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93 अरब डॉलर का बाजार बनेगा को-लिविंग क्षेत्र, बढ़ रही है मांग

बिजनेस डेस्क, अमर उजाला Updated Wed, 12 Jun 2019 08:41 PM IST
co-living sector demand increases, will earn 93 billion dollar in a year
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खास बातें

  • छात्रों और पेशेवरों की बढ़ती मांग से देश में बढ़ रहा को-लिविंग कल्चर
  • 4.63 करोड़ बेड की जरूरत है को-लिविंग क्षेत्र में
  • 33,000 रुपये तक मासिक किराया खर्च करने को तैयार हैं उपभोक्ता
  • सेवाओं की खराब गुणवत्ता और विश्वास में कमी उपभोक्ताओं के लिए चिंता के विषय
छात्रों और पेशेवरों की बढ़ती मांग के कारण को-लिविंग क्षेत्र में सालाना 93 अरब डॉलर (करीब 6.5 लाख करोड़ रुपये) का बाजार बनने की क्षमता है। हाउसिंग ब्रोकरेज कंपनी प्रोपटाइगर डॉट कॉम के सर्वे में कहा गया है कि इस क्षेत्र में वृद्धि के लिए सेवाओं की गुणवत्ता में सुधार और किराया प्रक्रिया में पारदर्शिता जरूरी है। को-लिविंग आवास का एक ऐसा आधुनिक रूप है, जहां उपभोक्ता रहने के स्थान को आपस में साझा करते हैं।
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सर्वे रिपोर्ट में बताया गया है कि ब्रांड में विश्वास और खोजने में आसानी के कारण को-लिविंग आवास की मांग बढ़ रही है। ऐसे आवास की तलाश के लिए उपभोक्ता ऑनलाइन माध्यमों का सहारा लेते हैं। इनमें फेसबुक समूह भी शामिल हैं। इसके अलावा उपभोक्ता को-लिविंग आवास खोजने के लिए ब्रोकर सहित विभिन्न ऑफलाइन माध्यमों पर भी निर्भर रहते हैं। हालांकि, सेवाओं की खराब गुणवत्ता, खराब रखरखाव और सेवा प्रदाता को लेकर विश्वास में कमी उपभोक्ताओं के लिए चिंता के विषय हैं। इन मुद्दों पर सेवा प्रदाताओं को विचार करना होगा। 

गुणवत्ता पर खर्च करते हैं उपभोक्ता

को-लिविंग क्षेत्र में कुल करीब 4.63 करोड़ बेड की जरूरत है। इसमें 89 लाख बेड की आवश्यकता सिर्फ छात्रों की जरूरतें पूरी करने के लिए है। सर्वे में शामिल उत्तरदाता आवास के लिए मासिक 4,500 रुपये से लेकर 33,000 रुपये तक खर्च करने को तैयार हैं। हालांकि, यह खर्च कमरे में बेड की संख्या, सेवाओं की गुणवत्ता, ब्रांड और सुविधाओं के आधार होता है। को-लिविंग आवास में रहने के लिए उपभोक्ताओं के समय को लेकर बड़ा फर्क है। कई उपभोक्ता को-लिविंग में पांच साल तक रहे, जबकि कुछ ने तीन महीने में ही छोड़ दिया।

भारत बन सकता है अग्रणी

रियल इस्टेट सर्विस कंपनी जेएलएल के एक अध्ययन में कहा गया है कि अगले 15 साल में शहरों में बढ़ने वाली 15 करोड़ की आबादी को-लिविंग कल्चर में भारत को एशिया-प्रशांत क्षेत्र में अग्रणी बना देगी। इसमें कहा गया है कि युवा पीढ़ी, उपभोक्ताओं की बदलती प्रवृत्ति और भारतीय बाजारों की प्रगति से बिल्डर और स्टार्टअप कंपनियां को-लिविंग बाजार में कदम रख रही हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, देश में ज्यादातर लोगों के पास कोई स्थायी या ज्यादा आय नहीं है। बड़े शहरों और महानगरों में मकान तलाशना भयावह अनुभव हो सकता है। ऐसे में देश में पढ़े-लिखे लोगों की बढ़ती संख्या इस क्षेत्र की वृद्धि में मददगार साबित हो सकती है। 

को-लिविंग बाजार की वृद्धि में कई रोड़े

सर्वे में कहा गया है कि किराये की प्रक्रिया में पारदर्शिता का अभाव और सेवा प्रदाताओं का सुविधाओं को लेकर अनुत्तरदायी दृष्टिकोण कुछ ऐसे कारक हैं, जो को-लिविंग आवास की अवधारणा के खिलाफ हैं। इस कारण उपभोक्ताओं को पारंपरिक आवास की ओर रुख करना पड़ता है। अगर उपभोक्ताओं को सिक्योरिटी डिपॉजिट का भुगतान करने के लिए बाध्य नहीं किया जाए तो यह सेगमेंट बेहतर प्रदर्शन कर सकता है। वहीं, कई उत्तरदाताओं का मानना है कि को-लिविंग आवास में रहना तभी बेहतर है, जब इसका किराया इंडिपेंडेंट आवास की तुलना में कम हो। 

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