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Nepal Election: नेपाल के आम चुनाव में क्यों दांव पर लग गई है देश की संघीय व्यवस्था?

Fri, 04 Nov 2022 06:29 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, काठमांडो

सार

Nepal Election: पर्यवेक्षकों ने ध्यान दिलाया है कि देश की बड़ी पार्टियों ने इस मुद्दे पर चुप्पी साध रखी है। इसकी वजह संभवतः यह है कि उनके पास भी प्रांतों को मजबूत करने और त्रि-स्तरीय संघीय व्यवस्था को कारगर बनाने की कोई योजना नहीं है...
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Nepal Election: पुष्प कमल दहाल के साथ नेपाल के पीएम शेर बहादुर देउबा - फोटो : Agency (File Photo)
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विस्तार
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नेपाल में आम चुनाव के सिलसिले में चल रही बहस में देश के संघीय ढांचे पर कई हलकों से सवाल उठाए जा रहे हैं। यह पूछा गया है कि क्या नेपाल जैसे छोटे देश में सात प्रांतों की जरूरत है। देश में एकात्मक व्यवस्था वापस लाने के समर्थकों का कहना है कि संघीय सिस्टम अपनाने से कोई लाभ नहीं हुआ है, जबकि इससे राजकोष पर गैर-जरूरी बोझ बढ़ा है।

पर्यवेक्षकों ने ध्यान दिलाया है कि देश की बड़ी पार्टियों ने इस मुद्दे पर चुप्पी साध रखी है। इसकी वजह संभवतः यह है कि उनके पास भी प्रांतों को मजबूत करने और त्रि-स्तरीय संघीय व्यवस्था को कारगर बनाने की कोई योजना नहीं है। इस बीच राजतंत्र समर्थक राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी ने अपने चुनाव घोषणापत्र में कहा है कि वह सत्ता में आई, तो प्रांतों को भंग कर देगी। इसकी जगह वह केंद्र सरकार और स्थानीय सरकारों को मजबूत बनाने के लिए काम करेगी।

बड़े दलों ने अपने चुनाव घोषणापत्र में संघीय व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए कोई योजना पेश नहीं की है। संघीय व्यवस्था के विशेषज्ञ पीतांबर शर्मा ने कहा है- ‘यह दयनीय है कि राजनीतिक दलों ने ऐसे महत्त्वपूर्ण मुद्दे को अपने घोषणापत्र में जगह नहीं दी है।’

राजनीतिक विश्लेषक पुरंजन आचार्य ने कहा है कि बड़े दलों ने संघीय व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए अब तक कोई कदम नहीं उठाया है। उन्होंने अखबार काठमांडू पोस्ट से कहा- ‘राजनीतिक दलों को समझना चाहिए कि वे गलत रास्ते पर हैं। ये दल प्रांतों की अनदेखी कर केंद्रीय व्यवस्था को मजबूत कर रहे हैं। ये दल संघवाद की सिर्फ जुबानी सेवा करते हैं, वरना उनकी वास्तविक इच्छा सत्ता का केंद्रीकरण करने की रही है।’

नेपाल के 2015 के संविधान में त्रि-स्तरीय शासन व्यवस्था को अपनाया गया था। इसके तहत संघीय, प्रांतीय और स्थानीय सरकारों का प्रावधान किया गया। लेकिन विश्लेषकों का कहना है कि इस संघीय भावना का अब तक सत्ता में आए दलों ने खुला उल्लंघन किया है।

स्थानीय स्वशासन विशेषज्ञ कृष्ण प्रसाद सपकोटा ने कहा है- ‘समस्या यह है कि बड़े राजनीतिक दल भी प्रांतों को स्वतंत्र रूप से काम करने देना नहीं चाहते हैँ।’ उन्होंने कहा- ‘इन दलों का प्रांतों में प्रभावी दलीय ढांचा नहीं है। जो प्रांतीय इकाइयां हैं, उन्हें भी बहुत कम अधिकार दिए गए हैं। प्रांतीय चुनाव में टिकट देने का अधिकार प्रांतीय समितियों के पास होना चाहिए। लेकिन इस बारे में फैसला पार्टी मुख्यालयों में होता है।’

विश्लेषकों ने ध्यान दिलाया है कि प्रांतीय चुनावों में शायद ही पार्टियों का कोई बड़ा नेता उम्मीदवार बनता है। अगर एक या दो ऐसे नेता दिखते भी हों, तो वे वही होते हैं, जो मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार होते हैं। बाकी प्रांतीय नेता केंद्रीय नेताओं के कठपुतली बने रहते हैं। सपकोटा ने कहा- ‘कठपुतली होने के कारण प्रांतीय नेता कभी पार्टी के सर्वोच्च नेताओं के खिलाफ जुबान नहीं खोलते, जबकि केंद्रीय नेता प्रांतों को कमजोर करने के कदम उठाते रहते हैं।’

इन्हीं परिस्थितियों में राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी को खुलेआम संघीय व्यवस्था खत्म करने का वादा करने का मौका मिला है। जानकारों के मुताबिक इस राय को देश के एक बड़े हिस्से का समर्थन मिल सकता है।

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