अमेरिका से दूरी बना रहा कनाडा: पीएम मार्क कार्नी और मैक्रों ने मिलाया हाथ, फ्रांस-यूरोप के साथ सुरक्षा और व्यापार सौदे मजबूत
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के कड़े रुख, भारी टैरिफ और कनाडा को अमेरिका का '51वां राज्य' बनाने जैसे बयानों से परेशान होकर कनाडा ने अब अमेरिका पर अपनी निर्भरता खत्म करने का फैसला किया है। इसी दिशा में कदम बढ़ाते हुए कनाडाई प्रधानमंत्री मार्क कार्नी और फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने सेंट-पिएर में हुई बैठक में अंतरिक्ष, रक्षा, ऊर्जा और नई तकनीकों के क्षेत्र में मिलकर काम करने का बड़ा एलान किया है। मार्क कार्नी ने साफ किया कि यूरोप के साथ गहरे आर्थिक और रणनीतिक रिश्ते बनाने से कनाडा किसी भी एक देश की आर्थिक दादागिरी या दबाव के सामने झुकने से बचेगा।
दूसरी ओर, पश्चिम एशिया में ईरान युद्ध के कारण वैश्विक स्तर पर गहराते ऊर्जा संकट के बीच फ्रांस भी कनाडा से प्राकृतिक गैस और दुर्लभ खनिज हासिल करने के लिए बेताब है। मैक्रों ने कार्नी की इस यात्रा को बेहद ऐतिहासिक बताया और यूरोपीय संघ में कनाडा को सहयोगी सदस्य के रूप में शामिल करने का खुलकर समर्थन किया। दोनों देशों के बीच हुए इस नए समझौते के तहत अब कनाडा और फ्रांस अपनी अंतरिक्ष एजेंसियों, सैटेलाइट नेटवर्क और सैन्य ढांचे को साझा करेंगे, जो बदलते वैश्विक माहौल में अमेरिका के बिना एक नई महाशक्ति की नीव रखता दिखाई दे रहा है।
ऐतिहासिक चुनावी हार से बैकफुट पर जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज़, इस्तीफा देने के बजाय कड़े आर्थिक सुधारों का किया एलान
जर्मनी में हुए दो राज्यों के स्थानीय चुनावों में चांसलर फ्रेडरिक मर्ज़ की पार्टी 'क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक यूनियन' को अब तक की सबसे शर्मनाक हार का सामना करना पड़ा है। 'मेक्लेनबर्ग-वेस्टर्न पोमेरानिया' राज्य में पार्टी महज 5 फीसदी वोटों पर सिमट गई, जो द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से पार्टी का सबसे निचला स्तर है। वहीं दूसरी तरफ, दक्षिणपंथी और रूस-समर्थक पार्टी 'अल्टरनेटिव फॉर जर्मनी' ने 37 फीसदी वोट हासिल कर बड़ी बढ़त दर्ज की। इस करारी हार को "बड़ा नुकसान" मानते हुए भी 70 वर्षीय चांसलर मर्ज़ ने झुकने से साफ इनकार कर दिया है और कहा है कि देश के बिगड़ते आर्थिक हालातों को पटरी पर लाने के लिए वे बिना रुके कड़े और कड़वे सुधारों को लागू करना जारी रखेंगे।
इस करारी हार के बाद जर्मनी की राजनीति में भूचाल आ गया है और विपक्षी दलों के साथ-साथ खुद मर्ज़ की पार्टी के भीतर से भी उनके इस्तीफे की मांगें उठने लगी हैं। सुस्त पड़ी अर्थव्यवस्था और देश के नकारात्मक माहौल को सुधारने में नाकाम रहे फ्रेडरिक मर्ज़ पर अब अपने पद पर बने रहने का भारी दबाव है। एएफडी के उभार को समाज के लिए 'तानाशाही का जहर' बताते हुए मर्ज़ ने स्पष्ट किया है कि वे अपना कार्यकाल पूरा करेंगे और आर्थिक सुधार ही इसका इकलौता इलाज हैं। घरेलू स्तर पर गहराते इस गंभीर राजनीतिक संकट और पार्टी को बिखरने से बचाने की कवायद के चलते चांसलर ने न्यूयॉर्क में होने वाली संयुक्त राष्ट्र महासभा (यूएनजीए) की अपनी आगामी यात्रा को भी रद्द कर दिया है।