जहां यूक्रेन और पश्चिम एशिया में स्थितियों को लेकर अब अमेरिकी नीति में बदलाव होगा, वहीं चीन के मुद्दे पर ट्रंप अपनी पुरानी नीति ही अपना सकते हैं। इससे पहले बाइडन सरकार ने भी ट्रंप के पहले कार्यकाल की नीतियों के जरिए चीन के मुद्दे को संभाला। यानी चीन के मामले में अमेरिकी रुख में बदलाव मुश्किल है। इतना ही नहीं चीन के मामले में आगे और सख्त हो सकते हैं और अमेरिकी हितों की रक्षा के लिए चीन पर आयात शुल्क बढ़ा सकते हैं।
इसके अलावा चीन के साथ टकराव के दौरान वे ताइवान के मुद्दे पर भी मुखर हो सकते हैं। दरअसल, अपनी अमेरिका फर्स्ट नीति के तहत ट्रंप किसी भी देश की सुरक्षा के लिए खुद से आगे न आने की बात कहते रहे हैं। ऐसे में चीन से कुछ ही दूरी पर स्थित ताइवान के लिए ट्रंप का रवैया मुश्किलें पैदा कर सकता है। ट्रंप अपनी नीतियों के तहत एशिया में अमेरिका के पारंपरिक साथियों- फिलीपींस, दक्षिण कोरिया और जापान से संधि करने और इसके बाद ही उन्हें सुरक्षा गारंटी देने का वादा कर सकते हैं।
इसी तरह उत्तर कोरिया का मामला देखा जाए तो ट्रंप अपने पुराने कार्यकाल की नीति पर ही चल सकते हैं। पहली बार राष्ट्रपति बनने के बाद ट्रंप ने कई बार उत्तर कोरिया और दक्षिण कोरिया के बीच विवाद खत्म कराने के लिए किम जोंग-उन के साथ बैठक भी की। माना जाता है कि उत्तर कोरिया के बर्ताव में अनिश्चितता की वजह से आने वाले समय में ट्रंप को भी उसको साथ लाने में दिक्कत हो सकती है।
खासकर उत्तर कोरिया को परमाणु हथियारों के मामले में बातचीत की मेज पर लाना कठिन काम होगा। हालांकि, अगर ट्रंप रूस-यूक्रेन युद्ध को खत्म करवाने और पुतिन के साथ बेहतर रिश्ते स्थापित करते हैं तो तानाशाह किम जोंग-उन के साथ उनकी बातचीत का रास्ता आसान हो सकता है, क्योंकि रूस और उत्तर कोरिया के बीच संबंध काफी अच्छे हैं।
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