Xi Jinping at Arab Summit with Gulf Leaders
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क्या अरब देश अपने कच्चे तेल के बदले चीन से उसकी मुद्रा युवान में भुगतान स्वीकार करने को तैयार होंगे? पिछले हफ्ते चीन और अरब देशों के बीच हुए शिखर सम्मेलन के बाद से वित्तीय बाजारों में ये सवाल छाया हुआ है। वित्तीय बाजारों में आम चर्चा है कि अगर अरब देश इस पर राजी हो गए, तो उसका विश्व अर्थव्यवस्था पर दूरगामी असर होगा। अभी दुनिया में कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस के व्यापार की मुख्य मुद्रा अमेरिकी डॉलर है।
बीते शुक्रवार को सऊदी अरब की राजधानी रियाद में अरब नेताओं के साथ अपनी बैठक के दौरान चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने ऊर्जा कारोबार में युवान के इस्तेमाल का प्रस्ताव रखा। तुरंत उसका संदेश दुनिया भर में ग्रहण किया गया। चीन लंबे समय से विश्व व्यापार पर डॉलर के वर्चस्व को तोड़ने की तैयारी में जुटा रहा है। विश्लेषकों के मुताबिक अब ऐसा लगता है कि चीन ने खुल कर डॉलर के वर्चस्व को चुनौती देने का इरादा कर लिया है।
अरब सम्मेलन में शी जिनपिंग ने कहा कि चीन खाड़ी देशों से बड़ी मात्रा में कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस का आयात करता रहेगा। वह चाहता है कि इस आयात के बदले भुगतान वह युवान में करे। चीन के विदेश मंत्रालय ने एक बयान के जरिए शी जिनपिंग की तरफ से रखे गए इस प्रस्ताव का विवरण जारी किया। इस बयान के मुताबिक शी ने कहा- ‘तेल और गैस के व्यापार में युवान के जरिए भुगतान के लिए शंघाई पेट्रोलियम एंड नेचुरल गैस एक्सचेंज प्लेटफॉर्म का पूरा उपयोग किया जाएगा।’ लेकिन बयान में यह नहीं बताया गया है कि इस रूप में भुगतान की शुरुआत कब से होगी या क्या खाड़ी देशों ने युवान में भुगतान स्वीकार करने का कोई आश्वासन शी को दिया है।
वेबसाइट बिजनेस इनसाइडर के मुताबिक खाड़ी देशों का इस बारे में क्या रुख है, यह तो मालूम नहीं हुआ है, लेकिन सऊदी अरब युवान में सेटलमेंट के बारे में चीन के साथ बातचीत कर रहा है। सऊदी अरब दुनिया का सबसे बड़ा तेल निर्यातक है, जबकि चीन उसके तेल का सबसे बड़ा खरीदार है।
विशेषज्ञों ने कहा है कि अगर तेल का कारोबार युवान में शुरू हुआ, तो दुनिया की रिजर्व करेंसी के रूप में डॉलर की हैसियत को उससे तगड़ा झटका लगेगा। इससे दुनिया में ‘डी-डॉलराइजेशन’ (यानी डॉलर का वर्चस्व खत्म होने) की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी। थिंक टैंक इंस्टीट्यूट फॉर एनालिसिस ऑफ ग्लोबल सिक्योरिटी के निदेशक गाल लुफ्ट ने अमेरिकी टीवी चैनल सीएनबीसी से कहा- ‘सऊदी अरब चीन से बड़ी मात्रा में खरीदारी करता है। चीन भी सऊदी अरब से बड़ी खरीदारी करता है। ऐसे में उनकी सोच है कि वे क्यों किसी तीसरे देश की मुद्रा में आपसी कारोबार करें। ऐसा करने में उन्हें विनिमय दर की कीमत चुकानी पड़ती है।’
चीन पहले से ही रूस को तेल और गैस का भुगतान युवान में कर रहा है। इसके अलावा ईरान के साथ भी उसका कारोबार युवान और ईरान की मुद्रा में होता है। लेकिन रूस और ईरान पर अमेरिका ने प्रतिबंध लगा रखे हैं, इसलिए उन्होंने चीनी मुद्रा को स्वीकार करने का फैसला लिया। सऊदी अरब और खाड़ी देश अगर इसके लिए तैयार होते हैं, तो यह उनका अपनी पसंद से लिया गया फैसला होगा। आम समझ है कि इसका दूरगामी असर होगा।