मध्य पूर्व में लगभग एक साल से युद्ध चल रहा है और दुनिया के प्रमुख देश इसे रोकने या लड़ाई को कम करने में कोई बड़ा अंतर नहीं ला पाए हैं। यह दिखाता है कि दुनिया और अधिक अव्यवस्थित हो रही है, जहां सत्ता बिखरी हुई है और संघर्षों पर नियंत्रण कम हो गया है।
इस्राइल-हमास जंग खत्म करने की अमेरिका की कोशिशें नाकाम साबित हुई। वहीं, लेबनान में पूरी तरह से इस्राइल-हिजबुल्लाह युद्ध रोकने के लिए मौजूदा पश्चिमी नेतृत्व क्षेत्र में बड़ी आपदा को टालने के लिए संघर्षरत हैं। काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस के अध्यक्ष एमेरिटस रिचर्ड हास का कहना है कि दुनिया में अब शक्ति और नियंत्रण कुछ हाथों में सिमटने के बजाय कई जगहों पर बंट रहा है। नसरल्लाह हिजबुल्ला के लिए सब कुछ था और हिजबुल्ला इस क्षेत्र में ईरान के लिए एक मजबूत हथियार या साधन की तरह था, लेकिन अब ईरान बहुत कमजोर लग रहा है।
घटी अमेरिका की साख
वर्षों तक अमेरिका इकलौता ऐसा देश था जिसका इस्राइल व अरब राज्यों पर पुरजोर दबाव था लेकिन अब हालात अलग हैं। दशकों से अपने कट्टर दुश्मन ईरान और हिजबुल्ला जैसे ईरान के छद्म संगठनों पर असर डालने की अमेरिका की ताकत अब बहुत कम है। आतंकी संगठन हमास व हिजबुल्ला अमेरिकी कूटनीति की पहुंच से बाहर हैं।
अमेरिका नहीं छोड़ेगा इस्राइल का साथ
हास ने कहा कि अमेरिका का इस्राइल का साथ किसी कीमत पर नहीं छोड़ेगा। यह बड़े पैमाने पर उसे सैन्य मदद देता है। इसमें इस साल राष्ट्रपति बाइडन का इस्राइल के लिए स्वीकृत 1500 करोड़ बिलियन डॉलर का सैन्य पैकेज भी शामिल है। दोनों के बीच एक बहुत ही मजबूत साझेदारी है। अब तक अपने संकटग्रस्त सहयोगी के लिए अमेरिकी समर्थन अटल रहा है।
चीन और रूस ने कन्नी काटी
मध्य पूर्व में रक्तपात बढ़ने के बावजूद चीन और रूस जैसे शक्तिशाली देश मूकदर्शक बने हुए हैं। चीन ईरानी तेल का एक बड़ा आयातक है लेकिन वह यहां दिलचस्पी नहीं ले रहा। रूस का रवैया भी चीन जैसा है। वह अमेरिकी राष्ट्रपति चुनावों तक पत्ते खोलने के मूड में नहीं है और उन्हें ट्रंप की वापसी की उम्मीद है।