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Zelensky meets Joe Biden: कैसे धीरे-धीरे बाइडन ने पुतिन का हौसला पस्त किया? क्या अब अगली बारी जिनपिंग की?

सार

Zelensky meets Joe Biden: रणनीतिक, सामरिक और भू-राजनीतिक मामलों के जानकारों का मानना है कि रूस के बाद अमेरिका के अगले निशाने पर रूस के साथ-साथ चीन है। विशेषज्ञों को लग रहा है कि यूक्रेन के सहारे अमेरिका ने रूस को कमजोर करने में बड़ी कामयाबी पा ली है। कहीं न कहीं यह चीन के लिए सबक भी है...
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Zelensky meets Joe Biden - फोटो : Agency
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विस्तार
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अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन की यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की (Zelensky meets Joe Biden) साथ तस्वीर ने वैश्विक भू राजनीतिक परिदृश्य को नया आयाम दे दिया है। मानों अमेरिका के राष्ट्रपति सफल कूटनीति से रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का हौसला गिरा देने का जश्न मना रहे थे। पूर्व विदेश सचिव शशांक की सधी प्रतिक्रिया है कि जो बाइडन ने रूस की ताकत को बहुत सीमित कर दिया है। शशांक पहले भी कहते रहे हैं कि अमेरिका की केंद्रीय खुफिया एजेंसी, सीआईए की रणनीति कभी इतनी हल्की नहीं होती। वैसे भी सीआईए पिछले काफी समय से यूक्रेन की खुफिया एजेंसी एसबीयू के साथ मिलकर काम कर रही है।

रणनीतिक, सामरिक और भू-राजनीतिक मामलों के जानकारों का मानना है कि रूस के बाद अमेरिका के अगले निशाने पर रूस के साथ-साथ चीन है। विशेषज्ञों को लग रहा है कि यूक्रेन के सहारे अमेरिका ने रूस को कमजोर करने में बड़ी कामयाबी पा ली है। कहीं न कहीं यह चीन के लिए सबक भी है। शशांक भी कहते हैं कि रूस को चीन से ऊर्जा मिलती है। चीन भी रूस के सहयोग से अपना दबदबा बनाने की रणनीति अपनाता है। इसलिए रूस की सामरिक ताकत कमजोर होने का असर कहीं न कहीं चीन पर तो पड़ऩा ही है। पूर्व एयर वाइस मार्शल एनबी सिंह कहते हैं कि ऐसे समय में सबसे ज्यादा सावधान और संतुलित रहने की जरूरत भारत को है। भारत को चीन और पाकिस्तान दोनों से खतरा है। चीन की खुफिया एजेंसी एमएसएस की एक विंग नेपाल समेत भारत के पड़ोसी देशों पर खास तौर से ध्यान रखती है। पाकिस्तान 1948 से ही भारत के खिलाफ एक मंसूबा पालकर बैठा है। अभी तक एक बार भी उसे कामयाबी नहीं मिली है। वहां की खुफिया एजेंसी आईएसआई के इरादे भी बहुत पाक नहीं हैं।

दाल में नमक का बस असर दिखता है, न नमक दिखता है और न हम

भारतीय खुफिया एजेंसी रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (रॉ) के पूर्व शीर्ष अधिकारी का कहना है कि दाल में सिर्फ नमक का असर दिखता है। न नमक दिखता है और न हम। सूत्र का कहना है कि जैसे सूरज और चांद कभी नहीं सोते, वैसे ही दुनिया की खुफिया और सुरक्षा एजेंसियों के लोगों को पलक झपकाने की इजाजत नहीं होती। पूरा मामला कबूतर के पलक झपकाते ही बिल्ली के झपट्टा मार लेने जैसा होता है। इसमें एक मर्म छिपा है। यही कि सीआईए (अमेरिका), मोसाद (इस्राइल), एमएसएस (चीन), रॉ (भारत), एमआई-6 (ब्रिटेन) और केजीबी से 1991 में एफएसबी में बदली रूस की खुफिया एजेंसियों की जिम्मेदारी काफी बढ़ गई है। मोसाद की चंचलता, चपलता, सीक्रेसी और ऑपरेशनल क्षमता ने दुनिया में लोहा मनवा दिया। इतना ही नहीं ईरान की खुफिया एजेंसी सोवाक की पूरी बेचैनी बढ़ा दी है। सूत्र का मानना है कि जिस तरह से सीआईए यूक्रेन में रूस की सैन्य कार्रवाई को लेकर सक्रिय है, उसका बस अंदाजा भर लगाया जा सकता है। नतीजा तो पटाक्षेप होने के बाद आएगा।  

भारत के सामने चुनौतीयां बढ़ रही हैं

खुफिया और सुरक्षा एजेंसियों के कुछ प्रमुखों का मानना है कि एशिया में चीन के सामने भारत खड़ा है। भारत चीन के लिए खुद को चुनौती नहीं मानता। हमारी नीति निष्पक्ष और सबके हित के साथ अपने हित में है, लेकिन चीन एशिया में भारत को चुनौती मानता है। अमेरिका का एशिया में काफी कुछ दांव पर है। रूस के सामने कुछ साल पहले की स्थिति में लौटने की चुनौती है। जबकि भारत के रास्ते में पाकिस्तान और उसकी खुफिया एजेंसी आईएसआई एक रोड़ा बनकर खड़ी हो जाती है। इसमें उसे काफी हद तक चीन से परोक्ष रूप से सहयोग मिलता है। इस तरह से भारत के सामने सीमा पर पाकिस्तान के साथ-साथ चीन का मोर्चा खुलता चला जा रहा है। वैश्विक परिदृश्य में रूस भारत के साथ अच्छे भाव रखता है, लेकिन बदल रहे दौर में चीन की जगह मास्को में अधिक है। अमेरिका और चीन में तमाम क्षेत्रीय, अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर मतभेद बढ़ रहे हैं। इसके सामानांतर अमेरिका की भारत से नजदीकी भी बढ़ रही है। कुल मिलाकर भारत की लगातार चुनौती बढ़ रही है। ऐसा इसलिए हो रहा है, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शक्ति संतुलन नए दौर की तरफ बढ़ रहा है।

सूचना की सटीकता और ऑपरेशन पल भर में पलट देता है पासा

खुफिया और सुरक्षा सूत्र बताते हैं कि यूक्रेन के बारे में अनुमान था कि रूस के पास हर स्तर का डाटा मौजूद है। अच्छी प्लानिंग के बाद रूस के राष्ट्रपति ने यूक्रेन की सीमा में सेना को जाने या सैन्य कार्रवाई की इजाजत दी होगी, लेकिन कई मोर्चे पर रूस चूक गया। वह कहते हैं कि इस्राइल और ईरान में तनातनी काफी समय से चल रही है। ईरान के मेजर जनरल कासिम सुलेमानी पर ऑपरेशन, ईरान के परमाणु संयंत्र में धमाका, उसके वैज्ञानिक मोहसिन फखरीजादेह के काफिले का आग की लपटों में घिर जाना, परमाणु दस्तावेजों को गायब करना। यह सब कोई आसान से ऑपरेशन नहीं हैं। सूत्रों का कहना है कि सटीक सूचना सफल ऑपरेशन की जान होती है। एक सफल ऑपरेशन पलक झपकते ही पासा पलट देता है। बताते हैं यह वही दौर चल रहा है, जहां कहा नहीं जा सकता कि अगले पल क्या होने वाला है।

चुनौती चीन के सामने हमसे भी बड़ी है

वियतनाम से होकर आए एक वरिष्ठ सूत्र की मानें, तो चीन को पर्याप्त चिंता कर लेनी चाहिए। रक्षा मामलों के एक जानकार ने बताया कि कोविड-19 संक्रमण के बाद चीन पर गहरी आर्थिक चोट की मार पड़ी है। यह मार दुनिया के सभी देशों पर पड़ी, लेकिन चीन के लिए इसके नतीजे परेशान करने वाले हैं। अभी वहां फिर कोविड का प्रसार हो रहा है। इससे चीन की आंतरिक चुनौतियां बढ़ रही हैं। न केवल वियतनाम, उसके कई पड़ोसी देश उसकी विस्तारवादी और अब आक्रामक हो रही नीतियों से बहुत तंग हैं। सूत्र का कहना है कि यह कहने में कौन सा संकोच? अमेरिका ने अपने हितों को सुरक्षित रखने के लिए चीन पर दबाब बढ़ाने की रणनीति को धार देना शुरू कर दिया है। चुनौती भारत से कहीं ज्यादा चीन की बढ़ रही है। वह कहते हैं कि चीन भारत के लिए लद्दाख, डोकलाम, तवांग तक चुनौती बन रहा है। इससे हमें सुरक्षा की बड़ी तैयारी करनी पड़ रही है। इससे सुरक्षा खर्च में बेतहाशा बढ़ोत्तरी के संकेत मिल रहे हैं, लेकिन सैन्य अवसंरचना को मजबूत बनाने का दबाव और बोझ चीन पर भी पड़ रहा है।

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