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देश को क्यों पड़ी निजीकरण की जरूरत? जानिए क्या है इसका महत्व और सरकार का लक्ष्य

बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: ‌डिंपल अलावाधी Updated Thu, 04 Mar 2021 07:08 PM IST

सार

निजीकरण' एक बार फिर से सार्वजनिक बहस में लौट आया है। हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गैर-रणनीतिक सार्वजनिक उपक्रमों के निजीकरण का जोरदार तरीके से समर्थन करते हुए कहा था कि 'व्यवसाय करना सरकार का काम नहीं है।'
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देश को क्यों पड़ी निजीकरण की जरूरत?
देश को क्यों पड़ी निजीकरण की जरूरत? - फोटो : pixabay
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विस्तार

उनकी सरकार रणनीतिक क्षेत्रों में कुछ सार्वजनिक उपक्रमों को छोड़कर बाकी क्षेत्रों में सरकारी इकाइयों का निजीकरण करने को प्रतिबद्ध है। इस समय केंद्र सरकार विनिवेश पर ज्यादा ध्यान दे रही है। सरकारी बैंकों में हिस्सेदारी बेचकर सरकार राजस्व को बढ़ाना चाहती है। 
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  • वर्ष 1991-92 में सरकार ने विनिवेश द्वारा 2500 करोड़ रुपये जुटाने का लक्ष्य रखा था। सरकार उस लक्ष्य से 3040 करोड़ अधिक जुटा पाने में सफल रही।
  • वर्ष 2013-14 में लक्ष्य तो लगभग 56,000 करोड़ के विनिवेश का था, पर उपलब्धि लगभग 26,000 करोड़ की रही। 
  • सरकार साल 2017-18 में एक लाख करोड़ तो इसके एक साल बाद 80,000 करोड़ के लक्ष्य की तुलना में 85,000 करोड़ जुटाने में कामयाब रही थी।
  • सरकार ने 2021-22 में विनिवेश से 1.75 लाख करोड़ रुपये जुटाने का लक्ष्य रखा है। 
  • इससे पहले 2019-20 के अंतरिम बजट के दौरान, सरकार ने कहा था कि विनिवेश के जरिए उनका 90 हजार करोड़ रुपये जुटाने का लक्ष्य है। बाद में सरकार ने इस लक्ष्य को बढ़ाकर 1.05 लाख करोड़ रुपये कर दिया था।
  • बीते वित्तीय वर्ष में सरकार का यह अभियान औंधे मुंह गिरा। कोरोना महामारी के कारण सरकार महज 19,499 करोड़ ही जुटा पाई।
क्या कहते हैं आलोचक?
इस प्रक्रिया के आलोचकों का कहना है कि सार्वजनिक उपक्रमों की परिसंपत्तियों को औने-पौने दामों में निजी व्यापारियों को बेचा जा रहा है। दूसरे शब्दों में, इस प्रक्रिया से सरकार को बहुत घाटा उठाना पड़ रहा है। साथ ही, विनिवेश से प्राप्त राशि का उपक्रमों के विकास के लिए प्रयोग नहीं किया गया, न ही इसे सामाजिक आधारिक संरचनाओं के निर्माण पर खर्च किया गया। यह राशि सरकार के बजट के राजस्व घाटे को कम करने में ही लग गई। 
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