अमेरिका इस वक्त तालिबान के साथ शांति वार्ता कर रहा है। इस बातचीत पर भारत ने भी नजर बनाई हुई है। ऐसा इसलिए क्योंकि पाकिस्तान समर्थित आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्म और लश्कर-ए-तैयबा ने तालिबान के साथ मिलकर अफागानिस्तान में लड़ाई जारी रखी हुई है। ये बात मामले की जानकारी रखने वाले लोगों ने बताई है।
अमेरिका की बातचीत ऐसे समय में चल रही है, जब भारत के साथ रूस और चीन जैसे देश भी इस मामले पर विचार विमर्श कर रहे हैं। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक अगर अफगानिस्तान में तालिबान का प्रभाव बढ़ा तो भारत और चीन जैसे देशों की सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है। ऐसा इसलिए क्योंकि तालिबान को पाकिस्तान पूरा समर्थन दे रहा है और ऐसा होने से आतंकी संगठन जैश और लश्कर की आतंकी गतिविधियां भी बढ़ जाएंगी।
भारत भी अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी समेत अन्य हितधारतों को सहयोग दे रहा है। जिसमें क्षेत्रीय और विपक्षी नेता, और ताजिक, उजबेक्स और हजारा जैसे जातीय समूहों के प्रतिनिधि भी शामिल हैं। अफगान मामलों पर चीन के विशेष दूत डींग शिजुंग भी शांति और सुलह के प्रयासों पर चर्चा के लिए बीते हफ्ते नई दिल्ली आए थे।
पहचान ना बताने की शर्त पर एक अधिकारी ने कहा, "जब 1996 से 2000 तक अफगानिस्तान में तालिबानी शासन था, तब जैश और लश्कर जैसे आतंकी संगठनों ने अफगानिस्तान में अपने आतंकी कैंप स्थापित कर लिए थे। जब बीते साल गाजी शहर में हमला हुआ, तब ये खबर आई थी कि जैश और लश्कर के आतंकी तालिबानियों के साथ लड़ रहे हैं।"
लश्कर-ए-तैयबा भारत में हुईं कई आतंकी घटनाओं के लिए जिम्मेदार है। साल 2002 में इस संगठन के उग्रवादियों ने दिल्ली के लाल किले पर हमला कर दिया था। इसके बाद 2001 में श्रीनगर हवाई अड्डे पर आतंकवादी हमले और अप्रैल 2001 में सीमा सुरक्षाबल के जवानों की हत्या के पीछे भी यही संगठन जिम्मेदार था। इस संगठन का नाम साल 2008 में हुए मुंबई हमले में भी आया था लेकिन बाद में इसने इस आरोप को ये कहते हुए खारिज कर दिया कि वह कश्मीर के बाहर अपनी कार्रवाई नहीं करता। ये संगठन पाकिस्तानी सेना और सरकार पर भी कई हमले कर चुका है।