जब कोरोना महामारी के कारण पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था मंदी में है, चीन ने जिस तेजी से अपनी अर्थव्यवस्था को खड़ा किया है, उसे पश्चिमी देशों में हैरत की निगाहों से देखा जा रहा है। इस सिलसिले में सोमवार को मशहूर ब्रिटिश अखबार फाइनेंशियल टाइम्स ने लिखा, ‘ये विडंबना ध्यान खींचने वाली है। जब डॉनल्ड ट्रंप और जो बिडेन राष्ट्रपति चुनाव अभियान में चीन की निंदा करने में व्यस्त हैं, वहीं चीन की अर्थव्यवस्था ने अधिक ताकतवर होकर वापसी की है। कोरोना महामारी के बीच चीन दुनिया में आर्थिक विकास के इंजन के रूप में उभर रहा है।’
ये टिप्पणी कैक्सिन चाइना जनरल मैनुफैक्चरिंग पर्चेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स जारी होने के पहले की गई थी। ये इंडेक्स अक्टूबर में 53.6 पर पहुंच गया, जबकि सितंबर में यह 53 था। इस इंडेक्स का 50 के ऊपर होने का मतलब आर्थिक गतिविधियों में फैलाव होता है, जबकि अगर यह 50 के नीचे हो, तो उसका मतलब होता है कि अर्थव्यवस्था सिकुड़ रही है। गौरतलब है कि अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के मुताबिक इस वित्त वर्ष में वृद्धि हासिल करने वाला चीन अकेला बड़ी अर्थव्यवस्था होगा। आईएमएफ के अनुमान के मुताबिक इस वित्त वर्ष में चीन की जीडीपी 1.9 फीसदी बढ़ेगी, जबकि 2021 में इसकी वृद्धि दर 8.2 फीसदी पहुंच जाएगी।
वॉशिंगटन स्थित पीटरसन इंस्टीट्यूट फॉर इंटरनेशनल इकॉनोमिक्स से जुड़े अर्थशास्त्री चैड बॉउन ने ध्यान दिलाया है कि 2017 की समान अवधि की तुलना में इस वर्ष जनवरी से अब अक्तूबर तक अमेरिका से चीन का आयात 16 फीसदी गिर गया है। जबकि इसी अवधि में जिन चीजों का चीन अमेरिका से आयात करता था, उनके दूसरे देशों से उसके आयात में 20 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। यानी चीन के खिलाफ लगाए गए अमेरिकी प्रतिबंधों से नुकसान खुद को अमेरिका को हुआ है, जबकि चीन की अर्थव्यवस्था पर उससे कोई फर्क नहीं पड़ा है।
बॉउन का कहना है कि इस साल जनवरी में अमेरिका और चीन के बीच जो व्यापार करार हुआ था, वह भी बेअसर साबित हो रहा है। इस करार के तहत चीन ने अमेरिका से 200 अरब डॉलर के अतिरिक्त आयात करने का वादा किया था। राष्ट्रपति ट्रंप ने इस करार को “ऐतिहासिक” बताया था।
अमेरिका के फेडरल रिजर्व और कोलंबिया विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्रियों के एक अध्ययन के मुताबिक चीन के खिलाफ ‘व्यापार युद्ध’ छेड़ने के ट्रंप प्रशासन के फैसले का अमेरिका के शेयर बाजार पर भी बुरा असर पड़ा है। इन अर्थशास्त्रियों के मुताबिक व्यापार युद्ध के कारण अमेरिका की शेयर बाजार में लिस्टेड कंपनियों के बाजार मूल्य में एक खरब 70 डॉलर की कमी आई है। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि ट्रंप प्रशासन ने सीमा शुल्क में बढ़ोतरी कर दी, जिससे कंपनियों के अनुमानित मुनाफे में कमी आई।
ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूशन के अर्थशास्त्रियों रेयन हास और अब्राहम डेनमार्क के मुताबिक ट्रेड वॉर के कारण अमेरिका के निर्यात पर बहुत असर पड़ा है। आयात महंगा होने से उनकी उत्पादन लागत बढ़ गई और इससे उनका मुनाफा घटा है। इस कारण उन्हें अपने कर्मचारियों के वेतन में कटौती करनी पड़ी है। कुछ कंपनियों को अपने कर्मचारियों की संख्या में भी कटौती करनी पड़ी है। साथ ही अमेरिकी उपभोक्ताओं को चीजें महंगे दामों पर उपलब्ध हो रही हैं।
इन अर्थशास्त्रियों ने अपने एक रिसर्च पेपर में कहा है कि ट्रेड वॉर के कारण चीन के साथ अमेरिका का व्यापार घाटा कम हुआ है, लेकिन कुल व्यापार घाटे में गिरावट नहीं आई है, क्योंकि जो चीजें चीन से आयात की जाती थीं, उन्हें अमेरिकी कंपनियां अब मेक्सिको, जापान, दक्षिण कोरिया, ताइवान या यूरोप से मंगा रही हैं।
फाइनेंशियल टाइम्स ने लिखा है- ‘विरोधभास यह है कि यह टकराव अमेरिका और चीन के वित्तीय संबंधों में गायब है। यही अकेला क्षेत्र है, जहां अमेरिकी कारोबारियों की चीन में पैठ बढ़ी है। चीन सरकार धीरे-धीरे इस क्षेत्र में उदारीकरण को बढ़ावा दे रही है, जिस कारण अमेरिकी बैंक अपनी पुरानी साझेदारियों में अब अधिक शेयर खरीदकर नियंत्रण वाली हैसियत तक पहुंच रहे हैं।
लेकिन इसका यह नतीजा भी हो रहा है कि चीन तेजी से विकसित देशों से पोर्टफोलियो पूंजी को आकर्षित कर रहा है। इससे चीन में आर्थिक गतिविधियों को तेज करने के लिए पूंजी उपलब्ध हो रही है।’ जाहिर है, ताजा आंकड़े इस आर्थिक रूझान की पुष्टि कर रहे हैं।