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दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा न देना जनता के मताधिकार का अपमान: गोपाल राय

गोपाल राय, नेता, आम आदमी पार्टी Updated Sun, 17 Mar 2019 05:02 PM IST
दिल्ली आज क्यों पूर्ण राज्य का दर्जा मांग रही है? इस सवाल के तार इतिहास से जुड़े हैं। 1911 में दिल्ली ब्रिटिश इंडिया की राजधानी बनाई गई।
दिल्ली आज क्यों पूर्ण राज्य का दर्जा मांग रही है? इस सवाल के तार इतिहास से जुड़े हैं। 1911 में दिल्ली ब्रिटिश इंडिया की राजधानी बनाई गई।
दिल्ली आज क्यों पूर्ण राज्य का दर्जा मांग रही है? इस सवाल के तार इतिहास से जुड़े हैं। 1911 में दिल्ली ब्रिटिश इंडिया की राजधानी बनाई गई। तब से लेकर आजादी तक दिल्ली को चीफ कमिश्नर के अधीन रखा गया। 1947 में पट्टाभि सीतारमैया कमेटी बनाई गई। इसमें सुझाव दिया कि दिल्ली को केंद्र के निर्देश पर नियुक्त लेफ्टिनेंट गवर्नर के अधीन संचालित किया जाए। 1950 के बाद राजधानी क्षेत्र होने के साथ दिल्ली की बढ़ती आबादी और महत्व के कारण इसे एक विशेष राज्य बनाने की जरूरत महसूस की गई।
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नेहरू सरकार ने यह व्यवस्था की कि दिल्ली में चुनाव होंगे और इसकी अलग रूपरेखा निर्धारित की जाएगी। इसके तहत 1951 में श्री ब्रह्मप्रकाश को दिल्ली का पहला मुख्यमंत्री बनाया गया। लेकिन मुख्यमंत्री और लेफ्टिनेंट गवर्नर के बीच अधिकारों व निर्णय लेने में आई मुश्किलों की वजह से मुख्यमंत्री ने इस्तीफा दे दिया। 1956 में ‘स्टेट रि-ओर्गेनाइज़ेशन ऐक्ट’ के तहत मुख्यमंत्री पद को खत्म करके दिल्ली की कमान लेफ्टिनेंट गवर्नर को सौंप दी गई। 

'दिल्ली के पूर्ण राज्य के दर्जे पर भाजपा-कांग्रेस करती रही टालमटोल, पुरानी है यह लड़ाई'
1987 में ‘बालाकृष्णन समिति’ ने सुझाव दिया कि दिल्ली में विधानसभा हो, जिसे जमीन, पुलिस और पब्लिक ऑर्डर को छोड़कर राज्य सूची से संबन्धित विषयों पर कानून बनाने का हक मिले। इस समिति के सुझावों को मानते हुए ही 1993 में भाजपा के मदन लाल खुराना के नेतृत्व में दिल्ली की चुनी हुई सरकार गठित हुई। दिल्ली को पूर्ण राज्य बनाने की लड़ाई आज की नहीं है। 90 के दशक से भाजपा और कांग्रेस दोनों इस सवाल को उठाती रही हैं।

दोनों पार्टियों ने पूर्ण राज्य के सवाल को अपने चुनावी मेनिफेस्टो में भी रखा। लेकिन इसके क्रिर्यान्वयन में कोई गंभीरता नहीं दिखाई। पूर्ण राज्य के सवाल से बचने के लिए ये दोनों दल कभी केंद्र तो कभी दिल्ली विधानसभा में अपनी सरकार न होने को वजह बताते रहे। लेकिन ऐसे भी मौके आए, जब केंद्र और दिल्ली विधानसभा दोनों में एक ही दल की सरकारें थीं। यह मौका भाजपा और काांग्रेस दोनों को मिला। लेकिन दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने के मसले पर ये टालमटोल करते रहे, कोई ठोस कदम नहीं उठाए। 

'भाजपा और कांग्रेस दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देने के पक्ष में नहीं हैं'
आज भी इस मसले पर इन दोनों दलों का रुख दिल्ली को पूर्ण राज्य देने के हक में नहीं है। वर्तमान दिल्ली भाजपा अध्यक्ष मनोज तिवारी ने तो यहां तक कह दिया कि दिल्ली पूर्ण राज्य बन ही नहीं सकती। कांग्रेस का स्टैंड भी इससे बहुत अलग नहीं है। अब यह समझने में दिक्कत नहीं होनी चाहिए कि भाजपा और कांग्रेस दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देने पक्ष में ही नहीं है। पूर्ण राज्य की मांग इनके लिए ‘चुनावी जुमला’ भर है।  आज दिल्ली का शासन एक पंचमेल खिचड़ी की तरह है, जिसे कई निकाय मिलकर चलाते हैं। इनमें कुछ तो पूर्ण रूप से स्वायत हैं, कुछ सीधे सीधे केंद्र द्वारा संचालित किए जाते हैं। थोड़े अधिकार दिल्ली की चुनी हुई सरकार के पास भी हैं, जो अपने आप में बेहद सीमित और दिल्ली की तरक्की के लिए नाकाफी हैं। 
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