साल 2017 की बात है जब बीजिंग की एक मैगजीन को चीन के पूर्व विशेष प्रतिनिधि दाई बिंग्गुओ (Dai Bingguo) ने इंटरव्यू दिया था। उस दौरान दाई बिंग्गुओ ने भारतीय सीमाओं के संबंध में कहा था कि यदि भारत चाहे तो वह चीन के साथ सीमा विवाद का हल निकाल सकता है। दाई ने कहा कि यदि भारत देश के पूर्वी छोर पर स्थित तवांग (Tawang) क्षेत्र को चीन को सौंपने के लिए राजी हो जाता है तो चीन भी भारत के पश्चिमी छोर पर स्थित अक्साई चीन (Aksai China) में अपने कब्जे का हिस्सा भारत को दे देगा।
दाई का यह बयान उस समय आया था जब आतंकी मसूद अजहर, एनएसजी (Nuclear Suppliers Group) में भारत की सदस्यता और चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे को लेकर भारत और चीन आमने-सामने थे। बात करें दाई की शर्त को तो भारत सीमा विवाद को सुलझाने के लिए किसी भी कीमत पर तवांग क्षेत्र को चीन को नहीं सौंपेगा क्योंकि यह क्षेत्र भारत की पूर्ण संप्रभुता वाला क्षेत्र है। चीन ने इससे पहले भी तीन बार सीमा विवाद को लेकर इसी तरह के बेबुनियादी सुझाव पेश किए हैं और भारत ने हर बार चीन के प्रस्ताव को ठुकराया है।
आपको याद दिलाते चलें कि साल 1960 में चीन के प्रीमियर ज्योऊ एनलाई द्वारा ने भी एक प्रस्ताव पेश किया गया था जिसके अंतर्गत अरुणाचल प्रदेश पर भारत की संप्रभुता और अक्साई चीन पर चीन के कब्जे को मान्यता प्रदान की गई थी, इस शानदार प्रस्ताव को तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने ठुकरा दिया था।
नेहरू के इस फैसले के बाद भारत के प्रति चीन का हौसला बुलंद हो गया, हालांकि भारत ने जैसी ही विकास की रफ्तार पकड़ी तो पश्चिमी सीमा को भारतीय क्षेत्र के रूप में अंकित करना आरंभ कर दिया गया और इसे ही मैकमोहन रेखा (McMahon Line) नाम दिया गया।
इसी मैकमोहन रेखा के निर्धारण के फलस्वरूप देश के उत्तर-पूर्व में स्थित अरुणाचल प्रदेश को भारत के एक अभिन्न हिस्से के रूप में शामिल किया गया, लेकिन चीन मैकमोहन रेखा को खारिज करता रहा है। उसका कहना है कि तिब्बत का बड़ा हिस्सा भारत के पास है।
भारत-चीन सीमा विवाद का समाधान निकालने के लिए दूसरा प्रस्ताव एलएसी प्लस सोलुशन (LAC Plus Solution) था। बता दें कि एलएसी (Line of Actual Control) भारत तथा चीन के मध्य सीमा निर्धारण के लिए खिंची गई एक अंतरराष्ट्रीय रेखा है। इस प्रस्ताव की पेशकश उस समय की गई थी जब भारत के तत्कालीन राजदूत ए.पी. वेंकटेश्वरन और तत्कालीन चीनी प्रीमियर ज्योऊ जियांग के बीच बेकचैनल टॉक हो रही थी।
इस प्रस्ताव के तहत भारत के पूर्वी क्षेत्र की स्थिति को यथावत बने रहने देने और पश्चिमी क्षेत्र में चीन के कब्जे वाले क्षेत्र में कुछ रियायत देने की पेशकेश की गई थी। भारत ने इस प्रस्ताव को भी ठुकरा दिया था। चीन की नजर हमेशा से ही भारत के तवांग क्षेत्र पर रही है। कुल मिलाकर देखा जाए तो भारत सीमा विवाद को सुलझाने के लिए कभी भी जमीन की अदला-बदली नहीं करेगा।
अरुणाचल प्रदेश में स्थित तवांग भारत के लिए सामरिक दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण माना जाता है। अगर भारत किसी भी तरह चीन से अदला बदली में तवांग को उसे सौंप देता है, तो सामरिक और कूटनीतिक रूप से अरुणाचल प्रदेश पर भारत की पकड़ कमजोर हो जाएगी जिसे चीन हमेशा से अपना हिस्सा बताता रहा है।
दूसरे, तवांग के कब्जे में आते ही चीन देर सबेर अरुणाचल प्रदेश के बाकी हिस्से पर भी अपना दावा ठोंक सकता है। ऐसे में तवांग को चीन को सौंपना भारत के लिए अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने जैसा हो जाएगा। इसके अलावा तवांग के बदले चीन जिस अक्साई चिन इलाके को भारत को सौंपने की पेशकश कर रहा है वो बंजर और बर्फीला क्षेत्र होने के कारण भारत के लिए ज्यादा महत्व नहीं रखता। इसलिए अक्साई चिन को लेकर भारत कभी भी चीन से टकराने के मूड़ में नहीं रहता जबकि अरुणाचल प्रदेश को लेकर भारत का रुख हमेशा से मुखर रहा है।