए जगह पर घाव हो जाता है, घाव कुष्ठ रोग जैसा दिखता है 
- प्लीहा और लिवर को नुकसान पहुंचता है

स्थिति हो सकती है बेहद गंभीर 
कालाजार गंभीर रक्तस्राव, संक्रमण और चेहरे की कुरूपता का कारण बन सकता है। लिवर और प्लीहा के संक्रमण की गंभीरता से इसमें मरीज की मौत भी हो सकती है। यह गंभीर अल्सर चेहरे को डिफिगर कर सकता है, ऐसे मामलों में प्लास्टिक सर्जरी की आवश्यकता होती है। 

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