ताइवान में शनिवार को हुए मतदान में विपक्षी नेशनलिस्ट पार्टी (केएमटी) के सांसदों को हटाने की कोशिश नाकाम रही। मतदाताओं ने लगभग हर पांच में से एक सांसद को हटाने के प्रस्ताव को खारिज कर दिया। ये सांसद चीन समर्थक माने जाते हैं। इस नतीजे से ताइवान की सत्तारूढ़ डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी (डीपीपी) की संसद में शक्ति संतुलन को बदलने की उम्मीदें धूमिल हो गई हैं।
पिछले साल हुए राष्ट्रपति चुनाव में डीपीपी ने जीत हासिल की थी। लेकिन संसद में केएमटी और ताइवान पीपल्स पार्टी (टीपीपी) के पास मिलकर बहुमत है। ताजा नतीजों के मुताबिक, केएमटी के किसी भी सांसद को हटाया नहीं जा सका। हालांकि, 23 अगस्त को सात और केएमटी सांसदों पर मतदान होना है।
फिलहाल संसद में केएमटी के पास 52 सीटें और डीपीपी के पास 51 सीटें हैं। डीपीपी को बहुमत हासिल करने के लिए केएमटी के कम से कम छह सांसदों को हटाकर उपचुनाव जीतने की जरूरत है। किसी सांसद को हटाने के लिए जरूरी है कि उस क्षेत्र के कुल योग्य मतदाताओं में से कम से कम 25 फीसदी लोग पक्ष में वोट करें और यह संख्या विरोध में पड़े वोटों से ज्यादा हो।
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मतदान शनिवार को शाम चार बजे खत्म हुआ। आधिकारिक नतीजे एक अगस्त को घोषित किए जाएंगे। अगर अगले महीने भी डीपीपी को सफलता नहीं मिली, तो 2028 तक ताइवान की सरकार को संसद में भारी विरोध झेलना पड़ सकता है। केएमटी अध्यक्ष एरिक चू ने कहा कि जनता ने अपने वोट से साबितकर दिया है कि ताइवान की लोकतांत्रिक व्यवस्था परिपक्व और मजबूत है। उन्होंने राष्ट्रपति लाई चिंग-ते से माफी की मांग की। उन्होंने कहा कि लोग अब राजनीतिक लड़ाई नहीं बल्कि ठोस काम चाहते हैं।
ताइवान विश्वविद्याल के प्रोफेसर लेव नाचमैन ने कहा कि डीपीपी के लिए यह पहले से ही एक कठिन लड़ाई थी, क्योंकि जिन क्षेत्रों में सांसदों को हटाने की कोशिश हो रही थी, वे केएमटी के मजबूत गढ़ थे। उन्होंने कहा कि अब राष्ट्रपति लाई के लिए अपनी योजनाओं को लागू करना और भी मुश्किल हो जाएगा, खासतौर पर अगले साल होने वाले स्थानीय चुनावों से पहले।
वहीं, केएमटी के एक विवादित लेकिन ताकतवर सांसद फू कुन-ची ने कहा कि अब राष्ट्रपति के पास विपक्ष से संवाद करने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा है। कुन-ची के खिलाफ भी मतदान हुआ था। डीपीपी के महासचिव लिन यू-चांग ने कहा कि पार्टी मतदान के नतीजों को विनम्रता से स्वीकार करती है। उन्होंने कहा कि इसे राजनीतिक हार-जीत नहीं, बल्कि जनता की शक्ति का प्रदर्शन समझा जाना चाहिए। पार्टी को अब जनता की भावनाओं को और गंभीरता से समझने की जरूरत है।
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डीपीपी के समर्थकों ने केएमटी पर आरोप लगाया कि उन्होंने रक्षा बजट जैसी अहम योजनाओं को रोका और संसद में ऐसे कानून पास कराए जो कार्यपालिका की ताकत को कम करते हैं और चीन के पक्ष में जाते हैं। इसी कारण जनता के एक हिस्से में केएमटी के खिलाफ गुस्सा था और उन्होंने सांसदों को हटाने की मुहिम शुरू की। दूसरी ओर, केएमटी ने आरोप लगाया कि सत्तारूढ़ पार्टी ने बहुमत खोने के बाद राजनीतिक बदले की भावना से काम लिया और इस मतदान के जरिए लोकतंत्र को कमजोर करने की कोशिश की।
चीन और ताइवान के संबंधों को लेकर यह जनमत संग्रह काफी संवेदनशील बन गया था। चीन समर्थक सांसदों पर आरोप लगा कि वे ताइवान की संप्रभुता से समझौता कर रहे हैं और वे चीनी नेताओं से मिलते रहते हैं। वहीं, वे सांसद यह तर्क दे रहे हैं कि जब चीन डीपीपी से बातचीत को तैयार नहीं है, तो संपर्क बनाए रखना जरूरी है। चीन के ताइवान मामलों के कार्यालय की प्रवक्ता झू फेंगलियान ने जून में कहा था कि राष्ट्रपति लाई की सरकार लोकतंत्र की आड़ में तानाशाही चला रही है। उन्होंने डीपीपी पर विपक्ष को दबाने और चीन से संबंध सुधारने वाले लोगों को निशाना बनाने का आरोप लगाया।