बीस रातें ट्रेन में...

सुदीप ठाकुरसुदीप ठाकुर Updated Wed, 27 Dec 2017 05:56 PM IST
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अपनी पिछली पोस्ट... वे चार और मेधा बहन,  में मैंने अपनी अहमदाबाद यात्रा का जिक्र किया था, जहां मुझे मेट्रोपोलिटिन मजिस्ट्रेट की अदालत में मेधा पाटकर पर 2002 में हुए हमले से जुड़े मामले में हो रहे क्रास एक्जामिनिसेशन को देखने का मौका मिला था। ताजा ब्लाग उस यात्रा की अगली और अंतिम कड़ी के रूप में.... अहमदाबाद  पहुंचने के बाद 7 अक्टूबर की सुबह जब मैंने अपने टैक्सी ड्राइवर मनीष पटेल से कहा कि मुझे मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट कोर्ट चलना है, तो उसे थोड़ी हैरत हुई। उसने पूछा... कोई मामला है क्या साहब! मैंने कहा, नहीं, वहां मुझे मेधा पाटकर से मिलना है, उनसे मिलने ही मैं दिल्ली से आया हूं। वहां उनका कोई मामला चल रहा है। अच्छी कद काठी के खांटी गुजराती व्यवसायी जैसे लगने वाले मनीष ने कहा, नाम कुछ सुना सा लग रहा है.... ये कोई हीरोइन है न..। मैं उसे बताता हूं कि फिल्मों से उनका कोई लेना-देना नहीं है, वह एक सोशल वर्कर हैं। कोर्ट पहुंचने के बाद मनीष से मैंने वहीं ठहरने के लिए कहा और जब मैं लौटा तो शाम के सात बज रहे थे। मेधा पाटकर को देखने के बाद मनीष ने मुझसे धीरे से कहा, अरे साहब इनको तो खूब बार देखा है...। मनीष बोलता है कि साहब आप तो दिनभर यहीं रह गए, गाड़ी तो अभी सिर्फ तीन किमी ही चली है...। मैं उससे नहीं कह पाता कि दूरियां सिर्फ किमी से नहीं नापी जाती....! मेरे पास अब तीन घंटे रह गए थे। मुंबई की ट्रेन रात दस बजे थी, गुजरात मेल...जिसमें मैं मेधा पाटकर का सहयात्री था। मेधा को कोई एक-डेढ़ घंटे का काम था, उन्हें किसी से मिलना था। तय हुआ कि हम नौ-साढ़े नौ बजे तक स्टेशन पहुंच जाएं। मैंने मनीष पटेल से पूछा इन दो घंटों में हम कहां जा सकते हैं। मैं गांधी आश्रम जाना चाहता था। मगर मुश्किल यह थी कि शाम होने की वजह से ट्रैफिक कुछ ज्यादा था। फिर भी मनीष को यह प्रस्ताव जम गया। अहमदाबाद के बारे में मैं कोई राय नहीं बना सका हूं। हालांकि दो वजहें हैं, जो मुझे इस शहर की ओर खींच रही थीं... एक तो साबरमती नदी के किनारे स्थित गांधी आश्रम और दूसरा 2002 के दंगे...।  साबरमती के तीसरे पुल को पार करते हुए हम गांधी आश्रम के सामने पहुंच चुके थे। इस बीच पुराने अहमदाबाद से गुजरते हुए मनीष को मैंने टटोला, 2002 के बाद तो यहां तो सब कुछ बदल गया होगा? तंग और भीड़ भरी सड़क से गुजरते हुए उसने medha 1बताया कि पहले तो स्थिति यह थी कि दो साइकिलें भी टकरा जाएं तो दंगे हो जाते थे....। मगर अब ट्रक भी ठोकर मार दे तो कुछ नहीं होता। सब तरफ शांति है! अब हम गहराती शाम के अंधेरे में गांधी आश्रम के सामने थे। बाहर से लग रहा था कि यह बंद है। मनीष ने बताया कि यह तो बंद ही नहीं होता। मुख्य द्वार के लोहे के दरवाजे को धक्का देते हुए हम भीतर गए.... एकदम शांति। हल्की रोशनी में आश्रम के चारों ओर से खुले बरामदों में गांधी जी की तस्वीरें और सद् वाक्य नजर आ रहे हैं। वहां एक भी व्यक्ति नजर नहीं आया। पुस्तकालय और अन्य कक्ष जरूर बंद थे, लेकिन पूरे आश्रम में बेफिक्री से घूमा जा सकता था। नजदीक ही साबरमती नदी बहती है, जिसके किनारे गांधी जी की कुटिया है। गांधी जी ने 1930 में यहीं से दांडी यात्रा शुरू की थी। अब इस आश्रम में देसी-विदेशी सैलानी आते हैं और यदा-कदा यहां कुछ कार्यक्रम भी होते रहते हैं। मगर उस वक्त यह आश्रम वीरान लग रहा था...मैं सोच रहा था कि यह गांधी की प्रासंगिकता ही है, जो मुझ जैसे अदना पत्रकार को यहां तक खींच लाई। साढ़े नौ बजे रात के करीब मनीष ने मुझे स्टेशन छोड़ा और थोड़ी देर में मेधा पाटकर भी वहां आ गईं। ट्रेन धीरे धीरे सरकने लगी...मैंने उनसे पूछा आपका तो यहां आना जाना लगा रहता होगा। वह बताती हैं, अब कम ही आना होता है। मैं उनकी व्यस्तता जानना चाहता हूं, कहती हैं, 'मैं तो रात में ही सफर करना पसंद करती हूं, ताकि दिन में काम हो सके। कई कई बार तो महीने में बीस-बीस रातें ट्रेन में गुजरती हैं....।' मुझे मेरे कवि-पत्रकार मित्र चंद्रभूषण की कविता याद आ रही है.... ट्रेन में रात चलती है/ रात में ट्रेन चलती है/ खिड़की की छड़ें पकड़कर / भीतर उतरता है/ रात में चलता हुआ चांद/ पटरियों पर पहियों सा/ माथे पर खट खट बजता..... इस बीच उनका फोन भी लगातार बजता रहा। अगले दिन उन्हें मुंबई में अन्ना हजारे के साथ एक प्रदर्शन में शामिल होना था। उन्होंने फोन पर ही तीन-चार लोगों को अगले दिन के कार्यक्रम के सिलसिले में निर्देश भी दे दिए। मैंने गौर किया था कि स्टेशन पर इक्का-दुक्का लोग ही उन्हें छोड़ने आए थे। क्या इसलिए कि उनका आंदोलन अब ढलान पर है...। लेकिन उनकी जीवटता देखकर लगा मानो वह खुद ही आंदोलन हैं।  तकरीबन तीन दशक तक आंदोलन में सक्रिय रहने के बावजूद वे निरंतर काम करती रहती हैं। यदि देश के नीति निर्धारण में सामाजिक आंदोलनों की एक भूमिका नजर आती है, तो यह मानना पड़ेगा कि मेधा पाटकर इसमें जरूरी हस्तक्षेप करने वालों में अग्रणी लोगों में से हैं। ट्रेन ने अब रफ्तार पकड़ ली है। मैं यह मौका यूं ही नहीं जाने देना चाहता था। नर्मदा बचाओ आंदोलन उस वक्त अपने चरम पर था, जब 1990 के दशक में देश में नई आर्थिक नीतियों को अपनाया गया था। उसी दौर में डंकल प्रस्ताव, विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, और विश्व व्यापार संगठन की नीतियां विमर्श का हिस्सा बन रही थीं। एक ओर देश में एक नया मध्यम वर्ग बन रहा था और दूसरी ओर जनांदोलनों का उभार आया। मसलन नर्मदा बचाओ आंदोलन या शंकर गुहा नियोगी का मजदूर आंदोलन वगैरह। मैं उनसे पूछता हूं कि इन आंदोलनों में एक तरह का समन्वय दिखता था, मगर आज ऐसी बात नजर नहीं आती? वह स्वीकार करती हैं कि आज वैसा समन्वय नजर नहीं आता। जबकि आज भी आंदोलनों की जगह है और जरूरत भी, क्योंकि चुनावी राजनीति कमजोर हो रही है। मगर जैसा हस्तक्षेप होना चाहिए वह नहीं दिख रहा है। नर्मदा पर बन चुके या बन रहे बांधों से उजड़े लोगों की लड़ाई वह आज भी लड़ रही हैं। तकरीबन तीस वर्ष के आंदोलन के दौरान उनके साथ बहुत से लोग आए और गए, जिनमें पेज थ्री में नजर आने वाले लोग भी थे, ऐसे युवा भी थे, जिन्हें लगता था कि वे दुनिया बदल देंगे। असल में नर्मदा आंदोलन के साथ एक तरह की रूमानियत भी रही....मैं पूछता हूं पीछे मुड़कर कैसा लगता है? वह मानती हैं कि 'आंदोलनों में ऐसा होता है, लेकिन आज भी देशभर में बहुत से आंदोलन हो रहे हैं, जरूरत उन सबको जोड़ने की है। बहुत से युवा अलग-अलग जगह काम कर रहे हैं, लेकिन उनके पास राष्ट्रीय दृष्टिकोण का अभाव है। वेलफेयरिस्म के आधार पर मास बेस बनता है। जैसे रोजगार गारंटी पर एक मास बेस बना, राइट टू फूड पर एक मास बेस बना, लेकिन इनमें वैसी व्यापकता नहीं है, क्योंकि ऐसे आंदोलन एक मुद्दे पर आधारित होते हैं। नर्मदा भी एक इश्यू बेस्ड था, लेकिन उसमें व्यापकता थी। आज लोग ग्रास रूट की बात करते हैं, मैं कहती हूं कि मास रूट पर जाकर काम करने की जरूरत है।' उन्हें इस बात पर अफसोस होता है कि कोई भी राजनीतिक दल जल, जंगल और जमीन के मुद्दे को गंभीरता से नहीं लेता। हालांकि वह यह मानती हैं कि संसदीय राजनीति और गैर संसदीय राजनीति जब एक दूसरे को चुनौती देती हैं, तब कोई रास्ता निकलता है....। वह इस रास्ते की तलाश में जुटी हुई हैं। मैं उनकी जीवटता का कायल हो रहा हूं...। मैं उनसे मिलने गया तो था अमर उजाला रूपायन अचीवर अवार्डस की विजेताओं के चयन के सिलसिले में। वह इसकी जूरी की एक सदस्य थीं, जिन्हें उत्तर प्रदेश की उन दस महिलाओं का चयन करना था, जिन्होंने विभिन्न क्षेत्रों में खास मुकाम हासिल किए। देर रात तक वह इन प्रविशिष्टियों को उलटती-पलटती पढ़ती रहीं..। लेकिन यह मुलाकात उन्हें करीब से जानने-समझने का मौका बन गई। ट्रेन सुबह छह बजे दादर पहुंची। वह चाहती थीं कि मैं दिन में शुगर कोऑपरेटिव किसानों के मुद्दों को लेकर होने वाली उनकी मीटिंग में जरूर आऊं, मगर मेरे लिए यह संभव नहीं था। यहां से उन्हें चेंबूर की तरफ जाना था, और मुझे वीटी। मैं उन्हें अकेले जाते हुए देख रहा था...।
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