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कौन हैं गोटबाया राजपक्षे, श्रीलंका में उनकी जीत बढ़ा सकती है भारत का सिरदर्द

Sun, 17 Nov 2019 05:21 PM IST
Nilesh Kumar वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला

सार

  • गोटबाया की जीत के साथ फिर से सत्ता में राजपक्षे परिवार
  • महिंदा राजपक्षे शासनकाल में बढ़ी थी चीन से नजदीकियां
  • चुनाव परिणाम का भारत-चीन संबंधों पर पड़ सकता है असर
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भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग और श्रीलंका में हुए राष्ट्रपति चुनाव में जीत दर्ज करने वाले गोटबाया राजपक्षे - फोटो : Social Media
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विस्तार
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श्रीलंका में हुए राष्ट्रपति चुनाव में विपक्षी उम्मीदवार गोटबाया राजपक्षे ने सत्तारूढ़ पार्टी के उम्मीदवार सजीत प्रेमदास को बड़े अंतर से हराते हुए जीत हासिल की है। गृह युद्ध काल में विवादित रक्षा सचिव रहे गोटबाया देश के नए राष्ट्रपति होंगे। भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गोटबाया राजपक्षे को जीत की बधाई दी है।

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गोटबाया की जीत का असर भारत पर भी पड़ सकता है। कारण कि गोटबाया, राजपक्षे परिवार से हैं, जिसका झुकाव चीन की ओर रहा है। गोटबाया की जीत के साथ श्रीलंका की राजनीति में शक्तिशाली माना जाने वाला राजपक्षे परिवार एक बार फिर सत्ता में वापसी कर रहा है। 

कौन हैं गोटबाया राजपक्षे

गोटबाया राजपक्षे श्रीलंका के पूर्व प्रधानमंत्री महिंदा राजपक्षे के छोटे भाई हैं। राजपक्षे का जन्म 20 जून, 1949 को श्रीलंका के एक प्रतिष्ठित राजनीतिक परिवार में हुआ था। वह 9 भाई बहनों में पांचवें स्थान पर हैं। उनके पिता डीए राजपक्षे 1960 के दशक में विजयानंद दहानायके की सरकार में प्रमुख नेता थे और श्रीलंका फ्रीडम पार्टी के संस्थापक सदस्य थे। राजपक्षे ने अपनी स्कूली पढ़ाई कोलंबो में पूरी की। वह 1971 में श्रीलंका की सेना में अधिकारी कैडेट के रूप में शामिल हुए।

70 वर्षीय नेता गोटबाया ने साल 1983 में मद्रास विश्वविद्यालय से रक्षा अध्ययन में स्नातकोत्तर की उपाधि हासिल की। 1980 के ही दशक में उन्होंने भारत के पूर्वोत्तर स्थित ‘काउंटर इंसर्जेंसी एंड जंगल वारफेयर स्कूल’ में प्रशिक्षण लिया था। 1991 में वह सर जॉन कोटेलवाला रक्षा अकादमी के उप कमांडेंट नियुक्त किए और 1992 में सेना से सेवानिवृत्त होने तक इस पद पर बने रहे। वह 2005 में अपने भाई महिंदा राजपक्षे के राष्ट्रपति चुनाव अभियान में मदद के लिए स्वदेश लौटे और श्रीलंका की दोहरी नागरिकता ली। 

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महिंदा राजपक्षे ने तमिल अलगाववादी युद्ध को खत्म करने में अहम भूमिका निभाई थी, जिसके कारण वह सिंहली बौद्ध बहुल समुदाय के प्रिय बन गए थे। गोटबाया उनके शीर्ष रक्षा मंत्रालय अधिकारी थे, जिन्होंने लिट्टे के खिलाफ सैन्य अभियान की निगरानी की थी। लिट्टे के के निशाने पर रहे राजपक्षे 2006 में इस संगठन के आत्मघाती हमले में बाल-बाल बचे थे।

बहुसंख्यक सिंहली बौद्ध उन्हें अपना नायक मानते हैं।  वहीं, दूसरी ओर तमिल मूल के वैसे परिवार, जिनके परिजन गृहयुद्ध के दौरान मारे गए या लापता हो गए, वे गोटबाया पर आरोप लगाते हैं और उन्हें अविश्वास की नजर से देखते हैं। बड़े भाई महिंदा राजपक्षे के राष्ट्रपति रहने के दौरान उन्होंने वर्ष 2005 से 2014 में रक्षा सचिव की जिम्मेदारी भी निभाई थी। रक्षा सचिव रहते वह साल 2012 और 2013 में भारत के दौरे पर आए थे। 

महिंदा पिछले चुनाव में आश्चर्यजनक रूप से हार गये थे। गोटबाया की जीत राजपक्षे परिवार को फिर से देश की सत्ता में ले आई है। पिछले साल विवादों में फंसे महिंदा राजपक्षे के प्रधानमंत्री पद से इस्तीफे के बाद इसी पद से बर्खास्त किए गए रानिल विक्रमसिंघे दोबारा प्रधानमंत्री बनाए गए थे। अब गोटबाया की जीत के बाद श्रीलंका के प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंहे के पद से हटने की संभावना है। 

मालूम हो कि मौजूदा संसद को कम के कम अगले साल फरवरी से पहले भंग नहीं किया जा सकता। विक्रमसिंघे को तब तक पद से हटाया नहीं जा सकता, जब तक वह इस्तीफा नहीं दे देते। ऐसा माना जा रहा है कि विक्रमसिंघे के इस्तीफे के बाद गोटबाया राजपक्षे अपने बड़े भाई महिंदा राजपक्षे को प्रधानमंत्री नियुक्त करेंगे।

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गोटाबाया राजपक्षे के जीतने से भारत-चीन संबंध पर असर

चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी(फाइल फोटो)) - फोटो : पीटीआई
पर्यवेक्षकों के अनुसार चीन समर्थक राजपक्षे के मैदान में होने के कारण भारत इन चुनाव परिणाम पर नजदीक से नजर रख रहा था, क्योंकि इसके परिणाम का हिंद प्रशांत क्षेत्र में देश की मौजूदगी पर असर पड़ेगा, जहां चीन तेजी से अपनी पहुंच बढ़ा रहा है।

कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि राजपक्षे का जीतना भारत के लिए झटका साबित हो सकता है। मीडिया और भारत के विदेश संबंधों पर शोध कर चुके डॉ. निरंजन कुमार का कहना है कि राजपक्षे चीन समर्थक माने जाते हैं। दूसरी तरफ इस चुनाव में हारने वाले उम्मीदवार सजीथ प्रेमदासा पहले चीन के आलोचक थे। हालांकि पिछले कुछ समय से उनके सुर में नरमी देखी जा रही थी।

राजपक्षे काल में बढ़ी थी चीन से नजदीकियां

महिंदा राजपक्षे के सत्ता में रहते चीन और श्रीलंका करीब आए थे। साल 2014 में राजपक्षे ने दो चीनी सबमरीन को उनके वहां खड़ा करने की इजाजत तक दी थी। डॉ. निरंजन मानते हैं कि महिंदा के भाई गोटबाया के जीतने के बाद श्रीलंका और चीन की नजदीकियां फिर बढ़ सकती हैं।

इस स्थिति में चीन हिंद महासागर पर अपनी पकड़ ज्यादा मजबूत कर सकता है। चीन लंबे वक्त से इसकी कोशिशों में लगा है। ऐसे में उनकी जीत का असर भारत-चीन संबंध पर पड़ सकता है। 
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