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SCO पर वर्ल्ड मीडिया: भारत ने अमेरिका को दिए चार स्पष्ट संदेश, चीन की धरती पर मोदी-पुतिन की मुलाकात बड़ी घटना

Tue, 02 Sep 2025 02:01 PM IST
नितिन गौतम न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वॉशिंगटन

सार

रशिया टुडे ने लिखा कि भारतीय कूटनीति, अमेरिका के साथ सीधे टकराव से बचने और व्यावहारिकता पर आधारित है। फिर भी संदेश साफ है कि नई दिल्ली बाहरी आदेशों को स्वीकार नहीं करेगी।
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एससीओ बैठक में पीएम मोदी के साथ पुतिन और जिनपिंग - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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चीन के तियानजिन में हुए एससीओ सम्मेलन पर पूरी दुनिया की निगाहें रहीं। इसकी वजह ट्रंप प्रशासन का भारत, चीन समेत दुनिया के कई देशों पर लगाया गया टैरिफ और यूक्रेन युद्ध रहे। एससीओ शिखर सम्मेलन से पहले पीएम मोदी, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की गर्मजोशी भरी मुलाकात की खूब चर्चा हुई और दुनियाभर के मीडिया में इसे कवर किया गया। वर्ल्ड मीडिया की रिपोर्ट्स से पता चलता है कि एससीओ सम्मेलन से भारत ने अमेरिका को कुछ स्पष्ट संदेश दिए हैं, जिनका मतलब साफ है कि अमेरिका, भारत के साथ साझेदारी को कतई हल्के में नहीं ले सकता। तो आइए जानते हैं कि वैश्विक मीडिया ने एससीओ सम्मेलन को लेकर क्या-क्या लिखा
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द गार्जियन: अमेरिका भारत की साझेदारी को हल्के में नहीं ले सकता
ब्रिटेन के प्रतिष्ठित अखबार द गार्जियन ने लिखा है कि एससीओ विरोधाभासों का पुलिंदा है, भारत और पाकिस्तान के बीच मतभेद रहेंगे और साथ ही नाटो की तरह एससीओ में कोई रक्षा सहयोग भी नहीं है, ये तर्क देकर एससीओ को खारिज करना आसान है, लेकिन कूटनीति में जो दिखता है, उसकी अहमियत होती है। प्रधानमंत्री मोदी, शी जिनपिंग और व्लादिमीर पुतिन जिस तरह से मुस्कुराते और बातें करते दिखाई दिए, उसे देखकर लग रहा है कि अमेरिका का प्रभाव घट रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप का भारत पर टैरिफ लगाना एससीओ सम्मेलन की अहमियत को बढ़ा गया। 

अखबार लिखता है कि भारत का संदेश साफ है कि उसकी भी कुछ सीमा रेखाएं हैं, जिन्हें अमेरिका को स्वीकार करना होगा। जिनमें ये प्रमुख हैं-
1. भारत कृषि क्षेत्र को अमेरिका के लिए नहीं खोलना चाहता; साथ ही भारत किससे तेल खरीदेगा, ये अमेरिका तय नहीं करेगा।
2. पाकिस्तान के साथ युद्धविराम इस्लामाबाद द्वारा स्वीकार किया गया था और इसमें ट्रंप ने मध्यस्थता नहीं की थी।
3. भारत पीछे नहीं हटेगा क्योंकि पीछे हटना कमजोरी जैसा लगेगा।
4. अमेरिका भारत की साझेदारी को हल्के में नहीं ले सकता, वरना भारत किसी भी देश के साथ साझेदारी के विकल्प तलाश सकता है।

ये भी पढ़ें- US: एससीओ सम्मेलन से बौखलाए ट्रंप के व्यापार सलाहकार पीटर नवारो, बोले- भारत को रूस की नहीं, हमारी जरूरत
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रशिया टुडेः भारत बाहरी आदेश नहीं मानेगा
रूस के अखबार रशिया टुडे ने एससीओ बैठक को लेकर लिखा कि रूस ने एक बार फिर मध्यस्थ की भूमिका निभाई और ग्लोबल साउथ को तोड़ने और चीन-भारत तनाव का फायदा उठाने से पश्चिमी देशों की कोशिशों को रोका। भारत की प्राथमिकता बहुपक्षीय ढांचा है जो वैश्विक शासन की एक बहुकेंद्रित प्रणाली को बढ़ावा देते हैं। भारत ने अपनी बहुपक्षीय विदेश नीति का लगातार बचाव किया है। शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) से लेकर ब्रिक्स तक और वैश्विक दक्षिण, सभी को भारत अपनी संप्रभुता और वैश्विक प्रभाव को मजबूत करने के लिए जरूरी मानता है। भारतीय कूटनीति, अमेरिका के साथ सीधे टकराव से बचने और व्यावहारिकता पर आधारित है। फिर भी संदेश साफ है कि नई दिल्ली बाहरी आदेशों को स्वीकार नहीं करेगी।

न्यूयॉर्क टाइम्स: भारत के पास और भी विकल्प हैं
अमेरिकी अखबार द न्यूयॉर्क टाइम्स ने लिखा कि राष्ट्रपति ट्रंप के प्रधानमंत्री मोदी से संबंध खराब हो गए हैं क्योंकि भारत ने ट्रंप के उस दावे का विरोध किया, जिसमें ट्रंप ने भारत-पाकिस्तान के बीच संघर्ष विराम का श्रेय लेने की कोशिश की। साथ ही रूस से कच्चा तेल खरीदने के लिए अमेरिका ने भारत पर टैरिफ लगा दिए। एससीओ सम्मेलन के दौरान पीएम मोदी रूसी राष्ट्रपति पुतिन की कार में बातचीत करते और सार्वजनिक रूप से पुतिन से गर्मजोशी से मिलते दिखाई दिए। इससे पीएम मोदी ऐसा संदेश देते दिखाई दिए कि भारत के पास और भी विकल्प हैं।
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साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट: मोदी-पुतिन वार्ता के लिए चीन को स्थान चुनना भी बहुत कुछ कहता है
एससीओ शिखर सम्मेलन के सत्र के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी और रूसी राष्ट्रपति पुतिन की एक ही कार में द्विपक्षीय बैठक स्थल तक जाते हुए तस्वीरें साझा कीं और कहा कि उनके साथ बातचीत हमेशा ज्ञानवर्धक होती है। चाइनीज अखबार ने लिखा कि बदलते वैश्विक भू-राजनीतिक परिदृश्य के बीच मोदी-पुतिन वार्ता के स्थान के लिए चीन को चुनना भी बहुत कुछ कहता है। ट्रम्प की टैरिफ नीतियों के बीच, दुनिया के दो सबसे अधिक आबादी वाले देशों के बीच संबंधों में उल्लेखनीय रूप से गर्मजोशी देखी गई।


 
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