World Cancer Day: इलाज संभव, वैज्ञानिकों ने ट्यूमर के जेनेटिक कोड में खास म्यूटेशन को पहचाना

न्यूयॉर्क टाइम्स न्यूज सर्विस, हाइडेलबर्ग, जर्मनी Updated Sun, 04 Feb 2018 05:27 AM IST
Cancer can be treated, Scientists in Germany recognize special mutations in genetic code of tumors
कैंसर के इलाज में अब तक इसे हटाने की कोशिश की जाती रही हैं, जो न सिर्फ जोखिम भरी होती हैं बल्कि इनके साइड इफैक्ट भी काफी अधिक होते हैं। लेकिन जर्मनी के वैज्ञानिक इस प्रयास में जुटे हैं कि ट्यूमर के विकास को ही जड़ से रोक दिया जाए। इसी कोशिश में वैज्ञानिकों ने यह दावा भी किया है कि उन्होंने ट्यूमर को पूरी तरह से डीकोड भी कर लिया है। कैंसर के इलाज में इसे एक बड़ी क्रांति माना जा सकता है।
बिना साइड इफैक्ट जगीं ब्रेन ट्यूमर के इलाज की उम्मीद

जर्मनी के विश्व प्रसिद्ध हाइडेलबर्ग मेडिकल कॉलेज में मालिक्युलर जीव वैज्ञानिक श्टेफान फिस्टर बच्चों में होने वाले ब्रेन ट्यूमर के विशेषज्ञ हैं। उन्होंने पांच वर्षीय करीम नामक बच्चे के दिमाग में ट्यूमर के इलाज के दौरान ही उसे पूरी तरह से डीकोड किया। यह ट्यूमर सीधे दिमाग के स्टेम पर था इसलिए डॉक्टर उसे पूरी तरह से हटा नहीं पाए थे। डॉ. श्टेफान को ट्यूमर के जेनेटिक कोड को समझने के दौरान उनमें एक खास किस्म का म्यूटेशन मिला। तब से लेकर अब तक उनकी टीम के शोधकर्ता 600 ट्यूमरों की जेनेटिक संरचना समझ चुके हैं।

600 तरह के ट्यूमरों की जेनेटिक संरचना को वैज्ञानिकों ने समझा

कैंसर की जेनेटिक संरचना को समझने के दौरान उन्हें कई तरह के जीन संबंधी बदलाव भी देखने को मिले। इन बदलावों का लाभ यह है कि दिमाग में ऐसी दवा भी डाली जा सकती है जो ट्यूमर पैदा करने वाले जीन का विकास ही रोक सकता है। डॉ. फिस्टर ने बताया कि हमने ट्यूमर की सभी चार अरब जड़ों की जांच की और उनकी तुलना रोगियों के डीएनए से की। हमने देखा कि किन ट्यूमरों में कौनसा म्यूटेशन है। इसके बाद में उन दवाओं की उपलब्धता का पता लगाया, जो इन्हें रोकने में सहयोग कर सकती हैं।

दो ट्यूमरों में नई किस्म की दवा डालने में पाई सफलता

जीन संबंधी बदलाव भी देखे


नए शोध का परिणाम यह होगा कि जिन बच्चों में ट्यूमर अंतिम चरण में होता है उनका शुरू से ही अधिक कारगर इलाज किया जा सकेगा। इसमें जोखिम काफी कम होगा और साइड इफैक्ट की गुंजाइश में नहीं के बराबर होगी। इलाज के इस तरीके से भविष्य में डॉक्टर बीमारी को बेहतर ढंग से समझकर तय कर सकेंगे कि रोगी को ऑपरेशन की जरूरत है अथवा कीमोथैरेपी या लेजर थैरेपी की अधिक जरूरत है। इस जीन के विश्लेषण के जरिए शोधकर्ता अब तक दो ट्यूमरों में नई किस्म की दवा डालने में सफल रहे हैं। इसके बाद रोगी का ट्यूमर और अधिक नहीं बढ़ पाया।

‘इलाज के इस तरीके में हम ऐसी जैविक संरचनाओं को खोजते हैं, जो केवल ट्यूमर के अंदर ही पाई जाती हैं, शरीर में और कहीं नहीं। हमें उम्मीद है कि इसके जरिए हम उसे लक्ष्य बनाकर बिना किसी साइड इफैक्ट के जूझ पाएंगे। इलाज के इस तरीके से हम उस जगह को खोजते हैं जहां ट्यूमर को मारा जा सके।’

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