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जिम्बाब्वे: तीन साल पहले शुरू हुई थी राबर्ट मुगाबे के पतन की कहानी

Tue, 21 Nov 2017 03:36 AM IST
द न्यूयार्क टाइम्स, हरारे
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जिंबाब्वे के राष्ट्रपति राबर्ट मुगाबे - फोटो : The New York Times
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अपने छल-कपट और क्रूरता के दम पर लगभग चार दशक से जिंबाब्वे की सत्ता पर काबिज 93 वर्षीय राष्ट्रपति राबर्ट मुगाबे के पतन की कहानी तीन साल पहले शुरू हुई थी, जब उनकी पत्नी ग्रेस ने राजनीति में कदम रखने का फैसला किया था। इसकी वजह से यहां के संभ्रांत वर्ग में कलह के बीज पड़े, जिसकी परिणति हमारे सामने है।
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मुगाबे की उलटी गिनती 6 नवंबर को शुरू हुई जब उन्होंने उपराष्ट्रपति और जिंबाब्वे की आजादी के आंदोलन के योद्धा एमरसन मनांगाग्वा को उनके पद से हटा दिया। इसके कुछ दिन बाद ही उन्होंने सेना प्रमुख जनरल कांस्टेंटीनो चिवेंगा को गिरफ्तार करने की कोशिश की, जो उस समय चीन की यात्रा पर थे।

पढ़ें- जिम्बाब्वे: मुगाबे ने पद छोड़ने से किया इनकार, पार्टी प्रमुख पद से हटाए गए

 पद से हटाए जाने के बाद मनांगाग्वा अपने बेटे के साथ मोजाम्बिक चले गए और वहां से दक्षिण अफ्रीका पहुंच गए। उनके करीबी नेता जुलाई मोयो के अनुसार उपराष्ट्रपति को पहले से ही इसकी आशंका थी और वह इसके लिए तैयार थे।
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उधर, चीन में जब सेना प्रमुख चिवेंगा को अपनी गिरफ्तारी की तैयारी की खबर मिली तो वे सतर्क हो गए। वे 12 नवंबर को स्वेदेश लौटे तो पुलिस उन्हें पकड़ने के लिए तैयार थी, लेकिन जनरल ने इसकी काट पहले ही ढूंढ ली थी। 

बैगेज हैंडलरों की ड्रेस में तैनात उनके सैनिकों ने पुलिसकर्मियों को काबू कर लिया। इसके कुछ दिन बाद ही राजधानी हरारे में तोपों की गड़गड़ाहट सुनी गई और फिर खबर आई कि मुगाबे नजरबंद कर लिए गए हैं। 
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गुटों की लड़ाई में निष्पक्ष बने रहे मुगाबे

रॉबर्ट मुगाबे
पिछले तीन साल से सत्ता के लिए दोनों गुटों में जारी संघर्ष में मुगाबे ने कभी किसी का पक्ष नहीं लिया। दोनों गुटों को लग रहा था कि मुगाबे अब कुछ दिनों के मेहमान हैं और उनकी मौत के बाद सत्ता पर उसे ही मिलनी है। इस संघर्ष में हमेशा लैकोस्ट गुट का पलड़ा भारी रहा क्योंकि उन्हें स्वतंत्रता सेनानियों के साथ ही सेना का भी समर्थन हासिल है।

लैकोस्ट बनाम जी-40
जिंबाब्वे की सत्ताधारी जानू-पीएफ पार्टी पर मुगाबे का एकाधिकार रहा है, लेकिन उनकी पत्नी ग्रेस के राजनीति में उतरने के साथ ही यह दो गुटों में बंट गई। एक गुट को ‘लैकोस्ट’ कहा जाता है, जिसकी अगुवाई अपदस्थ उपराष्ट्रपति मनांगाग्वा कर रहे हैं, जिनका उपनाम मगरमच्छ है।

 इस गुट में आजादी के आंदोलन से निकले सैन्य अफसरों और नेताओं का वर्चस्व। जबकि दूसरे गुट को जी-40 कहा जाता है जिसकी मुखिया मुगाबे की पत्नी ग्रेस हैं। इसमें ऐसे नेता शामिल हैं जो युवा है और उनका देश की स्वतंत्रता की लड़ाई से कोई वास्ता नहीं रहा है।

मनांगाग्वा बने रहे निष्ठावान
सत्ता संघर्ष के दौर में उपराष्ट्रपति मनांगाग्वा ने मुगाबे को कभी यह महसूस नहीं होने दिया कि उनकी निष्ठा बदल गई है। वे हमेशा की तरह राष्ट्रपति के वफादार बने रहे। उनके प्रति सम्मान में कभी कमी नहीं आने दी। यही वजह है कि मुगाबे अपनी सत्ता की चिंता किए बगैर हर साल क्रिसमस के बाद विदेश में लंबी छुट्टी मनाने चले जाया करते थे।

जी-40 गुट हो गया था बेसब्र
ग्रेस की अगुवाई वाले इस गुट को लग रहा था कि अगर मुगाबे के जिंदा रहते सत्ता नहीं मिली तो उनके मरने के बाद ऐसा होना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन होगा। राजनीतिक पंडितों का मानना है कि मनांगाग्वा और चिवेंगा की जोड़ी के सामने जी-40 गुट की कोई औकात नहीं थी।

 अगर ऐसा था तो ग्रेस ने राजनीति में कदम ही क्यों रखा। विशेषज्ञों का कहना है कि इस गुट के पीछे जोनाथन मोयो नामक राजनेता का दिमाग काम कर रहा है और ऐसा लग रहा है कि ग्रेस के जरिए सत्ता पर काबिज होने का उनका गणित काम नहीं आया।
 
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