निवेश के मंत्र 60: साझा होम लोन पर सात लाख तक बचा सकते हैं टैक्स, अपनाने होंगे ये तरीके

प्रमोद तिवारी, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Mon, 10 Aug 2020 08:33 AM IST
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आयकर के पुराने स्लैब के तहत करदाता कई तरह के टैक्स छूट का दावा करते हैं, जिनमें होम लोन सबसे आकर्षक विकल्प है। साझा होम लोन में सिर्फ कर्ज की राशि बढ़ जाती है बल्कि टैक्स छूट भी दोनों को अलग-अलग मिलती है। आईटीआर में साझा लोन पर कितना और कैसे टैक्स क्लेम कर सकते हैं।  
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बैंकबाजार डॉटकॉम के वाइस प्रेसिडेंट पंकज बंसल का कहना है कि कामकाजी दंपति के लिए होम लोन पर टैक्स छूट का दावा काफी फायदेमंद होता है। इससे एक तरफ तो लोन के लिए उनकी योग्यता बढ़ जाती है और बैंक में ज्यादा राशि कम ब्याज दर पर देने को तैयार हो जाते हैं।
वहीं आयकर की धारा 24 (बी) के तहत होम लोन के ब्याज पर व्यक्तिगत करदाता 2 लाख तक और धारा 80(सी) के तहत मूलधन पर 1.5 लाख रुपए टैक्स छूट का दावा कर सकते हैं इस तरह एक करदाता को 3.5 लाख रुपए तक टैक्स छूट मिल जाती है होम लोन पर। वही साझा होम लोन में दंपति अपने अपने आईटीआर में इसका दावा अलग-अलग कर सकते हैं और कुल टैक्स छूट 7 लाख हो जाएगी।
मालिकाना हक और लोन दोनों में हिस्सदारी जरूरी
आयकर की धारा (26) के तहत साझा होम लोन पर टैक्स छूट के लिए पति-पत्नी का मकान पर मालिकाना हक जरूरी है। लोन में भी दोनों की  हिस्सेदारी चाहिए। अगर सिर्फ होम लोन की योग्यता बढ़ाने के लिए साझा कर्जदार बनाया है, तो छूट का दावा सिर्फ वही व्यक्ति कर सकेगा जो मालिक होगा।

वहीं, मालिकाना हक व लोन में दोनों का नाम है लेकिन ईएमआई सिर्फ एक ही व्यक्ति दे रहा है तो टैक्स छूट का दावा भी ईएमआई देने वाला ही करेगा। साझा आवेदन से लोन की योग्यता बढ़ जाती है बैंक कम ब्याज दर पर होम लोन दे सकते हैं। लोन के आवेदन में दोनों के मालिकाना हक की हिस्सेदारी नहीं लिखी है तो बैंक से 50-50 फीसदी मानते हैं।

ऐसे समझें गणित... ईएमआई में जितना हिस्सा उतना ज्यादा क्लेम
मान लीजिए किसी दंपति ने शादी में मकान खरीदा और बैंक से लोन भी दोनों के नाम पर ही मिला है। अब टैक्स छूट का बंटवारा मकान खरीदते समय किए डाउन पेमेंट और लोन की ईएमआई में सवारी के आधार पर तय हुआ और दोनों डाउन पेमेंट और ईएमआई में बराबर भागीदारी करते हैं, तो टैक्स छूट का लाभ भी बराबर मिलेगा।

ऐसा नहीं होने पर जो ज्यादा ईएमआई देगा उसे छूट भी ज्यादा मिलेगी। हालांकि, यह है 3.5 लाख रुपये से ज्यादा नहीं हो सकती है। बैंक लोन देते समय ही साझा आवेदक से हिस्सेदारी को लेकर एमओयू कराते हैं। एक बार कर्ज हिस्सेदारी तय हो जाए तो बदला नहीं जा सकता। यानी अगर दोनों में से किसी भी की नौकरी जाती है या वित्तीय संकट आता है तो भुगतान अनुपात में ही होना चाहिए, भले ही पैसा एक व्यक्ति ही क्यों ना दे रहा हो।

कर्जधारक बरतें सावधानी..
सबसे पहले तो मकान खरीदते समय यह दोनों का नाम ऑनरशिप में जरूर शामिल कराएं। इससे बैंक को भी साझा लोन देने में आसानी होगी। क्योंकि विवाद की स्थिति में दोनों के पास प्रॉपर्टी की जारी रहेगी। इसके बाद अपनी राय और टैक्स देनदारी के हिसाब से लोन में भी पहले से हिस्सा तय कर लेना चाहिए।

 बलवंत जैन चीफ एडिटर, अपना पैसा
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