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अमेरिका और अफगान आतंकियों के बीच बातचीत, भारत रख रहा है कड़ी नजर

वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला Published by: Shilpa Thakur Updated Tue, 14 May 2019 03:40 PM IST
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : File Photo

अमेरिका इस वक्त तालिबान के साथ शांति वार्ता कर रहा है। इस बातचीत पर भारत ने भी नजर बनाई हुई है। ऐसा इसलिए क्योंकि पाकिस्तान समर्थित आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्म और लश्कर-ए-तैयबा ने तालिबान के साथ मिलकर अफागानिस्तान में लड़ाई जारी रखी हुई है। ये बात मामले की जानकारी रखने वाले लोगों ने बताई है।

अमेरिका की बातचीत ऐसे समय में चल रही है, जब भारत के साथ रूस और चीन जैसे देश भी इस मामले पर विचार विमर्श कर रहे हैं। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक अगर अफगानिस्तान में तालिबान का प्रभाव बढ़ा तो भारत और चीन जैसे देशों की सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है। ऐसा इसलिए क्योंकि तालिबान को पाकिस्तान पूरा समर्थन दे रहा है और ऐसा होने से आतंकी संगठन जैश और लश्कर की आतंकी गतिविधियां भी बढ़ जाएंगी।



भारत भी अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी समेत अन्य हितधारतों को सहयोग दे रहा है। जिसमें क्षेत्रीय और विपक्षी नेता, और ताजिक, उजबेक्स और हजारा जैसे जातीय समूहों के प्रतिनिधि भी शामिल हैं। अफगान मामलों पर चीन के विशेष दूत डींग शिजुंग भी शांति और सुलह के प्रयासों पर चर्चा के लिए बीते हफ्ते नई दिल्ली आए थे।

पहचान ना बताने की शर्त पर एक अधिकारी ने कहा, "जब 1996 से 2000 तक अफगानिस्तान में तालिबानी शासन था, तब जैश और लश्कर जैसे आतंकी संगठनों ने अफगानिस्तान में अपने आतंकी कैंप स्थापित कर लिए थे। जब बीते साल गाजी शहर में हमला हुआ, तब ये खबर आई थी कि जैश और लश्कर के आतंकी तालिबानियों के साथ लड़ रहे हैं।"

लश्कर-ए-तैयबा भारत में हुईं कई आतंकी घटनाओं के लिए जिम्मेदार है। साल 2002 में इस संगठन के उग्रवादियों ने दिल्ली के लाल किले पर हमला कर दिया था। इसके बाद 2001 में श्रीनगर हवाई अड्डे पर आतंकवादी हमले और अप्रैल 2001 में सीमा सुरक्षाबल के जवानों की हत्या के पीछे भी यही संगठन जिम्मेदार था। इस संगठन का नाम साल 2008 में हुए मुंबई हमले में भी आया था लेकिन बाद में इसने इस आरोप को ये कहते हुए खारिज कर दिया कि वह कश्मीर के बाहर अपनी कार्रवाई नहीं करता। ये संगठन पाकिस्तानी सेना और सरकार पर भी कई हमले कर चुका है।

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : File Photo
अमेरिका इस वक्त तालिबान के साथ शांति वार्ता कर रहा है। इस बातचीत पर भारत ने भी नजर बनाई हुई है। ऐसा इसलिए क्योंकि पाकिस्तान समर्थित आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्म और लश्कर-ए-तैयबा ने तालिबान के साथ मिलकर अफागानिस्तान में लड़ाई जारी रखी हुई है। ये बात मामले की जानकारी रखने वाले लोगों ने बताई है।

अमेरिका की बातचीत ऐसे समय में चल रही है, जब भारत के साथ रूस और चीन जैसे देश भी इस मामले पर विचार विमर्श कर रहे हैं। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक अगर अफगानिस्तान में तालिबान का प्रभाव बढ़ा तो भारत और चीन जैसे देशों की सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है। ऐसा इसलिए क्योंकि तालिबान को पाकिस्तान पूरा समर्थन दे रहा है और ऐसा होने से आतंकी संगठन जैश और लश्कर की आतंकी गतिविधियां भी बढ़ जाएंगी।

भारत भी अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी समेत अन्य हितधारतों को सहयोग दे रहा है। जिसमें क्षेत्रीय और विपक्षी नेता, और ताजिक, उजबेक्स और हजारा जैसे जातीय समूहों के प्रतिनिधि भी शामिल हैं। अफगान मामलों पर चीन के विशेष दूत डींग शिजुंग भी शांति और सुलह के प्रयासों पर चर्चा के लिए बीते हफ्ते नई दिल्ली आए थे।

पहचान ना बताने की शर्त पर एक अधिकारी ने कहा, "जब 1996 से 2000 तक अफगानिस्तान में तालिबानी शासन था, तब जैश और लश्कर जैसे आतंकी संगठनों ने अफगानिस्तान में अपने आतंकी कैंप स्थापित कर लिए थे। जब बीते साल गाजी शहर में हमला हुआ, तब ये खबर आई थी कि जैश और लश्कर के आतंकी तालिबानियों के साथ लड़ रहे हैं।"

लश्कर-ए-तैयबा भारत में हुईं कई आतंकी घटनाओं के लिए जिम्मेदार है। साल 2002 में इस संगठन के उग्रवादियों ने दिल्ली के लाल किले पर हमला कर दिया था। इसके बाद 2001 में श्रीनगर हवाई अड्डे पर आतंकवादी हमले और अप्रैल 2001 में सीमा सुरक्षाबल के जवानों की हत्या के पीछे भी यही संगठन जिम्मेदार था। इस संगठन का नाम साल 2008 में हुए मुंबई हमले में भी आया था लेकिन बाद में इसने इस आरोप को ये कहते हुए खारिज कर दिया कि वह कश्मीर के बाहर अपनी कार्रवाई नहीं करता। ये संगठन पाकिस्तानी सेना और सरकार पर भी कई हमले कर चुका है।

जैश-ए-मोहम्मद का सरगना मसूद अजहर - फोटो : File Photo
वहीं जैश-ए-मोहम्मद की भी बीते सालों से कश्मीर में आतंकी गतिविधियां बढ़ी हैं। इस संगठन ने 14 फरवरी को पुलवामा आतंकी हमले की जिम्मेदारी भी ली है। तालिबान और अमेरिकी प्रतिनिधि जिलामे खालिजाद के बीच चल रही बातचीत में इस बात पर ध्यान दिया जा रहा है कि अफगानिस्तान की धरती को कभी अलकायदा और उसके सहयोगी इस्तेमाल ना करें।

हालांकि अभी अफागानिस्तान में पाकिस्तान के कितने आतंकी मौजूद हैं, इसकी जानकारी नहीं मिल पा रही है। लेकिन ये सच है कि ये तालिबान के आतंकियों का साथ दे रहे हैं। जब अफगानी सैनिकों ने बीते साल अगस्त में गजनी की घेराबंदी को समाप्त कर दिया, तो अफगान अधिकारियों ने कहा कि मारे गए 400 आतंकवादियों में से 70 पाकिस्तानी थे।

अफगानिस्तान के रक्षा मंत्री असदुल्ला खालिद का कहना है कि मार्च में देश के बड़े सैनिक बेस में से एक पर हुआ हमला तालिबान और जैश ने संयुक्त रूप से किया था। इस हमले 26 सैनिकों की मौत हुई थी। वहीं अन्य देशों के साथ-साथ भारत भी यही चाहता है कि अफगानिस्तान में एक लोकतांत्रिक सरकार बनी रहे और वहां से तालिबान का पूरी तरह खातमा हो जाए। ऐसा इसिलए क्योंकि भारत ने अफगानिस्तान में विकास के लिए करीब तीन बिलियन डॉलर की सहायता दी है।

अगर यहां तालिबान से कुछ बातचीत बनती है और उनका सत्ता पर थोड़ा भी नियंत्रण होता है, तो भारत ने यहां जो भी विकास किया है, वो बेकार हो सकता है। इसके अलावा अफगानिस्तान में भी महिलाओं को जो अधिकार मिले हैं, वो छिन जाएंगे। हाल ही में यहां एक पूर्व पत्रकार और संसद में सांस्कृतिक सलाहकार मीना मंगल की दिनदहाड़े गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। तालिबान द्वारा यहां आए दिन आतंकी हमले किए जा रहे हैं।

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