दुनिया में बढ़ते सैन्य तनाव और सुरक्षा चुनौतियों के बीच फ्रांस ने अपनी रक्षा नीति में बड़ा बदलाव करने का फैसला किया है। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने घोषणा की है कि देश अपने परमाणु हथियारों की ताकत बढ़ाएगा और पहली बार जरूरत पड़ने पर परमाणु हथियार ले जाने में सक्षम लड़ाकू विमानों को यूरोपीय सहयोगी देशों में अस्थायी रूप से तैनात करेगा। यह कदम यूरोप की सुरक्षा को मजबूत करने की नई रणनीति का हिस्सा बताया जा रहा है।
फ्रांस के उत्तर-पश्चिम में स्थित लाइल लॉन्ग सैन्य अड्डे पर दिए गए भाषण में मैक्रों ने कहा कि बदलती वैश्विक परिस्थितियों में यूरोप को अपनी सुरक्षा के लिए अधिक आत्मनिर्भर बनना होगा। उन्होंने साफ किया कि फ्रांस अपने परमाणु हथियारों पर नियंत्रण किसी दूसरे देश के साथ साझा नहीं करेगा। परमाणु हथियारों के इस्तेमाल का अंतिम फैसला केवल फ्रांस के राष्ट्रपति के हाथ में ही रहेगा।
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यूरोपीय सहयोगियों के साथ नई सुरक्षा व्यवस्था
मैक्रों ने बताया कि ब्रिटेन, जर्मनी, पोलैंड, नीदरलैंड, बेल्जियम, ग्रीस, स्वीडन और डेनमार्क जैसे देशों के साथ इस नई व्यवस्था पर बातचीत शुरू हो चुकी है। इसके तहत फ्रांस अपने रणनीतिक वायु सेना के कुछ हिस्सों को सहयोगी देशों में अस्थायी रूप से तैनात कर सकता है। साथ ही यूरोपीय देशों की सेनाएं फ्रांस के परमाणु अभ्यासों में भी भाग ले सकेंगी।
तीन दशक बाद बढ़ेगा फ्रांस का परमाणु जखीरा
फ्रांस ने यह भी एलान किया कि वह अपने परमाणु वारहेड की संख्या बढ़ाएगा। फिलहाल फ्रांस के पास 300 से कम परमाणु हथियार हैं। वर्ष 1992 के बाद यह पहला मौका होगा जब फ्रांस अपने परमाणु शस्त्रागार में बढ़ोतरी करेगा। मैक्रों ने कहा कि मजबूत प्रतिरोध क्षमता ही देश की सुरक्षा की गारंटी है और यही भविष्य में संभावित खतरों को रोकने का तरीका है।
अमेरिका और रूस के बीच बढ़ते तनाव का असर
यूरोप में लंबे समय से अमेरिका की सुरक्षा गारंटी को लेकर सवाल उठ रहे हैं। खासकर अमेरिका की बदलती रक्षा प्राथमिकताओं और रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद यूरोपीय देशों में चिंता बढ़ी है। मैक्रों ने कहा कि अब यूरोप को अपनी सुरक्षा की जिम्मेदारी खुद ज्यादा मजबूती से उठानी होगी। इसी कारण फ्रांस अपनी सैन्य और परमाणु क्षमता को मजबूत कर रहा है।
रणनीति पर उठे विरोध के स्वर
हालांकि फ्रांस के इस फैसले की आलोचना भी शुरू हो गई है। परमाणु हथियार खत्म करने की मांग करने वाले अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने कहा कि इससे हथियारों की नई दौड़ शुरू हो सकती है और वैश्विक तनाव बढ़ सकता है। आलोचकों का मानना है कि इस कदम को रूस उकसावे के रूप में देख सकता है, जिससे सैन्य टकराव का खतरा भी बढ़ सकता है।
यूरोप की सुरक्षा में फ्रांस की बढ़ती भूमिका
ब्रिटेन के यूरोपीय संघ से बाहर होने के बाद फ्रांस ही यूरोपीय संघ का एकमात्र परमाणु शक्ति वाला देश बचा है। ऐसे में मैक्रों की नई रणनीति यूरोप की सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था को नया रूप देने की कोशिश मानी जा रही है। फ्रांस का कहना है कि यह कदम युद्ध के लिए नहीं बल्कि संभावित खतरों को रोकने और संतुलन बनाए रखने के लिए उठाया गया है।
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