चीन अपनी करेंसी युवान को अंतरराष्ट्रीय कारोबार की मुद्रा बनाने की कोशिश में जुटा हुआ है, लेकिन उसका रास्ता आसान नहीं है। काफी समय से चीन ने युवान की हैसियत बढ़ाने के लिए अपने बॉन्ड मार्केट को बाकी दुनिया के लिए खोलने की रणनीति अपनाई है। बीते दो दशकों में उसने विदेशी व्यापारियों और दूसरे देशों के सेंट्रल बैंकों को युवान में जारी बॉन्ड को खरीदने के लिए प्रोत्साहित किया है।
अमेरिकी अनुसंधान संगठन- नेशनल ब्यूरो ऑफ इकॉनोमिक रिसर्च (एनबीईआर) के एक ताजा पेपर में कहा गया है कि ऐसे उपायों के बावजूद युवान के अंतरराष्ट्रीय कारोबार की मुद्रा बनने की राह में कई अड़चनें हैं। चीन की कोशिश रही है कि उसके देश में टिकाऊ निवेशक ही आएं। ऐसे निवेशकों को आकर्षित करने के लिए उसने क्रमिक रूप से अपने कर्ज बाजार को खोला है। इसलिए अभी चीन में बॉन्ड खरीदने को लेकर कई पाबंदिया हैं। इसमें बॉन्ड खरीदारी की सीमा, अलग-अलग लॉकअप पीरियड और रजिस्ट्रेशन संबंधी सख्त शर्तें शामिल हैं।
इसके बावजूद एनबीईआर ने कहा है कि अब निवेशक चीन के बॉन्ड्स के प्रति अधिक अनुकूल रवैया अपना रहे हैं। निवेशक अब चीनी बॉन्ड्स को धनी देशों के बॉन्ड्स जैसा महत्त्व देने लगे हैं। एऩबीईआर के अर्थशास्त्रियों ने इस रिपोर्ट में लिखा है- ‘हमने पाया कि चीन ने अपनी हैसियत उभरती अर्थव्यवस्था वाले देशों और विकसित देशों के बीच स्थापित कर ली है। उसकी हैसियत हाल के वर्षों में लगातार बढ़ती चली गई है।’
रिसर्च पेपर में कहा गया है कि हालांकि अभी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अमेरिकी डॉलर को चुनौती देने के लिए युवान को बहुत लंबा रास्ता तय करना होगा, लेकिन चीनी मुद्रा के अंतरराष्ट्रीयकरण में लगातार वृद्धि हो रही है। हकीकत यह है कि यूक्रेन युद्ध के बाद रूस पर पश्चिमी देशों के सख्त प्रतिबंध लगाने के बाद से अंतरराष्ट्रीय कारोबार में युवान का अधिक इस्तेमाल होने लगा है। युवान में होने वाले लेन-देन के लिहाज से रूस अब चीन के बाहर तीसरा सबसे बड़ा बाजार बन गया है। रूस अपने तेल निर्यात के बदले युवान में भुगतान स्वीकार कर रहा है। जबकि उसने डॉलर में भुगतान लेना रोक दिया है।
अंतरराष्ट्रीय भुगतान को संचालित करने वाले सिस्टम स्विफ्ट के आंकड़ों के मुताबिक युवान अब डॉलर, यूरो, ब्रिटिश पाउंड और जापान के येन के बाद पांचवी सबसे अधिक प्रचलित मुद्रा बन गया है। वैसे इस महीने दुनिया भर के बाजारों में युवान का भाव गिरा है। इसकी वजह यह है कि जहां बाकी देशों में ब्याज दरें बढ़ाई जा रही हैं, चीन ने अपने यहां ब्याज दर में कटौती कर दी है। इसलिए इस महीने निवेशकों ने चीन से पैसा निकाल कर अमेरिका और यूरोप में लगाने में ज्यादा रुचि दिखाई है।
एनबीईआर के अर्थशास्त्रियों ने लिखा है कि युवान के आगे बढ़ने का रास्ता सीधा नहीं होगा। बल्कि इस दौरान उसे उतार-चढ़ाव का सामना करना पड़ेगा। रिसर्च पेपर में कहा गया है- ‘चीन ने शुरुआत स्थिर निवेशकों को अनुमति देकर की। तुरंत पैसा लगाने और निकालने वाले निवेशकों को आने की इजाजत उसने बाद में दी। इस तरह उसने जोखिम को काबू में रखने की राह अपनाई है। अब यह देखने की बात होगी कि क्या पूंजी के पलायन को रोकते हुए वह अपनी मुद्रा को अंतरराष्ट्रीय रूप देने में सफल हो पाएगा।’