ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला मोजतबा अली खामेनेई अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप को चिढ़ा रहे हैं। खिसियाए ट्रंप ने ईरान को 48 घंटे का अल्टीमेटम दिया है। ईरान के परणामु संयंत्र पर हमले के बाद इस्राइल ताक में है। इस बीच ईरान ने उसके परमाणु ठिकाने हर घातक हमला बोल दिया है। कुल मिलाकर अगले 72 घंटे बहुत महत्वपूर्ण हैं।
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भारतीय सामरिक और रणनीतिक विशेषज्ञों की निगाह भी पश्चिम एशिया पर टिकी है। पूर्व एयर वाइस मार्शल एनबी सिंह का कहना है कि पश्चिम एशिया में युद्ध लगातार करवट ले रहा है। अब यह परमाणु उर्जा संस्थान, ऊर्जा संरचनाओं पर एक दूसरे के हमले की तरफ बढ़ गया है। इसका असर अमेरिका, इस्राइल के मित्र देशों के साथ साथ दुनिया के अन्य देशों पर पड़ने लगा है। इस्राइल ने ईरान के लगभग सभी परमाणु ठिकाने पर हमला किया है। ईरान भी इस्राइल के परमाणु ठिकानों पर हमला कर रहा है। इससे परमाणु विकिरण के लीक होने का खतरा पैदा हो सकता है। इसलिए अब लड़ाई का न केवल दायरा बढ़ रहा है, बल्कि यह घातक और विश्व युद्ध को आमंत्रित करने की तरफ बढ़ रही है।
क्यों महत्वपूर्ण हैं अगले 72 घंटे?
ईरान ने डिएगा गार्सिया बेस(अमेरिका ब्रिटेन का संयुक्त सैन्य अड्डा) को निशाना बनाकर मिसाइल दागी। साफ है उसकी मिसाइल की जद में अब पेरिस, लंदन, बर्लिन जैसे शहर हैं। इस्राइल डरा रहा है कि ईरान की मिसाइलें यूरोप के लिए खतरा हैं। उसके सैन्य प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल इयाल जमीर ने यह चेतावनी दी है। इस्राइल ने ईरान के नतांज परमाणु ठिकाने को निशाना बनाया। रूस को हमला नागवार गुजरा है। ईरान ने इसकी सूचना आईएईए प्रमुख राफेल ग्रॉसी को दे दी है। जून 2025 में भी उसके भूमिगत परमाणु ठिकाने फोर्दो पर हमला हुआ था। इस्फहान भी इस्राइल की आईडीएफ के निशाने पर है। जवाब में ईरान ने इस्राइल के डिमोना स्थित परमाणु ठिकाने पर मिसाइल दागकर बड़ा नुकसान किया है। हमले के बाद राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान को 48 घंटे के भीतर बिना शर्त होर्मुज स्ट्रेट जलमार्ग खोलने के लिए कहा है। न खोलने पर अमेरिका ने ईरान के सबसे बड़े पावर प्लांट समेत कई को तबाह करने की धमकी दी है। जवाब में ईरान ने हमले की चेतावनी दे दी है। ईरान राष्ट्रपति ट्रंप को मुंह चिढ़ा रहा है। इससे साफ है कि 72 घंटे में पश्चिम एशिया में युद्ध की आग भीषण रूप ले सकती है।
ट्रंप को क्यों मुंह चिढ़ा रहा है ईरान?
ईरान के सर्वोच्च नेता मोजतबा अमेरिका एक के बाद एक तीन मिशन फेल होने पर राष्ट्रपति ट्रंप को चिढा रहे हैं। इस्राइल की खुफिया एजेंसी मोसाद के इनपुट पर अमेरिका की सीआईए, एपबीआई और पेंटागन सहमत थे। उन्हें लग रहा था कि पूर्व सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई और शीर्ष नेतृत्व को निशाना बनाने और भयानक हमले के बाद ईरान में जन विद्रोह आसान हो जाएगा। इस तरह से सत्ता परिवर्तन कर ईरान में जीत मिलेगी। हुआ इसके विपरीत। लीडरशिप खत्म हुई और नई बन गई। न ईरान का तंत्र खत्म हुआ और न जनता ने विद्रोह, आंदोलन किया। अभी इसके आसार नहीं दिखाई दे रहे हैं। अगले टारगेट पर सैन्य ठिकाने थे। राष्ट्रपति ट्रंप का दावा है कि ईरान की वायुसेना, नौसेना तहस-नहस और खत्म हो चुकी है। लेकिन इसके बाद ईरान ने उसके सबसे ताकतवर फाइटरजेट एप-35 लाइटेनिंग को निशाना बनाया। अमेरिकी पोत को टारगेट पर लिया। तीसरा टारगेट ईरान के खार्क द्वीप पर हमला कर अर्थव्यवस्था की रीढ़ तोड़कर संदेश देना था, लेकिन होर्मुज स्ट्रेट खुलवाने का यह दांव भी उल्टा पड़ गया। ईरान के मोजतबा की सेना ट्रंप और नेतन्याहू की सेना के आगे तनकर खड़ी है। जवाबी हमले कर रही है। ट्रंप दो सप्ताह से युद्ध समाप्त होने का दावा कर रहे हैं और ईरान तीन-साल लड़ने का संकल्प दिखा रहा है। मोजतबा चिढ़ा रहे हैं कि न तो सत्ता बदली और न ईरान के लोगों ने जन विद्रोह किया।
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अब इसके आगे क्या?
ईरान को इस हाल में अमेरिका नहीं छोड़ सकता। विदेश सेवा के पूर्व अधिकारी रहे एसके शर्मा कहते हैं कि राष्ट्रपति ट्रंप ने गलत बिल में हाथ डाल दिया। अब यह लड़ाई अमेरिका-इस्राइल-ईरान की लड़ाई नहीं रह गई। इसके दायरे से बाहर निकल रही है और स्थानीय संघर्ष बड़े युद्ध में बदलने की तरफ बढ़ रही है। इसलिए ईरान का मुद्दा हल किए बिना राष्ट्रपति ट्रंप लौटे तो पश्चिम एशिया नई आग में जलेगा। सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन, कुवैत, कतर, जार्डन के लिए अलग समस्या बन जाएगी। इस्राइल के माथे पर चिंता गहरा जाएगी। लेबनान, फलस्तीन, सीरिया, लीबिया, इराक, अजरबैजान, आमेर्निया तक इसका असर रहेगा। यहां से अमेरिकी सैन्य अड्डों आदि के लिए खतरा बढ़ जाएगा। एसके शर्मा कहते हैं कि रूस का पश्चिम एशिया में कभी अच्छा प्रभाव रखता था। चीन के ऊर्जा का स्रोत ईरान है। दोनों का पश्चिम एशिया में प्रभाव बढ़ेगा। इसे अमेरिका के लिए स्वीकारना मुश्किल होगा। एसके शर्मा कहते हैं कि यह मुद्दा पेचीदा होता जा रहा है। खतरा भी बढ़ा रहा है। वह कहते हैं कि अप्रैल के पहले सप्ताह तक का समय बहुत संवेदनशील महसूस हो रहा है।
क्या ईरान की ढीली होगी अकड़ या खिंचेगी ट्रंप की नाक?
एसके शर्मा कहते हैं कि परमाणु युद्ध का खतरा न हो बस। पूर्व विदेश सचिव शशांक कहते हैं कि 2022 से युद्ध में यूक्रेन के साथ फंसे रूस ने अब तक परमाणु हथियार का इस्तेमाल नहीं किया। इसलिए ऐसी संभावना न के बराबर है। हां, अरब के कुछ देश और इस्राइल जरूर चाहते हैं कि अमेरिका ईरान पर बड़ा और घातक हमला बोलकर सबक सिखाए। एसके शर्मा कहते हैं कि जिस तरह से रूस और चीन ने रणनीतिक रुचि ली है, उससे अमेरिका की मुश्किल बढ़ गई है। सबसे बड़ा खतरा उसकी अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले नकारात्मक असर का है। सेना से अवकाश प्रप्त मेजर जनरल सिन्हा कहते हैं कि बिना जमीन पर सैनिक को उतारे ईरान में अमेरिका और इस्राइल निर्णायक मोड़ पर नहीं पहुंच सकते। मेजर जनरल सिन्हा कहते हैं कि ईरान की भौगोलिक स्थिति और जज्बा देखते हुए साफ लग रहा है कि अमेरिका और इस्राइल के मंसूबे कामयाब होने मुश्किल हैं। ऐसा देखना होगा कि पश्चिम एशिया क्या नया रंग लेता है?