इसके बावजूद कई अफ्रीकी नेताओं ने वैक्सीन सप्लाई के चीन के वादे पर सवाल उठाना शुरू कर दिया है। अमेरिकी टीवी चैनल सीएनएन से बातचीत में लाइबेरिया के पूर्व लोक निर्माण मंत्री डब्लू ग्लाइड मूर ने कहा कि अफ्रीका से वैक्सीन का वादा फर्जी साबित हो रहा है। अब तक सिर्फ वादा किया गया है, सप्लाई का कोई टाइमटेबल नहीं बताया गया है।
मूर फिलहाल लाइबेरिया स्थित सेंटर फॉर ग्लोबल डेवलपमेंट में सीनियर फेलो हैं। सीएनएन के मुताबिक इस मामले में उसने चीन के विदेश मंत्रालय से संपर्क किया, लेकिन उसे कोई जवाब नहीं मिला। इस बीच चीनी मीडिया में इन आलोचनाओं को बेबुनियाद जरूर बताया गया है कि चीन अपना राजनीतिक प्रभाव बढ़ाने के लिए वैक्सीन का इस्तेमाल कर रहा है।
ब्रिटिश पत्रिका द इकॉनमिस्ट की इंटेलिजेंस यूनिट के एक अनुमान के मुताबिक अफ्रीकी देशों को अप्रैल 2022 तक वैक्सीन मिलने की संभावना नहीं है। विश्लेषकों ने कहा है कि अगर इसके जल्द सप्लाई की उम्मीद होती, तो वांग यी अपनी यात्रा के दौरान उसका जिक्र जरूर करते। अफ्रीका में कोरोना वायरस का संक्रमण तेजी से बढ़ रहा है। विश्लेषकों के मुताबिक इसके मद्देनजर अगर चीन ने वैक्सीन सप्लाई के बारे में जल्द स्थिति स्पष्ट नहीं की, तो अफ्रीका में उसकी डिप्लोमेसी और उसकी साख को उससे बहुत क्षति पहुंचेगी।
अफ्रीकी देशों में बेसब्री इसलिए भी बढ़ रही है, क्योंकि चीन में लाखों लोगों को कोरोना वायरस का टीका लगाया जा चुका है। जबकि अफ्रीका में सार्वजनिक क्षेत्र के कर्मचारियों को ट्रायल के दौर में पिछले जून में टीका लगाया गया था। उस समय चीन ट्रायल के लिए दूसरे देशों पर निर्भर था, क्योंकि उसके यहां इसके लिए कोरोना संक्रमण के पर्याप्त मरीज नहीं थे।
अफ्रीका में अब इस बात को लेकर नाराजगी पैदा हो रही है कि चीन ने आरंभिक परीक्षण अफ्रीका और पश्चिम एशियाई देशों में किए। लेकिन उनमें से किसी देश को तीसरे चरण के परीक्षण के लिए नहीं चुना गया। और अब जबकि टीका तैयार हो गया है, तो अफ्रीकी देशों को यह कब मिलेगा, इस बारे में उन्हें कोई जानकारी नहीं दी जा रही है।